Saturday, September 20, 2008
जांबाजी कही बिकती नही .....
जोश, जज्बा और देशभक्ति कही से खरीदी नही जाती .....ये पैदा होती है अपने देश की मिटटी के जुडाव से .....ये पैदा होतो है अपने परिवार के संस्कारो से ......दिल्ली पुलिस के जांबाज पुलिस इंस्पेक्टर शहीद मोहन चंद शर्मा को शत - शत नमन....जनवरी २००८ को राष्ट्रपति द्वारा मैडल लेते समय देखने वालो में कोई यह नही सोचा होगा की यह उनके लिए आखिरी मैडल होगा ....लेकिन आज यह सही है .....कारगिल हो या फ़िर कोई और जंग या कोई पुलिसिया मुठभेड़ हर जगह ये आतंकवादी या क्रिमिनल मरते है तो अखबार , न्यूज़ चैनल अपनी भड़ास निकालने पहुच जाते है ...स्टोरी बानाने का सिलसिला चल पड़ता है .....लोग भीड़ बढाते है नारे बाजी करते है ..स्थानीय भी राजनीतिक रोटी सेकने पहुच जाते है .....आज एक पुलिस का जवान शहीद हुआ है ....खबरों में इनकी शहादत को तव्वजो दी गई है लेकिन शायद इससे ज्यादा तव्वजो दी गई है उस ख़बर को जो मुठभेड़ से जुदा था ...हर पत्रकार बंधू अपने अखबार या चैनल के लिए सबसे पहले ब्रेकिंग करना चाहता था ....शायद नौकरी के लिए यह जरुरी भी था........निवेदन है इन पत्रकार भाइयो से की इस जांबाज इंस्पेक्टर के परिवार की स्थिति के बारे में भी कुछ दिखाए ....
Friday, September 19, 2008
आतंकवाद में समाज की भूमिका ......
ब्लास्ट होता है लोग मरते है फ़िर स्थिति सामान्य होती है ...समय के साथ लोगो की दिनचर्या भी सामान्य हो जाती है......कुछ लोगो को पुरस्कार मिलता है तो कुछ लोगो को मुवावजा ...क्या इसके पीछे कोई यह सोचता है कि उन लोगो का क्या होता है जो इसके शिकार होते है ......क्या इन सब के बाद सुरक्षा व्यवस्था सुधर जाती है ? नही वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति चलती है .....आख़िर पुलिस क्या - क्या करे किस -किस को खंगाले .....जब भी कोई इनकाउंटर होता है तो कुछ समाज के ठेकेदार या फ़िर कहा जाय कि ये सामाजिक लोग ये जरुर कहते फिरेंगे कि ये इनकाउंटर पूर्व नियोजित था .....या कुछ मानवाधिकारी बंधू कूद के आ जायेंगे कहेंगे कि यह मानवाधिकार के खिलाफ है .......आख़िर में हम ये सवाल करते है कि ये सामाजिक लोग और मानवाधिकारी लोग उस समय कहा जाते है जब ब्लास्ट होता है ? पुलिस तो जो भी कर रही है कही न कही से जनता कि और देश की भलाई ही कर रही है .....अभी हाल में एक फ़िल्म आई थी वेडनेसडे जिसमे नसरुद्दीन शाह ने एक आम आदमी कि भूमिका निभाई थी ....वो आम आदमी मुंबई ब्लास्ट से परेशान था .....उसने आतंकवादियों के खिलाफ वो कदम उठाया जो आतंकवादी देश के खिलाफ उठाते है .....अगर आज देश का हर आम आदमी इस फ़िल्म के हीरो कि भूमिका निभाने लगे तो ......देश कि सुरक्षा एजंसियों का क्या होगा ?
Saturday, September 13, 2008
आखिर कितनी बलि लेंगे गृहमंत्री साहब ?

" आज दिल्ली में धमाके हुए हैं और उसमें अब तक जो हमारे पास मालूम्मात आई है उसके मुताबिक 18 लोगों की जानें गई हैं.. जिन्होंने भी ये किया है वो इंसानियत के शत्रु हैं, हमारे देश के शत्रु हैं, औऱ हमारे यहां की शांतता में खलल डालना चाहते हैं.. ऐसा करने वालों की हम घोर भर्त्सना करते हैं...जिनके घरवालों की मृत्यु हुई है...हम उनके प्रति हार्दिक संवेदना प्रगट करते हैं...जिन लोगों ने भी ये किया है... उन्हें भारत के कानून के हिसाब से कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाएगी..." ये सारे अल्फाज़ हमारे देश के काबिल गृहमंत्री शिवराज पाटिल के मुंह से निकले हैं। जो दिल्ली में हुए पांच धमाकों पर अपनी रुटीन बाइट देते हुए उन्होंने कहे। अब तो उन्हें इसकी आदत सी पड़ गई है..और धमाकों के बाद दिए जाने वाले बयान तो उन्हें जुबानी याद हो गए हैं... बस जगह और मरने वालों की संख्या में अपडेट लेकर हेर फेर कर देते हैं। अयोध्या, वाराणसी,लखनऊ, दिल्ली, फैजाबाद, मुंबई, मालेगांव, हैदराबाद, अजमेर, जयपुर, अहमदाबाद, सूरत, और एक बार फिर दिल्ली। ये स्वर्णिम इतिहास है यूपीए सरकार का। महज पांच साल में अमन के फरिश्तों की इस फौज ने देश को लाल रंग में रंग दिया है। हर धमाके के बाद..सूट बूट पहने हमारे गृहमंत्री साहब मीडिया से मुखातिब होते हैं..और वही घिसी पिटी बातें दोहरा जाते हैं। उनके बयान सुनकर लगता ही नहीं कि देश का गृहमंत्री बोल रहा है। ऐसा लगता है.. धमाकों से हैरान परेशान पुलिस का कोई मामूली प्रवक्ता अपनी सफाई दे रहा है... क्या यही सलीका है एक गृहमंत्री के बयान देने का। शिवराज पाटिल साहब कितने भोलेपन से कह देते हैं, कानून अपना काम कर रहा है..। धमाकों के बाद राज्य सरकार औऱ केन्द्र के बीच जो कुत्ते बिल्ली की लड़ाई शुरु हो जाती है... वो बताता है कि कोई भी आम आदमी की जिंदगी की हिफाजत की गारंटी लेने को तैयार नहीं है। सुरक्षाबलों की टुकड़ी से लैस बंगलों में रहने वाले..और बुलेटप्रूफ गाड़ियों में सैर करने वाले इन नेताओं को भला क्या मालूम...। कैसा लगता है एक शख्स को हजारों किलोमीटर
दूर अपने घरवालों को धमाके के बाद ये बताते हुए कि इस बार भी वो बच गया है। मिस्टर शिवराज पाटिल अगर आप निहायत ही गांधियाना अंदाज में हमें ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि अब हिंदुस्तान भी अफगानिस्तान,इराक, फलस्तीन औऱ पाकिस्तान बन चुका है...जहां लोगों को धमाकों औऱ गोलीबारी के बीच जीने की आदत पड़ गई है... और हमें भी
इसके साथ ट्यूनिंग बना लेनी चाहिए... तो आपको बता दें, आप गलतफहमी में हैं.. कि आप यूं हीं आवाम की लाशों पर खड़े होकर शांतिपूर्वक भाषण देते रहेंगे...और हम इंतजार करते रहेंगे कि अब हमारी सरकार आतंकवादियों को सबक सिखाएगी। हमें मालूम है... कश्मीर से लेकर इस्लामी आतंकवाद पर बोलते हुए आपका गला फंस जाता है। मगर आप ये भी समझ लीजिए.. न्यूक्लियर डील के सब्जबाग दिखाकर अगली बार आप सत्ता तक नहीं पहुंच पाएंगे...। बेगुनाहों की जिंदगी से खेलने वाले हिजड़ों को तो ये जनता हर बार बताती है... कि उनकी औकात कितनी है। मगर, क्या आपको ये समझ में नहीं आता इस्लाम और जेहाद के नाम पर खून की होली खेलने वालों का कोई मजहब नहीं है... फिर वोटबैंक की चिंता कैसी...किसी भी समुदाय का तुष्टिकरण कैसा। आखिर बेखौफ जीने के लिए कितनी और बलि देनी होगी हमें..।
कम से कम यही साफ कर दीजिए....।
Thursday, September 11, 2008
मिथिलेश...तुमने छाया को क्यों मारा ?
आखिर उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था। ऐसी कौन सी खता कर दी थी, जिसकी कीमत उसे जान देकर चुकानी पड़ी। यही ना कि वो आंख बंद कर तुम पर यकीन करती रही। क्या उसकी गलती ये थी। तुम्हारी बातें उसने ना केवल सुनीं बल्कि उन पर यकीन भी किया। या फिर तुमने उसे जो कुछ दिखाया, सुनाया, उसने उन पर सवाल खड़े नहीं किए। बस सब कुछ मानती गई। पर इसमें उसकी क्या गलती है। उसकी अभी उम्र ही क्या थी। लगातार दो दिन तक तुम उसे डराते रहे। धमकाते रहे, बस मौत करीब है। और वो तुम्हारी धमकियों को सच मानती रही। जी हां, ये कहानी है..16 साल की उस मासूम छाया की, जो पिछले दो दिनों से न्यूज चैनल पर चल रही प्रलय की खबरों पर यकीन करने लगी थी...। ये लड़की मध्य प्रदेश में राजगढ़ जिले की सारंगपुर कस्बे की रहने वाली थी...। जेनेवा में होने वाला महाप्रयोग.. उसके लिए सचमुच का प्रलय बनकर आया। क्योंकि न्यूज चैनलों ने इस खबर को बेचने की कोशिश में डर, खौफ और दहशत का जो माहौल बनाया था.. उसमें ऐसा होना तय था। अगर अब ये न्यूज चैनल प्रलय और छाया की मौत को आपस में जोड़कर एक नया टीआरपी शो गढ़ दें तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। दो दिनों से छाया न्यूज चैनल पर चल रहे महाप्रलय शो से चिपकी रही। वो भी उस वक्त इन चैनलों के टीआरपी का हिस्सा बनी। जिसके लिए ये सारा खेल खेला गया। लेकिन ज्यों ही महाप्रलय का बुधवार आया। उसने भयावह मौत मरने की बजाए। सल्फास की गोलियां खाकर मरना पसंद किया। उसे इंदौर के अस्पताल में ले जाया गया, बचाने की कोशिशें भी हुईं। मगर जिसे मारने की साजिश दर्जनों न्यूज चैनलों ने रची हो। भला उसकी जान कहां बचने वाली थी। उधर जेनेवा में महाप्रयोग शुरु हुआ। इधर चैनलों ने दिखाना शुरु किया। क्या सचमुच मिट जाएगी धऱती। मगर जैसे जैसे दिन चढ़ता गया। चैनल के कर्ताधर्ताओं को लगा। अब पब्लिक जान चुकी है,प्रलय-वलय कुछ नहीं आने वाला। तो इन चैनलों ने अपने स्टूडियो में एक जानकार को बिठा लिया। और लोगों को लगातार ये बताते रहे कि उन्हें डरने की कोई जरुरत नहीं। प्रलय जैसा कुछ भी नहीं होने जा रहा। वाह रे मायावी न्यूज चैनल। काश,गिरगिट की तरह बदलते चैनल्स का असली रंग वो देख पाई होती..तो शायद एक जिंदगी टीआरपी की भेंट नहीं चढ़ती। इंदौर पुलिस ने 16 साल की छाया की खुदकुशी के सिलसिले में मामला भी दर्ज कर लिया है और छानबीन भी शुरु कर दी है। मगर क्या सचमुच गुनहगारों को सजा मिल पाएगी। आखिर छाया की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा। उतनी ही तेज आवाज में चीखकर कौन कहेगा..हां मैंने मारा है छाया को..जितनी चीख पुकार के अंदाज में प्रलय की बात कर लोगों को डराया गया। ये तमाम सवाल हर उस शख्स से है। जो मीडिया का हिस्सा है। मुझसे, आपसे और भी दूसरों से जिन्हें नाम से मैं नहीं जानता। मिथिलेश का नाम इसलिए लिया क्योंकि मैं जानता हूं..मेरे चैनल पर महाप्रलय की भविष्यवाणी जिस प्रोग्राम में की गई। वो उसने बनाया था। मैं ये भी जानता हूं। जानते समझते हुए भी कि वो गलत कर रहा है, उसने अपनी ओर से कोई कोशिश नहीं छोड़ी थी,वो नायाब शब्द तलाशने में जिनसे सचमुच प्रलय और तबाही का भयावह मंजर दिमाग में डाला जा सके। क्योंकि इस वक्त उसके लिए ये महज एक असाइनमेंट था। और आखिरकार उसके जैसे पचासों लोगों की मेहनत रंग लाई। कम से कम छाया के परिवार वालों के लिए तो प्रलय आ ही गई। मैं शर्मिंदा हूं। मैं भी उसी जमात का हिस्सा हूं जो दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में किसी की जिंदगी से खेलने से भी बाज नहीं आते। मिथिलेश, मैं जानता हूं..तुम्हारा वश होता तो तुम ऐसा प्रोग्राम कभी नहीं बनाते...। हकीकत तो ये है, गुनहगार मैं भी हूं..मैंने उस रात तुमसे कहा था...'बहुत बढ़िया प्रोग्राम बनाया'। काश,हम जान पाते खबर से खेलना बहुत खतरनाक होता है।
Saturday, August 30, 2008
फास्ट फूड़ बना योग

योग गया अमेरिका योगा बन बैठा। स्वदेश वापसी पर लोगों को योग का महत्व समझ में आया। आख़िर आए भी क्यों ना विदेश का मुल्लमा जो चढ़ गया है। टी.वी.सेट पर चिपके लाखो लोग योग सीख रहे हैं। बस में बैठी भीड़ नाखून घिस बाल उगाने की दवा कर रही है। योग साधना ना होकर फास्ट फूड़ बन गया है। दो चम्मच खाओ और भूख मिटाओ। जिसे देखो योग सीखा रहा है योग का प्रचार कर रहा है। सभी ख़ुश है दावा करते है हमारी पुरानी विधा फिर से लोगों के दिलों में जगह बना रही है। और इसका असर हम भारतीयों पर ज़रूर दिखेगा और एक स्वस्थ भारत बना कर ही हम सभी दम लेगें। सुबह की ही ख़बर है एक महिला आसन करने बैठी और अस्पताल पहुँच गयी। कारण लिखा था टी.वी. और कुछ किताबें पढ़कर योग सीखना मँहगा पड़ गया और स्वास्थ लाभ लेने अब अस्पताल के आई.सी.यू. में दाखिल हैं। सवाल कई वर्षो से उठ रहे थे कि योग को जन-जन तक पहुँचाने के लिए क्या इसका बाज़ारू संस्करण उचित है? बार-बार मन कहता है इसमें हर्ज ही क्या है? आख़िर हमारी तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में योग भी तो रफ़्तार वाला होना चाहिए। बिना किसी मिर्च मसाले के यह योग हमें ना तो स्वादिष्ट लगेगा और ना ही हमारी पाचन शक्ति इतनी अधिक है कि हम इसे शुध्द रूप में पचा लें। हाजमा ख़राब होने का ड़र भी है। जब इतनी दिक्कतें है तो मै क्यों योगा तो योग बनाऊं इसे तो योगा ही रहने दो बड़ा ही सुखदायी है। माना कि हठप्रदिपिका में योग के यम,नियम बताऐं गऐं हैं लेकिन मुश्किल ये है इसे जानने वाले कम है और साथ ही मानने वाले भी। क्रिया और प्राणायाम में भेद ना बता पाने वाले लोग योग सीखा रहे हैं। लोगों का भरोसा भी इसी पर क़ायम है। बात साफ़ है उपभोगितावाद में जितनी चमकदार चीज़ होगी उतनी ही अच्छी होगी सभी यही मानते है इसमें मै भी शामिल हूँ। एक दो घटनाओं से लोगों की चेतना शायद ही जागे। लेकिन इस योग,योगा और अब शिल्पायन की कही तो सीमा रेखा होगी। कभी तो लोग इस विधा से खिलवाड़ करना बन्द करेगें। ऐसा मेरा विश्वास है। क्या यह संभव है...।
Friday, August 29, 2008
बिहार में प्रलय...लेकिन क्या है उपाय ?
बिहार में बाढ़ इस बार कयामत बनकर आयी है। ये वो बाढ़ नहीं है जो साल-दर साल आती थी और दस-पांच दिन रहकर चली जाती थी। इस बार नेपाल में कोसी नदी का पूर्वी तटबंध टूट गया और बिहार के आधा दर्जन से ज्यादा जिले पानी में डूब गए। लेकिन सवाल ये है कि क्या इस बाढ़ से उबरने का कोई उपाय है या फिर बिहार के ये जिले काल के थपेड़ों से घायल होकर धीरे-धीरे बीरान बनते जाएंगे। इतिहासकारों का अनुमान है कि सिंधु घाटी सभ्यता के खत्म होने की एक वजह इसी तरह की कुछ बाढ़ थी जिससे एक उन्नत सभ्यता तबाह हो गई। बहुत पहले जनसत्ता में जल संरक्षण और नदियों के प्रख्याद जानकार अनुपम मिश्र का एक लेख पढ़ा था। प्रो मिश्र का कहना था कि हम नदियों पर बांध बनाकर जबर्दस्ती बाढ़ का समाधान नहीं निकाल सकते। हमें नदियों के साथ जीना सीखना होगा। हमें नदियों के पानी को बिना किसी छेड़छाड़ के पहाड़ से समंदर तक जाने देना होगा। अगर हमने इसमें बाधा डाली तो प्रकृति का कोप हमें झेलना ही होगा। और अगर गौर से देखें तो पिछले सौ सालों में यहीं हुआ है।
बाढ़ की सबसे बड़ी वजह है नदियों की सिल्टींग। जब तक नदियों की सिल्टींग नहीं हटाई जाएगी, बाढ़ पर प्रभावकारी ढ़ंग से रोक लगाना नामुमकिन है। इसकी वजह ये है कि जब-जब पानी को समंदर तक जाने में अवरोध पैदा हुआ है, उसका पानी किनारे में फैल जाता है। अगर देखा जाए सिल्टींग हटाना मुश्किल नहीं है और ये बिहार जैसे प्रान्त में बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा कर सकता है।खासकर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को इस तरफ मोड़ा जा सकता है। दूसरी बात ये कि नदियों के किनारे सिल्ट का ऊंचा तटबंध सड़क बनाने, पर्यटन को बढ़ावा देने और तमाम दूसरे तरह के उपयोगी कामों को करने के लिए किया जा सकता है।
बिहार से बहनेवाली नदियों का स्रोत नेपाल में है। और उस पानी पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है और उस पानी को नेपाल में रोका भी नहीं जा सकता। सबसे बड़ी बात ये कि अतीत में कभी नेपाल की तराई में और पहाड़ी ढ़लानों पर घने जंगल हुआ करते थे जिस वजह से पानी धीरे-धीरे बह कर मैदानों में आती थी। लेकिन पिछले सौ-डेढ़ सौ सालों के दौरान नेपाल में बड़े पैमाने पर जंगल की लूट हुई है, साथ ही हमारे यहां भी आवादी बेतहाशा बढ़ी है। बिहार की सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती सिवाय केन्द्र पर दबाव देने के। हां, भारत सरकार नेपाल सरकार के साथ मिलकर छोटे-2 बांध बनाने के और वनीकरण की एक दीर्घकालीन नीति बना सकती है। इसके लिए हमें नेपाल में हजारों करोड़ रुपये निवेश करने पड़ सकते हैं और दोनों देशों के हित के लिए आपसी विश्वास का माहौल बनाकर इसकाम को वाकई अंजाम दिया जा सकता है।
अहम बात ये भी है कि हमने छोटी-छोटी धाराओं को भरकर खेत और मकान बना लिए है। वो जमीन जो रिकॉर्ड में सरकारी जमीन के नाम से दर्ज हैं, उसकी बड़े पैमाने पर लूट हुई है। हमें कड़े कानून बना कर उसे रोकना होगा। हमें पानी की छेड़छाड़ को जघन्य अपराध घोषित करना होगा। इधर, विकास की ऐसी योजनाएं बनी हैं जो पानी की धारा के बिपरीत है। उत्तर बिहार में जमीन का ढ़लान उत्तर से दक्षिण की तरफ है और दक्षिण बिहार में दक्षिण से उत्तर की तरफ, लेकिन कई ऐसी सड़के है जो पूरब से पश्चिम बनाई गई है और पानी के बहाव को रोकती है। मोकामा में टाल का इलाका शायद इन्ही कुछ वजहों से बना है जब पटना-कलकत्ता रेलवे लाईन ने पानी को गंगा की तरफ जाने में अवरोध पैदा किया।पानी कि निकासी के उपयुक्त रास्ते नहीं छोड़े गए। दरभंगा-मुजफ्फरपुर हाईवे, दरभंगा-निर्मली रेलवे लाईन इसके कुछेक उदाहरण हैं-यहां ये बात कहने का मतलब विकास का विरोध नहीं है। हां, विकास ऐसा हो ताकि उसका प्रकृति के साथ तारतम्य हो।
दूसरी तरफ पिछले पचास साल में नदी परियोजनाओं में जो सरकारी लूट हुई है उसकी जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक आयोग बनना चाहिए। अतिरिक्त पानी को रोकने के लिए और सिंचाई के लिए कई नदी परियोजनाएं बनी है। लेकिन बिहार में उनमें से बहुत कम सफल हुई है। कोसी परियोजना की बात करें तो पश्चिमी कोसी नहर जो मेरे गांव के बीच से होकर गुजरती है-उसे 1983 में ही पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन वो आज तक पूरी नहीं हुई। शायद ये दुनिया के सबसे बड़े घोटालों में से एक है। मुझे लगता है कि अगर नदी परियोजनाओं को ही ठीक से लागू किया जाता तो बाढ़ की पूरी नहीं तो आधी समस्या का समाधान तो जरुर हो जाता। शायद अभी भी पूरी बर्बादी नहीं हुई है। इसबार के जलप्रलय ने हमें सोते से जगाया है। कुलमिलाकर जब तक बाढ़, राजनेताओं और जनता के एजेंडे में नहीं आएगा,तब तक इससे निजात पाना मुश्किल है।
बाढ़ की सबसे बड़ी वजह है नदियों की सिल्टींग। जब तक नदियों की सिल्टींग नहीं हटाई जाएगी, बाढ़ पर प्रभावकारी ढ़ंग से रोक लगाना नामुमकिन है। इसकी वजह ये है कि जब-जब पानी को समंदर तक जाने में अवरोध पैदा हुआ है, उसका पानी किनारे में फैल जाता है। अगर देखा जाए सिल्टींग हटाना मुश्किल नहीं है और ये बिहार जैसे प्रान्त में बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा कर सकता है।खासकर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को इस तरफ मोड़ा जा सकता है। दूसरी बात ये कि नदियों के किनारे सिल्ट का ऊंचा तटबंध सड़क बनाने, पर्यटन को बढ़ावा देने और तमाम दूसरे तरह के उपयोगी कामों को करने के लिए किया जा सकता है।
बिहार से बहनेवाली नदियों का स्रोत नेपाल में है। और उस पानी पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है और उस पानी को नेपाल में रोका भी नहीं जा सकता। सबसे बड़ी बात ये कि अतीत में कभी नेपाल की तराई में और पहाड़ी ढ़लानों पर घने जंगल हुआ करते थे जिस वजह से पानी धीरे-धीरे बह कर मैदानों में आती थी। लेकिन पिछले सौ-डेढ़ सौ सालों के दौरान नेपाल में बड़े पैमाने पर जंगल की लूट हुई है, साथ ही हमारे यहां भी आवादी बेतहाशा बढ़ी है। बिहार की सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती सिवाय केन्द्र पर दबाव देने के। हां, भारत सरकार नेपाल सरकार के साथ मिलकर छोटे-2 बांध बनाने के और वनीकरण की एक दीर्घकालीन नीति बना सकती है। इसके लिए हमें नेपाल में हजारों करोड़ रुपये निवेश करने पड़ सकते हैं और दोनों देशों के हित के लिए आपसी विश्वास का माहौल बनाकर इसकाम को वाकई अंजाम दिया जा सकता है।
अहम बात ये भी है कि हमने छोटी-छोटी धाराओं को भरकर खेत और मकान बना लिए है। वो जमीन जो रिकॉर्ड में सरकारी जमीन के नाम से दर्ज हैं, उसकी बड़े पैमाने पर लूट हुई है। हमें कड़े कानून बना कर उसे रोकना होगा। हमें पानी की छेड़छाड़ को जघन्य अपराध घोषित करना होगा। इधर, विकास की ऐसी योजनाएं बनी हैं जो पानी की धारा के बिपरीत है। उत्तर बिहार में जमीन का ढ़लान उत्तर से दक्षिण की तरफ है और दक्षिण बिहार में दक्षिण से उत्तर की तरफ, लेकिन कई ऐसी सड़के है जो पूरब से पश्चिम बनाई गई है और पानी के बहाव को रोकती है। मोकामा में टाल का इलाका शायद इन्ही कुछ वजहों से बना है जब पटना-कलकत्ता रेलवे लाईन ने पानी को गंगा की तरफ जाने में अवरोध पैदा किया।पानी कि निकासी के उपयुक्त रास्ते नहीं छोड़े गए। दरभंगा-मुजफ्फरपुर हाईवे, दरभंगा-निर्मली रेलवे लाईन इसके कुछेक उदाहरण हैं-यहां ये बात कहने का मतलब विकास का विरोध नहीं है। हां, विकास ऐसा हो ताकि उसका प्रकृति के साथ तारतम्य हो।
दूसरी तरफ पिछले पचास साल में नदी परियोजनाओं में जो सरकारी लूट हुई है उसकी जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक आयोग बनना चाहिए। अतिरिक्त पानी को रोकने के लिए और सिंचाई के लिए कई नदी परियोजनाएं बनी है। लेकिन बिहार में उनमें से बहुत कम सफल हुई है। कोसी परियोजना की बात करें तो पश्चिमी कोसी नहर जो मेरे गांव के बीच से होकर गुजरती है-उसे 1983 में ही पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन वो आज तक पूरी नहीं हुई। शायद ये दुनिया के सबसे बड़े घोटालों में से एक है। मुझे लगता है कि अगर नदी परियोजनाओं को ही ठीक से लागू किया जाता तो बाढ़ की पूरी नहीं तो आधी समस्या का समाधान तो जरुर हो जाता। शायद अभी भी पूरी बर्बादी नहीं हुई है। इसबार के जलप्रलय ने हमें सोते से जगाया है। कुलमिलाकर जब तक बाढ़, राजनेताओं और जनता के एजेंडे में नहीं आएगा,तब तक इससे निजात पाना मुश्किल है।
Wednesday, August 27, 2008
आफिस में लेट .........
सुबह ७ बजे का अलार्म घनघनाया और मन भन्ना गया ....आज किसी तरह आफिस जल्दी पहुचना था.... इसलिए कोसा बहुत अपने आप को लेकिन उठना था क्योकि जीवन के जद्दोजहद से जूझना था .....फ़िर क्या था ....गिरते पड़ते पंहुचा आफिस के गेट पर मोबाईल में देखा कि नौ बज के पच्चीस मिनट हो गए बस कर दिया हस्ताक्षर .....शुरू हो गई नौकरी .......स्टोरी आईडिया और खबरों का दौर.....इसी बीच कुछ मित्रो को हो गई देर कर दिए लेट और हो गए रजिस्टर में अनुपस्थित .....कट गई तनख्वाह .....मरते क्या न करते वाली हाल ने उन्हें अन्दर से झकझोर दिया ....बेचारे कुछ देर तो बिताये आफिस में ...लेकिन दे गया धैर्य जबाब वो भी कोसे किस्मत को ......और निकल पड़े घर की ओर .....सिलसिला निरंतर जारी रहेगा .......दोस्त अभी तो स्टोरी बाकी है.....ये कहानी किसी भी आफिस की हो सकती है इसलिए सावधान .................ध्यान दीजिये समय की पाबन्दी को ....
Tuesday, August 26, 2008
भारत के लिए खतरनाक हो सकते हैं शरीफ़
नवाज शरीफ और जरदारी के गठबंधन टूटने की उम्मीद पहले से ही थी। परवेज मुशर्रफ जब तक थे तब तक तो दोनों में एका था लेकिन मुशर्रफ के जाते ही दोनों की एकता ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। लेकिन गौर करने की बात जो है वो ये कि गिलानी सरकार के गिरने से सबसे तगड़ा झटका अमेरिका को लगेगा। अमेरिका ने बड़ी होशियारी से मुशर्रफ के अलोकप्रिय होते जाने की सूरत में भुट्टो परिवार को पाकिस्तान की कमान सौंपने के लिए जमीन तैयार की थी जिसे पाकिस्तान का कट्टरपंथी तबका भांफ गया था। नतीजा बेनजीर की हत्या में सामने आया। हत्या के बाद अमेरिका ने जरदारी पर दांव लगाया, लेकिन शरीफ, जरदारी को तभीतक बर्दाश्त करते रहे जबतक की उनके राह से मुशर्रफ का कांटा दूर न हो गया। अब, जबकि शरीफ, जजों की बहाली के मामले पर अड़ गए और दूसरी तरफ जरदारी ने राष्ट्रपति पद के लिए अपने नाम की उम्मीदवारी घोषित कर दी तो मामला खतरनाक हो गया।
नवाज शरीफ जजों की बहाली इसलिए चाहते हैं कि इससे उनके कई हित सधते हैं। पहला तो ये कि चौधरी इफ्तिकार हुसैन आते ही मुशर्रफ पर मुकदमा चलाते कि उन्होने 1973 के संविधान के साथ छेड़खानी की, जिसके लिए मौत की सजा तक का प्रावधान है।दूसरी बात ये थी कि जरदारी पर जो भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे उसे मुशर्रफ ने एक विशेष आदेश के जरिए हटा दिया था। अगर चौधरी इफ्तिकार हुसैन बहाल हो जाते हैं और मुशर्ऱफ पर गैरकानूनी ढंग से सत्ता हथियाकर संविधान के उल्लंघन का आरोप लगता है तो फिर जरदारी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप भी जिंदा हो जाएंगे और उन के खिलाफ मुकदमे फिर खुल जाएंगे। तीसरी बात ये कि चौधरी इफ्तिकार हुसैन ने उस मकदमें की भी सुनवाई की थी जिसके तहत मुशर्रफ सरकार ने 300 कट्टपंथियों को पकड़कर अमेरिकी खुफिया एजेंसी को सौंप दिया था।अगर चौधरी की फिर से बहाली हो जाती है तो उन 300 आदमियों की लिस्ट फिर सरकार से मांगी जाएगी। अमेरिका की पाकिस्तान में बची खुची छवि तार-तार हो जाएगी, लोग अमेरिकी दूतावास पर पथराव करेंगे और अमेरिका का पाकिस्तान में जमे रहना मुहाल हो जाएगा। जाहिर है अमेरिका अंतिम वक्त तक कोशिश करेगा कि जजों की बहाली न हो-भले ही इसके लिए सीआईए को बड़े पैमाने पर खून-खरावा ही क्यो न करवाना पड़े।
दूसरी बात जो महत्वपूर्ण है-जरदारी भले ही पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टी के नेता हों, वो जमीन के नेता नहीं है। अव्वल तो बनजीर की हत्या के बाद उनकी पार्टी को इतनी सीटें मिल गई है, दूसरी बात ये कि पाकिस्तानी समाज का क्षेत्रीय अतर्विरोध ऐसा है जिसमे पंजाबी समुदाय इतना उदार नहीं है कि किसी सिंधी को ज्यादा दिन तक सत्ता में बर्दाश्त कर सके। ये अलग बात है कि समय-समय पर गैर-पंजाबी हुक्मरान भी पाकिस्तान में सत्ता पर काबिज रहें है लेकिन प्रभावी सत्ता पंजाबियों के पास ही रही है। और यहीं वो बिन्दु है जहां नवाज शरीफ, जरदारी पर भारी पर जाते हैं। देखा जाए तो पिछले दिनो जितने भी सियासी नाटक पाकिस्तान में हुए हैं उसमें मुद्दे की लड़ाई नवाज ने ही लड़ी है-चाहे वो लोकतंत्र की बात हो, मुशर्रफ को हटाना हो या जजों की बहाली हो। जरदारी तो मुशर्रफ के पिछलग्गू ही दिखे हैं और उन्होने यथास्थिति ही कायम रखने का प्रयास किया है। और इसीलिए तो मुशर्रफ ने बेनजीर को पाकिस्तान आने भी दिया था ताकि सत्ता का हस्तांतरण बिना विवाद के हो जाए। लेकिन अब के हालात में नवाज नहीं चाहेंगे कि गिलानी सरकार एक दिन भी कायम रहे-क्योंकि नए चुनाव में उनकी पार्टी को जाहिरन ज्यादा सीटें मिलने की संभावना है।
यहां एक बात और जो गौर करने लायक है वो ये कि पाकिस्तानी सेना..वहां की राजनीति में एक बड़ी ताकत है। जब मुशर्रफ को सेनाध्यक्ष पद छोड़ने के मजबूर किया गया तो बड़ी चालाकी से ऐसे आदमी को कमान सौंपी गई जो अमेरिका के साथ-साथ बेनजीर भुट्टो का भी करीबी था। जनरल कयानी वहीं आदमी है जो बेनजीर के प्रधानमंत्री रहते उनके सैन्य सलाहकार थे, साथ ही कयानी अमेरिका में सेनाधिकारियों के उस बैच में ट्रनिंग ले चुके हैं जिसमें कॉलिन पॉवेल हुआ करते थे। कयानी की तार अमेरिका और भुट्टो परिवार में गहरे जुडी है। अगर नवाज के राह में कोई बड़ा कांटा हो सकता है तो वो जनरल कयानी हो सकते हैं-ये बात ध्यान में रखनी होगी। अभी तक नवाज का जो क्रियाकलाप रहा है वो यहीं इशारा करता है कि वो जरदारी और मुशर्रफ को अपने रास्ते से हटाने के लिए कट्टरपंथियों से भी हाथ मिलाने में गुरेज नहीं करेंगे। इसके लिए वो जनता में अमेरिका विरोधी भावना का भी फायदा उठाने से नहीं चूकेंगे।
यहीं वो बात है जो भारत के लिए चिंता का सबब हो सकता है। भारत के हित की जहां तक बात है, जरदारी और अमेरिका समर्थक एक जनरल से 'डील' करना आसान है। कम से कम ऐसे लोग पाकिस्तान की कट्टरपंथियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते, न ही जरदारी जैसे लोगों को पाकिस्तान के 'हितों' से बहुत सरोकार है। ये राजनीतिक बनिए हैं-लेकिन नवाज शरीफ जैसे नेता अपने आपको जनता की मुख्यधारा का प्रतिनिधि मानते हैं। गिलानी सरकार से समर्थन वापसी के बाद ऐसे हालात में अगर नवाज शरीफ किसी तरह से सत्ता मे आ जाते हैं तो ये कहना मुश्किल है कि क्या वो वहीं नवाज शरीफ होगें जिन्होने वाजपेयी के वक्त भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ाया था...या वो पाकिस्तान की सनातन भारत विरोधी विचारों की अगुआई करने लगेंगे...?
नवाज शरीफ जजों की बहाली इसलिए चाहते हैं कि इससे उनके कई हित सधते हैं। पहला तो ये कि चौधरी इफ्तिकार हुसैन आते ही मुशर्रफ पर मुकदमा चलाते कि उन्होने 1973 के संविधान के साथ छेड़खानी की, जिसके लिए मौत की सजा तक का प्रावधान है।दूसरी बात ये थी कि जरदारी पर जो भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे उसे मुशर्रफ ने एक विशेष आदेश के जरिए हटा दिया था। अगर चौधरी इफ्तिकार हुसैन बहाल हो जाते हैं और मुशर्ऱफ पर गैरकानूनी ढंग से सत्ता हथियाकर संविधान के उल्लंघन का आरोप लगता है तो फिर जरदारी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप भी जिंदा हो जाएंगे और उन के खिलाफ मुकदमे फिर खुल जाएंगे। तीसरी बात ये कि चौधरी इफ्तिकार हुसैन ने उस मकदमें की भी सुनवाई की थी जिसके तहत मुशर्रफ सरकार ने 300 कट्टपंथियों को पकड़कर अमेरिकी खुफिया एजेंसी को सौंप दिया था।अगर चौधरी की फिर से बहाली हो जाती है तो उन 300 आदमियों की लिस्ट फिर सरकार से मांगी जाएगी। अमेरिका की पाकिस्तान में बची खुची छवि तार-तार हो जाएगी, लोग अमेरिकी दूतावास पर पथराव करेंगे और अमेरिका का पाकिस्तान में जमे रहना मुहाल हो जाएगा। जाहिर है अमेरिका अंतिम वक्त तक कोशिश करेगा कि जजों की बहाली न हो-भले ही इसके लिए सीआईए को बड़े पैमाने पर खून-खरावा ही क्यो न करवाना पड़े।
दूसरी बात जो महत्वपूर्ण है-जरदारी भले ही पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टी के नेता हों, वो जमीन के नेता नहीं है। अव्वल तो बनजीर की हत्या के बाद उनकी पार्टी को इतनी सीटें मिल गई है, दूसरी बात ये कि पाकिस्तानी समाज का क्षेत्रीय अतर्विरोध ऐसा है जिसमे पंजाबी समुदाय इतना उदार नहीं है कि किसी सिंधी को ज्यादा दिन तक सत्ता में बर्दाश्त कर सके। ये अलग बात है कि समय-समय पर गैर-पंजाबी हुक्मरान भी पाकिस्तान में सत्ता पर काबिज रहें है लेकिन प्रभावी सत्ता पंजाबियों के पास ही रही है। और यहीं वो बिन्दु है जहां नवाज शरीफ, जरदारी पर भारी पर जाते हैं। देखा जाए तो पिछले दिनो जितने भी सियासी नाटक पाकिस्तान में हुए हैं उसमें मुद्दे की लड़ाई नवाज ने ही लड़ी है-चाहे वो लोकतंत्र की बात हो, मुशर्रफ को हटाना हो या जजों की बहाली हो। जरदारी तो मुशर्रफ के पिछलग्गू ही दिखे हैं और उन्होने यथास्थिति ही कायम रखने का प्रयास किया है। और इसीलिए तो मुशर्रफ ने बेनजीर को पाकिस्तान आने भी दिया था ताकि सत्ता का हस्तांतरण बिना विवाद के हो जाए। लेकिन अब के हालात में नवाज नहीं चाहेंगे कि गिलानी सरकार एक दिन भी कायम रहे-क्योंकि नए चुनाव में उनकी पार्टी को जाहिरन ज्यादा सीटें मिलने की संभावना है।
यहां एक बात और जो गौर करने लायक है वो ये कि पाकिस्तानी सेना..वहां की राजनीति में एक बड़ी ताकत है। जब मुशर्रफ को सेनाध्यक्ष पद छोड़ने के मजबूर किया गया तो बड़ी चालाकी से ऐसे आदमी को कमान सौंपी गई जो अमेरिका के साथ-साथ बेनजीर भुट्टो का भी करीबी था। जनरल कयानी वहीं आदमी है जो बेनजीर के प्रधानमंत्री रहते उनके सैन्य सलाहकार थे, साथ ही कयानी अमेरिका में सेनाधिकारियों के उस बैच में ट्रनिंग ले चुके हैं जिसमें कॉलिन पॉवेल हुआ करते थे। कयानी की तार अमेरिका और भुट्टो परिवार में गहरे जुडी है। अगर नवाज के राह में कोई बड़ा कांटा हो सकता है तो वो जनरल कयानी हो सकते हैं-ये बात ध्यान में रखनी होगी। अभी तक नवाज का जो क्रियाकलाप रहा है वो यहीं इशारा करता है कि वो जरदारी और मुशर्रफ को अपने रास्ते से हटाने के लिए कट्टरपंथियों से भी हाथ मिलाने में गुरेज नहीं करेंगे। इसके लिए वो जनता में अमेरिका विरोधी भावना का भी फायदा उठाने से नहीं चूकेंगे।
यहीं वो बात है जो भारत के लिए चिंता का सबब हो सकता है। भारत के हित की जहां तक बात है, जरदारी और अमेरिका समर्थक एक जनरल से 'डील' करना आसान है। कम से कम ऐसे लोग पाकिस्तान की कट्टरपंथियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते, न ही जरदारी जैसे लोगों को पाकिस्तान के 'हितों' से बहुत सरोकार है। ये राजनीतिक बनिए हैं-लेकिन नवाज शरीफ जैसे नेता अपने आपको जनता की मुख्यधारा का प्रतिनिधि मानते हैं। गिलानी सरकार से समर्थन वापसी के बाद ऐसे हालात में अगर नवाज शरीफ किसी तरह से सत्ता मे आ जाते हैं तो ये कहना मुश्किल है कि क्या वो वहीं नवाज शरीफ होगें जिन्होने वाजपेयी के वक्त भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ाया था...या वो पाकिस्तान की सनातन भारत विरोधी विचारों की अगुआई करने लगेंगे...?
Saturday, August 23, 2008
....यही दुनिया है तो फिर ऐसी दुनिया क्यों है!
जब अचानक तेज चलता एक रास्ता... बेहद तीखे घुमाव के बाद बस खत्म हो जाए... जब पीछे मुड़कर एक बार कोशिश करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता ना हो..... तब भी कुछ देर रुककर आगे बढ़ने के लिए बिल्कुल उसी जगह से रास्ता बनाने की जद्दोजहद। आज छह साल होने को आए हैं जब जिंदगी के साथ जद्दोजेहद करता दिल्ली चला आया था....। कनॉट प्लेस से गुजरती बस से बाहर की दिल्ली बहुत छोटी लगी थी.... शायद सपने की दिल्ली और उसमें नजर आने वाली ऊंची इमारतें.... असल की इस दिल्ली को रौंद गए थे... बिना किसी सहानुभूति के। मगर वो सपने ऐसे थे.. जिनकी तासीर सचमुच जिंदा कर देती थी...मगर आज महज 6 सालों में ही जैसे सपनों में एक अजीब सा जंग लग गया है.... वक्त के साथ बीतता हर एक लम्हा मानो बासी सा है.... कहीं कुछ भी कोई नयापन नहीं... ऐसा लगता है मानो सरकारी हो गई है जिंदगी... जहां हर रोज... वही कुर्सी.... वही फाइलें... और वही कुछ बेकार सी बातें करने वाले ऊबाऊ लोग.....। नहीं... मैं ऐसी जिंदगी कभी नहीं चाहता था...। बेर सराय के केरला कैफे की वो 10 रुपए की थाली....अब भी जब कभी जेहन में परोसी जाती है.... लगता है जैसे जोरों की भूख लग आई हो.... पर रेस्टोरेंट की चार कुर्सियों के बीच... आराम से बैठे दो लोगों की भूख..... अब फार्मेलिटी से ज्यादा कुछ भी नहीं लगती.... मालूम नहीं... ये उदास वक्त कहां से दाखिल हो गया है जिंदगी के उन सपनों में जहां... कभी हर पल... एक नया सा धागा बुनता था... जहां ख्वाबों के कैनवास पर हर लम्हा... कुछ नए रंग और नई आकृतियां अपना आशियाना बना लेती थीं... मगर अब वो बात नहीं....। शहर कहीं खा गया है...मेरे सपनों को.... मेरी उन उल्टी सीधी प्लानिंग्स को.... सच कहूं तो शहर नहीं.... कुछ और है... जो निगल गया मेरी अपनी चीजों को.... शायद समझ... शायद बोध हकीकत का... या शायद खुद मैं..जिसकी बनाई दुनिया इतनी छोटी थी... जिसे महज 6 सालों में नाप दिया गया... और कुछ भी बाकी नहीं रहा.... मैं नहीं जानता... मैं क्या लिख रहा हूं... क्यों लिख रहा हूं... मगर ये सच है... घुटन की ये वो तस्वीरें हैं... जिन्हें पन्नों पर जगह देने से कुछ आराम जरुर मिल रहा है.... काश मैं... एक बार फिर तलाश लेता... कुछ सपने... सिर्फ अपने लिए.... क्योंकि मैं जीना चाहता हूं... फिर से......
Thursday, July 31, 2008
तलवे चाटने वालों की नस्ल हड़प्पा संस्कृति के वक्त की...पुख्ता सबूत मिले!
(एक दफा मैंने चाटुकारिता पर बहुत बड़ा लेख लिखा था..... उस वक्त मैंने इससे जुड़े तमाम पहलुओं पर बात की थी.. लेकिन मुझे नहीं मालूम था... मेरा वो सपना इतनी जल्द पूरा हो सकता है... दरअसल मुझे सबसे ज्यादा चिंता फैकल्टी मेंबर्स को लेकर थी... चाटुकारिता पढ़ाना मेरे वश की तो बात थी नहीं... और काबिल शिक्षकों के बिना ये संस्थान चलता कैसे.. पर अब मेरी तलाश पूरी हो चुकी है... अचानक मेरे एक मित्र का वास्ता ऐसे काबिल लोगों से पड़ गया है.. उसने भी बिना देरी किए मुझे इसकी जानकारी दे दी... अपनी ओर से मैं जरुर साफ कर देना चाहूंगा... जो कुछ भी मैं लिखने जा रहा हूं... वो मेरे मित्र के निजी अनुभव हैं... इसका मुझसे जुड़े किसी भी जीवित या मृत शख्स से कोई वास्ता नहीं है...किसी तरह की समानता संयोग मात्र होगा.. आगे लिखा गया एक एक हर्फ मेरे मित्र ने भेजा है... उसमें मैंने ना तो एक शब्द जोड़ा है... और ना ही एक शब्द घटाया है... उम्मीद है... आपको पसंद आएगा... और आपके ज्ञानचक्षु भी खुलेंगे...एक बात के लिए जरुर क्षमाप्रार्थी हूं... लेख पढ़कर इसके शीर्षक पर विचार ना करें...... धन्यवाद- विवेक सत्य मित्रम्)
प्रिय मित्र विवेक... महीनों पहले तुम्हारा एक लेख पढ़ा था.. जिसमें तुमने चाटुकारिता का अखिल भारतीय संस्थान खोलने की योजना का खुलासा किया था। उसमें तुमने फैकल्टी मेंबर्स को लेकर अपनी असमर्थता जाहिर की थी....। तुम्हे बताते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है...कि आजकल मेरे साथ कुछ ऐसी महान आत्माएं काम कर रही हैं.. जिनमें ये गुण कूट कूट कर भरा है। लिहाजा अब तुम अपने चाटुकारिता संस्थान का रजिस्ट्रेशन करा ही लो। देर सबेर मैं तुम्हारी इनसे मुलाकात करा दूंगा... । लेकिन उससे पहले मैं तुम जैसे लोगों की जिज्ञासा शांत करना चाहता हूं... जो इनके बारे में कोई जानकारी नहीं रखते। सबसे पहले तो मैं तुम्हे बता दूं... ये चाटुकार लोग भी हमारे तुम्हारे जैसे ही दिखते हैं.. इनमें और हममें बेहद मामूली फर्क होता है... जो देखने और छूने से पता नहीं चलता। जो सबसे अहम फर्क है... वो ये कि इनके पास दो आत्माएं होती हैं.... जिनमें से एक वो हमेशा के लिए गिरवी रख देते हैं.... और दूसरी दिन में 20 बार बॉस के केबिन में चक्कर लगाती रहती है....। दूसरा जो बड़ा फर्क मुझे दिखा... वो ये कि इनके पास रीढ़ की हड्डी नहीं होती...साथ ही शरीर में लाफिंग गैस का बड़ा भंडार मौजूद होता है....। इसका फायदा ये है कि बॉस इन्हें चाहे जितना गरिया ले... चाहे जितना बेइज्जत कर ले... चाहे जितने जूते मार ले.... लचकदार होने की वजह से इनका कुछ नहीं बिगड़ता....और छूटते ही ये बॉस के सामने खीसें निपोरने लगते हैं.... मानो कुछ हुआ ही ना हो....। हां... अभी तक ये पता नहीं चल पाया है... ये लक्षण इनमें शुरु से मौजूद थे... या फिर योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत पर अमल करके इन्होंने खुद विकसित कर लिए....। हो सकता है... इनकी नस्ल के पूर्वजों ने आंधी आने पर झुक जाने वाले पेड़ों की कहानी चुपके से सुन ली हो...खैर, इस पर रिसर्च चल रहा है....। इनकी एक और बड़ी पहचान ये है...ये हमेशा परेशान दिखाई देते हैं... हमेशा काम की बात करते नजर आते हैं... (ध्यान दें- काम की बात....काम नहीं) ....ऐसा लगता है...अगर ये ना हों...तो दुनिया में कोई काम ही ना हो... इनमें जिम्मेदारी का अहसास भी कूट कूट कर भरा होता है...लिहाजा वो बॉस की परेशानी भी खुद ही गिनाना शुरु कर देते हैं.... और अक्सर उस वक्त जब बॉस उनके सामने बैठा हो.... ये अपने बॉस को रत्ती भर भी परेशान नहीं देख सकते... जब कभी भी ऐसा हादसा पेश आता है....दूसरे की गलती के लिए वो खुद ही शर्मसार होने लगते हैं...मानों दुनिया का सबसे बड़ा पाप उन्हीं के हाथों हुआ हो... इनका ह्यूमर सेंस भी गजब का होता है....खुदा ना खास्ता कभी फंसने की नौबत आ जाए तो संजीदा से संजीदा बात की ऐसी खिल्ली उड़ा देते हैं... जैसे अभी अभी द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैंपिंयंस का ऑडिशन देकर निकले हों... इन्हें काम तो क्या आता होगा... ये उनका बॉस भी जानता है...लेकिन इतनी काबिलियत कम है क्या... नाकाबिल होकर भी सबसे काबिल दिखें.... क्या क्या बताऊं तुम्हें.... बस इतना समझ लो.... अगर तुम इनसे 5 फीसदी भी सबक ले लो... तुम्हें चाटुकारिता का संस्थान खोलने की जरुरत नहीं पड़ेगी... और पड़ी भी तो तुम खुद ही उसके प्रिंसिपल बन सकने की काबिलियत हासिल कर लोगे.... लेकिन अगर तुम इनसे प्रेरणा नहीं ले सके... और किसी दिन रोड पर आ गए... तो कोई बात नहीं.... इन्हें अपने चाटुकारिता संस्थान में रख लेना.... पलक झपकाते ही वो बुलंदियों पर होगा.....मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं....
- तुम्हारा ही : अनिल नागवंशी
प्रिय मित्र विवेक... महीनों पहले तुम्हारा एक लेख पढ़ा था.. जिसमें तुमने चाटुकारिता का अखिल भारतीय संस्थान खोलने की योजना का खुलासा किया था। उसमें तुमने फैकल्टी मेंबर्स को लेकर अपनी असमर्थता जाहिर की थी....। तुम्हे बताते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है...कि आजकल मेरे साथ कुछ ऐसी महान आत्माएं काम कर रही हैं.. जिनमें ये गुण कूट कूट कर भरा है। लिहाजा अब तुम अपने चाटुकारिता संस्थान का रजिस्ट्रेशन करा ही लो। देर सबेर मैं तुम्हारी इनसे मुलाकात करा दूंगा... । लेकिन उससे पहले मैं तुम जैसे लोगों की जिज्ञासा शांत करना चाहता हूं... जो इनके बारे में कोई जानकारी नहीं रखते। सबसे पहले तो मैं तुम्हे बता दूं... ये चाटुकार लोग भी हमारे तुम्हारे जैसे ही दिखते हैं.. इनमें और हममें बेहद मामूली फर्क होता है... जो देखने और छूने से पता नहीं चलता। जो सबसे अहम फर्क है... वो ये कि इनके पास दो आत्माएं होती हैं.... जिनमें से एक वो हमेशा के लिए गिरवी रख देते हैं.... और दूसरी दिन में 20 बार बॉस के केबिन में चक्कर लगाती रहती है....। दूसरा जो बड़ा फर्क मुझे दिखा... वो ये कि इनके पास रीढ़ की हड्डी नहीं होती...साथ ही शरीर में लाफिंग गैस का बड़ा भंडार मौजूद होता है....। इसका फायदा ये है कि बॉस इन्हें चाहे जितना गरिया ले... चाहे जितना बेइज्जत कर ले... चाहे जितने जूते मार ले.... लचकदार होने की वजह से इनका कुछ नहीं बिगड़ता....और छूटते ही ये बॉस के सामने खीसें निपोरने लगते हैं.... मानो कुछ हुआ ही ना हो....। हां... अभी तक ये पता नहीं चल पाया है... ये लक्षण इनमें शुरु से मौजूद थे... या फिर योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धांत पर अमल करके इन्होंने खुद विकसित कर लिए....। हो सकता है... इनकी नस्ल के पूर्वजों ने आंधी आने पर झुक जाने वाले पेड़ों की कहानी चुपके से सुन ली हो...खैर, इस पर रिसर्च चल रहा है....। इनकी एक और बड़ी पहचान ये है...ये हमेशा परेशान दिखाई देते हैं... हमेशा काम की बात करते नजर आते हैं... (ध्यान दें- काम की बात....काम नहीं) ....ऐसा लगता है...अगर ये ना हों...तो दुनिया में कोई काम ही ना हो... इनमें जिम्मेदारी का अहसास भी कूट कूट कर भरा होता है...लिहाजा वो बॉस की परेशानी भी खुद ही गिनाना शुरु कर देते हैं.... और अक्सर उस वक्त जब बॉस उनके सामने बैठा हो.... ये अपने बॉस को रत्ती भर भी परेशान नहीं देख सकते... जब कभी भी ऐसा हादसा पेश आता है....दूसरे की गलती के लिए वो खुद ही शर्मसार होने लगते हैं...मानों दुनिया का सबसे बड़ा पाप उन्हीं के हाथों हुआ हो... इनका ह्यूमर सेंस भी गजब का होता है....खुदा ना खास्ता कभी फंसने की नौबत आ जाए तो संजीदा से संजीदा बात की ऐसी खिल्ली उड़ा देते हैं... जैसे अभी अभी द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैंपिंयंस का ऑडिशन देकर निकले हों... इन्हें काम तो क्या आता होगा... ये उनका बॉस भी जानता है...लेकिन इतनी काबिलियत कम है क्या... नाकाबिल होकर भी सबसे काबिल दिखें.... क्या क्या बताऊं तुम्हें.... बस इतना समझ लो.... अगर तुम इनसे 5 फीसदी भी सबक ले लो... तुम्हें चाटुकारिता का संस्थान खोलने की जरुरत नहीं पड़ेगी... और पड़ी भी तो तुम खुद ही उसके प्रिंसिपल बन सकने की काबिलियत हासिल कर लोगे.... लेकिन अगर तुम इनसे प्रेरणा नहीं ले सके... और किसी दिन रोड पर आ गए... तो कोई बात नहीं.... इन्हें अपने चाटुकारिता संस्थान में रख लेना.... पलक झपकाते ही वो बुलंदियों पर होगा.....मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं....
- तुम्हारा ही : अनिल नागवंशी
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