Monday, January 7, 2008

मेरा गाव खोजपुर-1

मुझे शुरु में लगता था कि खोजपुर नामका जो यह गांव है वो मेरो ही पुरखे द्बारा बसाया गया है, लेकिन बाद मे यह भ्रम भी दूर हो गया। दरअसल इस गाव का जिक्र टोडरमल के 16वीं सदी के सर्वे में भी आता है जबकि मेरे पुरखे इस गांव मे करीब 1750 ई के आसपास आए होगें। दरअसल, ये बाते मुझे पूर्व सांसद भोगेद्र झा ने बतायी जिनका इतिहास आदि विषयों में खासा दखल है। अपने आसपास की चीजों के बारे में हम कितना कम जानतेहै। अधिकांश को तो अपने गांव या अपने पडोस का ही इतिहास नहीं मलूम है-जवकि उन्हे हडप्पा-मोहनजोदडो के बारे में तोता की तरह रटाया जाता है। खैर, बात खोजपुर नामके गांव की हो रही थी जो बिहार के मधुबनी जिले में,जिला मुख्यालय से 34 किलोमीटर उत्तर-पूर्व की दिशा में बसा हुआ है। नेपाल की सीमा यहां से मह़ज 20 किलोमीटर है-और सीमापार बेरोकटोक आवाजाही होती है,शादी व्याह भी। सन् 84 तक गांव में बस नहीं चलती थी, कारण की सडक पक्की नहीं थी और कमला-बलान पर पुल नहीं था। पुल बनबाने में ललितनारायण मिश्र का योगदान अहम था। यों उन्होने और भी कई उल्लेखनीय काम किये थे-जैसे, दरभंगा में विश्वविद्यालय, मेडिकल कालेज, झंझारपुर-लौकहा रेलवेलाइन और पश्चिमी कोशी नहर आदि। जनता उन्हे भगवान की तरह मानती थी। इतना सम्मान बिहार में बहुत कम नेताओं को नसीव हुआ। खोजपुर की आबादी आठेक हजार है जिनमें, ब्राह्मण,हरिजन ,यादव और कई पिछडी जातियां शामिल है। गांव की तकरीबन 80 फीसदी जमीन आज भी व्राह्मणों की मल्कियत है-हलांकि जमीन का हस्तांतरण पिछडी जातियों को हो रहा है-मगर उसकी रफ्तार अभी भी कम है। आज खोजपुर में बैक है, स्कूल है, डाकघर है, पटना के लिए बसें मिलती है और एक छोटा सा चौक भी है जहां आप दैनिक जीवन की वस्तुएं खरीद सकते है। लेकिन मुझे उस खोजपुर की याद आती है जो व्राह्मणों के कठोर चंगुल मे जकडा हुआ था-ये बात 80 के दशक की है, जब पटना में लालू यादव नामका आदमी मुख्यमंत्री नहीं बना था, जब कमला-बलान पर पुल नहीं बना था और जब अधिकांश व्राह्मण खेती खुद करते थे या करबाते थ। मेरे छुटपन तक तो सवर्णों का आत्याचाक कम हो गया था अलबत्ता आतंक अभी भी व्याप्त था। अभी भी पुराने लोग उन्हें देखकर पायलागी करते ही थे..अलबत्ता दिल्ली और पंजाव से कमाकर आई दलितो की नई पौध ने उन्हे चुनौती देना शुरु कर दिया था..ये बात तो लालू यादव के आने के पहले ही शुरु हो गयी थी।. हां लालू के आने के बाद वो आवाज और भी मुखरित हो चली थी और कई बार तो अन्याय के हद तक ब्राह्मणों से बदला लिया गया था। एक व्यक्ति के सत्ता में आने से कैसे सामाजिक संवंध बदलते है इसका नायाब उदाहरण नव्वे का वो शुरुआता दशक था , जहां लालू की आलोचना का मतलव सरेआम राह चलते पिटाई हो सकती थी।

1 comment:

gustakh said...

सुशांत जी, आपको और इस ब्लॉग को पढने वाले सभी साथियों को नए साल की दिल से शुभकामनाएं... लेकिन शुभकामनाएं अगर फलित होती तो दुनिया के नक्शे पर हमारी भी कुछ जगह होती क्योंकि कई इष्ट मित्रों ने हमें नए साल के तोहफे के तौर पर वरदान दिया कि तुम बहुत आगे जाओ, खूब नाम कमाओ.. पर लक्षण दीख नहीं रहे। बहरहाल, विवेक भाई को लगता है मुझसे कुट्टी करने का मन है या फिर उन्होंने मन बना लिया है कि चिरकुट लोगों के पोस्ट को ऑफ द रिकॉर्ड मे नहीं छापेंगे। लगता है ऑफ द रेकॉर्ड को भी उन्होंने बुद्धिजीवियों के लिए आरक्षित कर दिया है। रिज़र्वेशन, जैसा कि मौहल्ले में हो गया है। अस्तु.. मेरा दुर्भाग्य कि मैंने एक तुच्छ सी पोस्ट भेज दी भाई के ईमेल पर..। ळशिकायत किससे करता ? आपसे कह दूं तो बोझ हल्का हो जाए दिल का। मन कर रहा है रो दूं.. हे भगवान.. इंसान बना के ही भेजना था? बुद्धिजीवी क्यों नहीं बनाया।
वैसे आपके इस पोस्ट पर इतना ही कहूंगा कि सर्वथा आपके व्यक्तित्व के अनुकूल ही लिखा है आपने.. गांव पर लिखते हुए भी छद्म रूप से भावुक हुए बिना इतिहास-भूगोल खंगालने का जो काम आप कर रहे हैं। साधुवाद के पात्र हैं। उम्मीद है कि आगे भी आप हिंदी में लिखते हुए हम अनपढ़ों का मार्गदर्शन और हिंदी का उद्धार करते रहेंगे।
आपका ही,
मंजीत