Saturday, December 1, 2007

जरा इधर भी देखें यशवंत जी

माफ कीजिएगा ज्यादा समझ नहीं है। लेकिन नंदीग्राम को जितना समझा, लिख रहा हूं। यशवंत जी का कमेंट पढ़ा। लगा कि उन्होंने कामरेड के पत्र को बहुत सामान्य तरीके से ले लिया है। यही एक खामी है कम्युनिस्टों में अपने खिलाफ सुन नहीं सकते। खैर बहुत दिनों से एक बात समझने की कोशिश कर रहा हूं कि वामपंथी पाटीॆ है कौन सी। सीपीएम, सीपीआई या फारवडॆ ब्लाक। ये लोग सांप्रदायिकता के मुद्दे पर तो एक हो जाते हैं। लेकिन नंदीग्राम के जैसी घटना पर अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं। भई अगर लोगों की भलाई में यकीन ही करते हो जहां भी लोगों पर जुल्म हो सामने आइए। लेकिन सभी वामपंथी मुंह छिपाए फिर रहे हैं। कोई कुछ बोलता ही नहीं, सिवाय बुद्धदेव के, जो अपनी करनी को जायज ठहरा रहे हैं। गोधरा कांड पर तो उछल-उछलकर सामने आ रहे थे। बयानबाजी हो रही थी। अब क्या हुआ। बोलती बंद। अपनी पाटीॆ के गलत करने पर उसे गरियाते क्यों नहीं। जब गोधरा कांड हुआ था। उस समय भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे बेहद शमॆनाक घटना बताया था। मैं पूछता हूं कि क्या प्रकाश कारत, बुद्धदेव भट्टाचायॆ, एबी बधॆन और ज्योति बसु में इतनी ताकत हैं कि वह नंदीग्राम की घटना को शमॆनाक करार दे सके। अभी तक तो ऎसा हुआ नहीं है। आगे भी उम्मीद कम ही है। इन वामपंथियों ने अपने चेहरे पर एक नकाब ओढे बैठे हैं। बाहर से कुछ और अंदर से कुछ और। मैं पूछता हूं कि क्या नंदीग्राम में मुसलमानों पर अत्याचार नहीं हुआ। देखा जाए तो वामपंथियों ने नंदीग्राम में अपनी असली औकात दिखाई है। मुसलमानों पर ही अधिक गोली बरसाई है। तो क्या अब हम बुद्धदेव की तुलना नरेंद्र मोदी से करें। उन्हें भी सांप्रदायिक ताकतों का लेबल दे दे। तस्लीमा नसरीन के मुद्दे पर जो हो रहा है। उससे वामपंथियों की हकीकत सामने आ गई है। मुसि्लम वोट खिसक न जाए, इसलिए तस्लीमा को बंगाल में घुसने नहीं दिया जा रहा। इतनी ही मुसि्लमों की चिंता थी तो नंदीग्राम में उनपर गोलियां क्यों बरसाई। नंदीग्राम पर जो महसूस किया उसे एक कविता के बारे में पेश कर रहा हूं।

वाम क्यों है लाल,
कर दिया उसने लोगों का जीना मुहाल।
बुद्धदेव बन गए है तानाशाह,
अब नहीं उन्हें किसी की परवाह।
दनादन चलवा रहे हैं नंदीग्राम में गोली,
कहते है जायज है काडर की यह खूनी होली।
बेचारी महिलाऒं की लुट रही है इज्जत,
लेकिन काडर की थमती नहीं बगावत।
नंदीग्राम में हर तरफ मचा है हाहाकार,
कोई तो समझाओ बुद्धदेव को मेरे यार।

1 comment:

satyendra... said...

आपके विचार सटीक हैं। गंभीरता है। समझ है। एक सोच है। रही बात ...वाद... की तो बड़े बड़े वादियों को देखा है। टुच्चे से स्वार्थ के लिए नंगे हो जाते हैं। सारे विचार हवा हो जाते हैं।
लेख सही है, इसका शीर्षक बेहतर लिखें। वह समझ में नहीं आ रहा है। यह लेख पूरे समुदाय, समाज और सभी वादियों के लिए है।