Sunday, December 9, 2007

दिल्ली के छिछोरे

- भूपेन्द्र सिंह

( 'मेरा गांव - मेरा देश ' सिरीज का ये दूसरा लेख है। हम सभी के लिए दिल्ली बड़ी जगह हो सकती है। लेकिन भूपेन्द्र की जन्मभूमि यही जमीन है। लिहाजा वो हम सभी से ज्यादा ईमानदारी और अधिकार के साथ इस पर अपनी रायशुमारी कर सकते हैं और आज वो ऐसा ही कर रहे हैं। उम्मीद है बाकी लोग भी अपनी जन्मभूमि से जुड़े अहसास जरुर बांटेंगे। - विवेक सत्य मित्रम् )
लोग अपने-अपने गांव और जिलों के बारे में लिख रहे हैं, मैंने सोचा क्यों न मैं भी लिखूं। मैं गांव में तो नहीं रहा हूं, लेकिन दिल्ली को बहुत करीब से देखा है। पैदा ही यही हुआ हूं भई। लीजिए एक नमूना पेश-ए-खिदमत है।

अरे मेरी जान कभी इधर भी देख लिया करो। अरे ओ मैडम जरा मुड़कर तो देख लो। अरे भाई यो तो देख ही ना री। अरे देखेगी थोड़ा सब्र रख। पलट। नहीं पलटी। कोई बात नहीं ले दूसरी आ गई। ले-ले जितने मजे ले सकता है। दिल्ली में काफी कुछ बदला। सड़कें बदली, मकान बदले, रहने का तौर-तरीका बदला। लेकिन नहीं बदला तो वो यहां के छिछोरे लड़कों का अंदाज। जिस अंदाज में बरसों पहले लड़कियां छेड़ते थे। आज भी वैसे ही छेड़ते हैं। ना कोई शमॆ ना कोई हया। लेकिन कोई अपनी बहन को छेड़ दे, तो कमीनो के बदन में आग लग जाती है। खैर मैं दिल्ली के सभी लड़कों को दोषी नहीं ठहरा रहा हूं। लेकिन दिल्ली की सड़कों, बस स्टैंडों और हर पबि्लक प्लेस पर आपको ऐसे लड़कों की तादाद ज्यादा मिलेगी। बसें तो जैसे इन लड़कों के लिए वरदान हो। ये अपनी सभी कारगुजारियां बसों में ही अंजाम देते हैं। बसें भरी हुईं हो, तो कहने ही क्या। बसों में जहां लड़कियां देखीं, पहुंच गए वहीं। इसके बाद धक्ममुक्का चालू। इसके बाद तो आप लोग समझते ही हैं, क्या होता है। बताने की जरूरत नहीं है। इन छिछोरे लडकों की हरकतें ऐसी है कि गुंडे-मवालियों के भी पसीने छूट जाए। कुछ दिनों पहले दिल्ली और बाहरी जगहों से लड़कें दिल्ली में दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल का इिम्तहान देने आए। इन भावी कांस्टेबलों ने सिविल लाइन में जो हरकतें दिखाई। वो पूरी तरह से अनसिविल थीं। इन्होंने दिल्ली यूनिवसिॆटी में खूब लड़कियों को छेड़ा। लड़कियों का जीना हराम कर दिया। उपर जो जुमले लिखे हैं, वो तो बस नमूने भर है। इससें भी खतरनाक जुमले इन लोगों ने उस समय इस्तेमाल किए होंगे। ये पहली बार नहीं है जब भावी कास्टेबलों ने इस तरह की हरकतें दिखाई हैं। पिछले साल मेरठ में भी इसी तरह की घटना हुई थी। वहां पुलिस की भतीॆ में शामिल होने आए लड़कों ने एक लड़की के कपड़े फाड़ दिए थे। इस तरह के लोग अगर दिल्ली पुलिस में शामिल होंगे। तो आप अंदाजा लगा सकते हैं, कि ये लोग किस हद तक महिलाओं की हिफाजत करेंगे। इन कास्टेबलों में अधिकतर की तादाद ऐसे लोगों की है, जो अपने जमाने में महान लड़की छेडू रह चुके होते हैं। खैर लड़कियों की हिफाजत उपर वाला ही करें। इन लड़कों के उपर एक कविता लिख रहा हूं।

दिल्ली के छिछोरे लड़कों की यहीं कहानी
चाहिए इन्हें लड़कियां और थोड़ा माल-पानी।
करते हैं खूब ये अपनी मनमानी
कर डाला इन्होंने समाज को पानी-पानी।

5 comments:

विवेक सत्य मित्रम् said...

भूपेन्द्र, लेख का विषय बढ़ियां है। इसके शीर्षक के भी क्या कहने, खूब टीआरपी आएगी। लेकिन इस पर थोड़ा और होमवर्क हुआ होता तो मजा आ जाता। हां, आखिर में लिखी कविता तो जानलेवा किस्म की है....लिखते रहिए। खूब नाम कमाएंगे।

bhupendra said...

होमवकॆ का क्या मतलब है आपका। क्या मुझे वो सब लिखना चाहिए था, जो बस में लड़कियों के साथ होता है। बताइगा जरूर।

om kabir said...

भई, भूपेंन्द्र जी। आपने तो काफी कुछ खोलकर रख दिया है। उन लोगों की बघिया ऊखाड़ दी है। लेकिन उनको तो फिर भी शमॆ नहीं आती। आपने इतने सामाजिक मुद्दे को उठाया है जिससे हम लोग रोज रू-ब-रू होतें हैं। इस मुद्दे को ज्यादा शिद्दत से उठाना है। ताकि इन लोगों को खुद पर तो शमॆ आए।

bhupendra said...

ओमकबीर जी धन्यवाद। लेकिन एक बात पूछना चाहता हूं कि क्या ये छिछोरे लड़कें ब्लाग पड़ते हैं। अगर पड़ते हैं, तो जरूर शमॆ आएगी।

alok said...

badmash ladkon ke khilaph ek muhaim shuru karni chaiye. mai aap ke is kadam ki tarrif karta hon.
kyonki jis des, rajya, sahar main mahilayon ki ijjat nahi hoti woh des, rajya, sahar kabhi viksit nahi ho sakta.