Saturday, October 4, 2008

शेरनी ने ले ली चुम्मी, शुक्र है होंठ बच गए !

हादसा कल का है....बयां अब कर रहा हूं....जहां शेरनी ने चुम्मी ली थी...वहां अब पट्टी बंधी है....कीबोर्ड पर उंगलियां बमुश्किल चल पा रही हैं.....पट्टी आज ही बंधवाई है....कल रुमाल बांधकर घूम रहा था.....ऑफिस में काम भी कर रहा था....................ओफ्फ, दिमाग को ज्यादा मत दौड़ाइए....मैं क्या खबरिया चैनलों की तरह टीआरपी के चक्कर में कल्पनालोक क्रिएट कर रहा हूं....दरअसल आज मेरा ऑफ है....पूरे दिन घूमता रहा....कहीं कहीं किसी किसी काम से...आज ढेर सारे मुद्दे भी हैं मेरे पास लिखने के लिए...वो रिक्शेवाले की सड़क पर बिखरी हुई दाल हो.....कनॉट प्लेस में भीख मांगता हिजड़ा हो....बंद पड़ा सेंट्रल पार्क हो...दिल्ली में पधारीं अमेरिकी विदेश सचिव कोंडोलिज़ा राइस हों या दिन-भर सोते-जागते...हर वक्त जिसका चेहरा मेरी आंखों के सामने आजकल छाया हुआ है वो हो....मुद्दों की भरमार है मेरे पास लेकिन.....कल वाली ही बात करना ज्यादा रुचिकर लग रहा है मुझे.....दरअसल लिक्खाड़ लोगों की सबसे बड़ी परेशानी होती है.....वो कुछ भी पचा नहीं पाते...उगलने के लिए बेताब रहते हैं....मेरा भी वही हाल है.......कल क्या हुआ...कि मैं अपने ऑफिस में, न्यूजरुम में दाखिल हुआ....बाएं हाथ में रुमाल बांधकर.....शीर्षक उसी से जुड़ा है...मैंने भरसक कोशिश की कि मेरा बायां हाथ दिखे...लेकिन भला ऐसा कैसे हो पाता....कंप्यूटर पर बैठकर छुपाने की कोशिश भी की लेकिन...इंसानी आंखें तो वही कोना तलाशती हैं जो छुपाया जा रहा हो.....एक के बाद एक जिसने देखा, सवाल दागा.....सवालों के एक से एक मज़मून...- क्या भई, कहां भिड़ गए...किससे हाथापाई हो गई...अरे मिथिलेश भाई से कौन भिड़ेगा...!!!....क्या हुआ जनाब, कहां गिर गए.....अरे, ये क्या हुआ...चोट लग गई क्या...दवा ली कि नहीं.....मजे की बात ये रही कि...किसी ने भी रुमाल के अंदर झांकने की जुर्रत नहीं की....लेकिन जुर्रत करने वाले और मज़ा लेने वाले भी कम नहीं....अपनी बेबाक-बिंदास छवि के लिए मशहूर एक क्राइम रिपोर्टर ने कहा- ''टशन में बांध रखा है...या....????".....अब तक तो मैं लोगों को सच बताता जा रहा था लेकिन इस जुमले से मुझे प्रेरणा मिली....अंदर का नटखट बच्चे को जैसे तेज भूख लग गई वो अपनी खुराक तलाशने लगा....यहां वहां कुछ भी मिल जाए चुरमुरा, बिस्कुट या तीखा मसालेदार नमकीन, कुछ भी....उसके बाद जिसने पूछा, जवाब यही मिला...''कुछ नहीं यार, ऐसे ही टशन में...!'' .....उधर एक प्रोमो प्रोड्यूसर ने छेड़ा- अरे मियां, किस बिल्ली से कटवा के रहे हो.....मैंने कहा- अबे, बिल्ली नहीं, शेरनी ने चुम्मी ले ली, शुक्र है होंठ सही-सलामत है....!

(अगर आप ये समझ रहे हों कि मैंने अपने हाथ पर फर्जी तरीके से, केवल टशन मारने के लिए बांध रखा था तो आपको बता दूं ऐसा बिल्कुल नहीं है...अभी मेरे हाथ पे पट्टी बंधी है....दाहिना पैर पूरा सूजा हुआ है....कल छुट्टी भी नहीं मिल रही....पोस्ट लिखने के दौरान ही फोन आ चुका है...कल ऑफिस रोजाना के टाइम से दो घंटे पहले पहुंचना है....तो कल ऑफिस पहुंचूंगा.........बाएं हाथ में पट्टी और सूजा हुआ पैर लेकर...ये हादसा कैसे हुआ वो फिर कभी क्योंकि वो सब बयान करने से हास्य रस नहीं, रौद्र रस की निष्पति होगी.....तो एक बार में एक ही रस ....का पान करें तो अच्छा....है ना !)

यही है बापू को नमन !

(यह लेख मेरे मेल पर अक्टूबर को १२:२३ बजे ही आ गया था लेकिन प्रकाशित काफी लेट कर पा रहा हूं...इसके लिए माफी चाहूंगा...आपको बता दूं लेखक श्री विभूति नारायण चतुर्वेदी फिलहाल पीटीआई -भाषा में वरिष्ठ पत्रकार हैं...)

मोहनदास करमचंद गांधी और कस्तूरबा के खून से पैदा हुई संतति की संख्या बढ़कर सौ के पार हो चुकी है लेकिन इस खानदान की मौजूदा पीढ़ी को अब तक एक भी ऐसा मौका मयस्सर नहीं हो सका है कि वे एक साथ जुट सके। तारा से लेकर तुषार तक परिवार के सदस्यों को इसका मलाल भी है।

महात्मा गांधी के दूसरे पुत्र मणिलाल गांधी के पौत्र तुषार गांधी ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि यह नहीं हो पाया है। परिवार इतना फैल चुका है कि उसे एक साथ कर पाना मुश्किल हो गया है। उन्होंने बताया कि बापू और बा के चार पुत्रों हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास के पुत्र-पुत्रियों का वंश अब सौ से ऊपर हो चुका है और इस खानदान के कुल 130 सदस्य हिन्दुस्तान के अलावा दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, कनाडा इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया आदि देशों में रह रहे हैं। इसी संदर्भ में गांधी के तीसरे पुत्र देवदास गांधी की ज्येष्ठ पुत्री तारा भट्टाचार्य ने कहा कि हमारी मर्जी तो बहुत है कि हमें मिलना चाहिए लेकिन हम सब अपने-अपने क्षेत्रों में लगे हैं। इस बारे में सोच भी है कि सभी इकट्ठा हों लेकिन हो नहीं पाया है।

कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक न्यास की उपाध्यक्ष तारा ने बताया कि इस बारे में कोशिश की जा रही है और उन्हें उम्मीद है कि साल के अंत में ऐसा कोई समागम हो पाएगा। उन्होंने कहा कि विदेश में रहने वालों को जुटा पाना संभव नहीं हो पा रहा है लेकिन भारत में रहने वाले लोग समय समय पर मिलते रहते हैं और हमलोग खुश होते हैं।

करमचंद गांधी और पुतली बाई के सबसे छोटे पुत्र मोहन दास का विवाह मात्र 13 साल की उम्र में कस्तूरबा से हो गया था और उनके चार पुत्र हुए और उसके बाद यह खानदान लगातार बढ़ा है। महात्मा ने हालांकि भारतीय आजादी की लड़ाई की कमान संभालने से पहले 1914 में ही परिवार का परित्याग कर दिया था और सभी भारतीयों को अपना मानस पुत्र मान लिया था लेकिन गांधी के सबसे बड़े पुत्र हरिलाल की चार संतानें हुई और उनकी सबसे बड़ी पुत्री नीलम पारिख पिछले साल मुंबई में गांधी के अस्थि कलश विसर्जन में शामिल हुई।

महात्मा के सबसे बड़े पुत्र से मेल न खाने की बात सभी लोगों को पता है और उन्होंने खुद लिखा भी है कि मेरे जीवन के दो सबसे बड़े खेद- दो लोगों को मैं कभी रजामंद नहीं कर सका- मेरे मुस्लिम दोस्त मोहम्मद अली जिन्ना और मेरे अपने पुत्र हरिलाल गांधी।

नीलम ने अपने पिता पर एक पुस्तक भी लिखी है- महात्मा गांधीज लास्ट ट्रेजर-हरिलाल गांधी जिसमें इस बात पर कुछ रोशनी डाली गई है। गांधी के दूसरे पुत्र मणिलाल गांधी के एक पुत्र अरुण गांधी और दो पुत्रियां सीता और इला हुई। अरुण हाल के दिनों में विवादों में भी घिर गए थे जब उन्होंने वाशिंगटन पोस्ट वेबसाइट पर एक आलेख प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने यहूदियों और इजरायल के बारे में कुछ टिप्पणी की। इस विवाद के बाद उन्हें अमेरिका के रोचेस्टर विश्वविद्यालय में उनके द्वारा स्थापित महात्मा गांधी शांति पीठ से इस्तीफा देना पड़ा।

अरुण गांधी के ही पुत्र तुषार गांधी हैं जो फिलहाल कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं और पेशे से बैंकर हैं। वह सामाजिक और राजनीतिक कार्यो में लगे हैं। महात्मा के तीसरे पुत्र रामदास की पुत्री सुमित्रा गांधी कुलकर्णी राज्यसभा [1972 से 1976] की सदस्य रहीं और आपातकाल के मुद्दे पर इंदिरा गांधी से उनका मतभेद हुआ। उन्होंने गांधी पर एक पुस्तक अनमोल विरासत लिखी और देश के राष्ट्रपति पद के चुनाव में उतर कर सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने का प्रयास भी किया। गांधी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी खुद हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक रहे और उन्हें कभी-कभार बापू के निजी सहायक के तौर पर साबरमति आश्रम में काम करने का भी मौका मिला। देवदास के एक पुत्र गोपाल कृष्ण गांधी मौजूदा समय में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं और उन्होंने पूर्व में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के तौर पर विभिन्न देशों में भारतीय मिशनों में काम किया जिसमें श्रीलंका भी शामिल है जहां से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया।

देवदास गांधी के एक अन्य पुत्र राजमोहन गांधी भी राज्यसभा के दो साल तक सदस्य रहे और उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ा। राजमोहन ने कई पुस्तकें भी लिखी हैं। उनके सबसे छोटे भाई रामचंद्र गांधी पिछले साल जून में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मृत पाए गए थे जो पेशे से दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे और फक्कड़ी उनके मिजाज में थी। गांधी खानदान की अब पांचवीं छठीं पीढ़ी पैदा हो चुकी है और महात्मा गांधी हिज अपोस्टल्स पुस्तक के लेखक वेद प्रकाश मेहता के अनुसार गांधी खानदान के लोग कई देशों में जीवन बीमा बेचने से लेकर अंतरिक्ष इंजीनियरिंग तक के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पोरबंदर से लोकसभा का चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले तुषार ने गांधी रक्त वंशजों के राजनीति में सफल नहीं होने के बारे में पूछे जाने पर कहा कि मैं समझता हूं कि शायद हमारी काबलियत में वह नहीं है जो आज राजनीति में सफल होने के लिए चाहिए। बापू ने अपने जीवनकाल में परिवार को कभी आगे नहीं बढ़ाया और इसका सम्मान उस समय परिवार ने भी किया और राजनीति तथा सार्वजनिक जीवन से दूर रहा। उन्होंने कहा कि मेरे चाचा [राजमोहन], बुआ [सुमित्रा] और मैंने कोशिश की। हमारे में वह काबलियत नहीं है जो जरूरी होती है। जो निपुणता चाहिए वह शायद नहीं है। तुषार ने कहा कि उन्होंने 1998 में लोकसभा पहुंचने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो सके। तुषार पहले समाजवादी पार्टी के सदस्य थे। उन्होंने बताया कि उनकी एक बुआ इला गांधी दक्षिण अफ्रीका में वहां की संसद की सदस्य रहीं। मणिलाल गांधी की पुत्री इला 1994 से 2004 तक दक्षिण अफ्रीकी संसद की सदस्य रहीं और वह गांधीवाद के प्रचार प्रसार में सक्रिय हैं।

महात्मा गांधी के परिवार के भारतीय राजनीति में सफल नहीं रहने के बारे में गांधी शांति प्रतिष्ठान के सचिव सुरेन्द्र कुमार ने कहा कि जिस तरह का संरक्षण अपने बच्चों को देकर अन्य राजनेता उन्हें आगे बढ़ाते हैं गांधीजी ने वह संरक्षण नहीं दिया। वे मानते थे जिनमें क्षमता है वे खुद आगे बढ़ें। यह पूछे जाने पर कि समाज को क्या गांधी परिवार से राजनीतिक उम्मीद करनी चाहिए उन्होंने कहा समाज को किसी परिवार से नहीं बल्कि चिंतन से उम्मीद रखनी चाहिए। यह गांधीवादी चिंतन ही है जो गोपालकृष्ण गांधी [पश्चिम बंगाल के राज्यपाल] को अग्रिम पंक्ति में खड़ा करता है।

Thursday, October 2, 2008

मीडिया में बिहारी दबंगई, मामला क्या है?

मुझे लगता है कि ये कहना है कि बिहारी सिर्फ क्षेत्रवाद के बदौलत मीडिया में अपना दबदबा कायम किए हुए हैं पूरी तरह उचित नहीं है, हो सकता है इसमें आंशिक सच्चाई हो।बिहारियों का हेडकाउंट देखकर ये अंदाजा बरबस ही लगाया जा सकता है,जैसे धमाकों में मुसलमानों को देखकर लगता है कि सारे ही जिम्मेवार हैं। लेकिन ऐसा है नहीं कि सारे बिहारी पैरवी से ही आए हैं। दूसरी बात रही मीडिया की तो ये बात सर्वविदित है कि यहां नौकरी नेटवर्किंग से मिलती है, सीवी के बल तो कोई पानी भी नहीं पीने को बुलाता। तो ऐसे में थोड़ा बहुता पैरवी चलना लाजिमी है, और ऐसा सब करते हैं।रही बात मीडिया में ऊंचे पदों पर बैठे बिहारियों की तो मेरी नजर में टैम के लिस्ट में जो 12 चैनल आते हैं उनमें ऊपर से तीन यानी आजतक, इंडिया टीवी और स्टार तीनों के ही हेड गैर-बिहारी है। इसके आलावा सहारा, आईबीएन-7 के भी हेड गैर-बिहारी हैं। हां, नीचे वालों में बिहारी खासे हैं और मेरे ख्याल से आधे से ज्यादा हैं लेकिन क्या इसका खालिस मतलब उनका योग्यता विहीन होकर सिर्फ पैरवी पुत्र होना हैं?

नहीं कहानी कुछ और भी है। और इसे समझने के लिए बिहारियों की मानसिकता और उनकी समाजिक-आर्थिक विकास को समझना जरुरी है।ये कहने की जरुरत नहीं कि विकास के पैमाने पर बिहार का स्थान नीचे सें नंबर-1 हैं और ऐसे माहौल में जातिवादी माहौल भी खूब पनपता है। बिहार में संसाधनों का जितना असमान वितरण है, यानी जमीन का एक बड़ा हिस्सा कुछ खास लोगों के हाथों में(हाल तक यहीं था, कमोवेश अभी भी) में है-उसने लोगों की मानसिकता सामंतवादी बना दी है। यही वजह है कि एक औसत बिहारी अपने सामंती अहं की तुष्टि आईएएस जैसी नौकरी में खोजना चाहता है।बिहार के सामंतवादी-जातिवादी शासन-समाज ने पिछले पचास साल में जो अ-विकास का मॉडल गढ़ा है उसमें रोजगार के नाम पर घटिया किस्म की खेती है या नहीं तो भारत और बिहार सरकार की नौकरी है। और बढ़ती आबादी और शिक्षा ने एक पूरे के पूरे वर्ग को बिहार से बाहर धकेल दिया है जो सम्मानजनक काम भी करना चाहता है। वो सरकारी नौकरियों में भर गया है, वो देश के हरसंभव नौकरियों में है जहां अंग्रेजी जरुरी नहीं है।

साफ है बिहार का एक औसत शिक्षित युवा सामान्य ज्ञान और करेंट अफेयर्स में काफी मजबूत हो जाता है-ऐसा पैदाईशी नहीं होता,ऐसा वहां के माहौल ने बना दिया है। जिस समाज में सम्मान पाने का तरीका सिर्फ एक अच्छी नौकरी करना हो, जहां व्यापार करने की न तो परंपरा हो न ही माहौल, वहां ऐसा होना लाजिमी है। और फिर जब आईएएस बनने का ख्वाब दरकता है, तो वह मीडिया हॉउसों के ग्लास हाउसों में जाकर पूरा होता है क्योंकि लगता है इतनी पढ़ाई की उपयोगिता वहीं है..जो बाद में जाकर बड़ा छलावा साबित होता है।

और ये तमाम परिस्थितियां दूसरे हिंदी भाषी सूबों में नहीं है, यूपी में भी नहीं।आप प्रतिव्यक्ति आय को देखिए, जमीन की उपलब्धता को देखिए या फिर औद्यौगीकरण को देखिए-यूपी बिहार से आगे है। हां, यूपी की विशालता और विविधता भी इतनी है कि पश्चिमी यूपी वाले को पूर्वी यूपी वाले से कोई लगाव नहीं रहता-बल्कि वो तो उसे हिकारत से देखता है। वो सांस्कृतिक रुप से पंजाबी या हरियाणवी है और संपन्न भी है।

एक बात और जो अहम है वो ये कि हाल के दशकों में बिहारियों में थोड़ी बहुत एक बिहारी उपराष्ट्रीयतावाद जरुर पनपी है, संभवत ऐसा 60 या 70 के दशक में तमिल या बंगालियों के साथ था जो हिंदी वर्चस्व के भय के साये में जीते थे।दरअसल बात ये है कि जो भी कौम भय के साये में जीती है उसके साथ ऐसा ही होता है। बिहार के पिछड़ापन और इसकी वजह से दूसरे सूबों के लोगों का हिकारत भाव इतना गहरा है कि बिहारियों ने आहिस्ते-आहिस्ते क्षेत्रीयतावाद का रास्ता अपनाना शुरु किया है। वे खोल में समाते जा रहे हैं-शायद कुछ बंगालियों की तरह जो ट्रेन में किसी दूसरे बंगाली को देखकर सट जाता है।

और यहीं बिहारी कॉकस या बिहारी क्षेत्रीयतावाद मीडिया ही नहीं हर जगह दिख रही है। तो क्या ये सिर्फ अयोग्यों का जमाबड़ा है? नहीं, लोगों की सप्लाई इतनी है कि अयोग्यता का सवाल बेमानी हो जाता है। अलवत्ता, बिहारियों जैसा दिलदार कौम आपको शायद ही खोजने पर मिले। बिहारियों ने दिलखोल कर बाहर के लोगों को संसद में पहुंचाया है-चाहे वो जॉर्ज हों या फिर शरद यादव या फिर मधु लिमिये हो। तो फिर आप अंदाज लगा लीजिए की..ये सिर्फ क्षेत्रीयतावाद है या कुछ और। शायद ये दोनों है,या शायद कुछ भी नहीं।

मजबूरी का नाम महात्मा गांधी क्यों ?

आज 2 अक्टूबर है..महात्मा गांधी का जन्म-दिन...बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म-दिन...भारत के राष्ट्रपिता का जन्म-दिन...बापू का जन्म दिन...बापू को शत्-शत् नमन ! साथ ही लाल बहादुर शास्त्री को नमन...आज एक बार फिर एक ही सवाल परेशान कर रहा है...इस महापुरुष ने भारत के लिए, दुनिया के लिए..इंसानियत के लिए इतना कुछ किया...और सत्य और अहिंसा के मज़बूत हथियार के सहारे बड़े-से-बड़े धुरंधरों को घुटने टेकने पर मज़बूर कर दिया..ऐसी महान शख्सियत के नाम के साथ ये जुमला पता नहीं कब, कहां, कैसे जुड़ गया...लोग अक्सर अपनी मजबूरी के पलों में कहते हैं- "छोड़ यार, कुछ नहीं हो सकता...मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी"..हंसी भी आती है और मन उदास भी होता है...जिस महान शख्सियत को हम अपना राष्ट्रपिता मानते हैं, बापू कहते हैं, ...सम्मान करते हैं, उन्हीं को मजबूरी का पर्याय बताना कितना गलत है !क्या वजह है जो महात्मा गांधी के साथ एक बेतुका जुमला जुड़ा हुआ है<'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी'...इस जुमले पर इलाहाबाद के मेरे कुछ परिचितों ने अपनी राय कुछ यूं रखी-

डॉ राजेंद्र कुमार, साहित्यकार एवं पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''ये मुहावरा गांधीजी का अवमूल्यन करने वाला प्रतीत होता है। गांधीजी ने कभी भी अहिंसा को तो कायरता कापर्याय माना मजबूरी का। चूंकि गांधी के आदर्श को व्यवहारिकता के तौर पर नहीं समझा सका। इसलिए जिनलोगों ने वास्तविक रूप में गांधीजी की राह पर चलना चाहा उनको मजबूरी से जोड़कर लोगों ने अपनी समर्थता को छिपा लिया।''

डॉ जेएस माथुर, निदेशक, गांधी अध्ययन संस्थान, इलाहाबाद
'''ये प्रश्न बिल्कुल बेतुका है। लोग किसी भी उल्टी-सीधी बात को स्लोगन बना लेते हैं, उस पर हमें माथा-पच्ची नहींकरनी चाहिए कि कैसे बना क्यों बना। गांधीजी दृढ़ इच्छाशक्ति और सबल नेतृत्व के स्वामी थे, लोग उनसे बहुतकुछ सीख सकते हैं।''

डॉ एचएस उपाध्याय, अध्यक्ष, दर्शनशास्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''गांधीजी हिंसा के सहारे इतने बड़े शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य से नहीं लड़ सकते थे। इसीलिए मजबूरी में अहिंसाका सहारा लेना पड़ा। शायद तभी लोग ऐसा कहते हैं।''

डॉ राजाराम यादव, प्राध्यापक भौतिकशास्त्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''गांधीजी देश का बंटवारा नहीं चाहते थे, पर मजबूरी में उन्हें यह स्वीकार करना पड़ा। शायद इसीलिए मजबूरी कानाम महात्मा गांधी पड़ गया।''

डॉ आईआर सिद्दिकी,प्राध्यापक रसायनशास्त्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''उस समय जनता तत्कालीन सरकार पर आर्थिक या राजनैतिक रूप से दबाव डालने में असमर्थ थी। गांधीजीमजबूर होकर खुद को तकलीफ देना उचित समझते थे। उनकी कार्यप्रणाली यही थी कि अधिक से अधिक कष्टसहकर विरोध प्रदर्शित किया जाए।''

डॉ अनीता गोपेश, साहित्यकार एवं प्राध्यापक जन्तु विज्ञान, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
''गांधीजी राष्ट्र का विभाजन नहीं चाहते थे फिर भी विभाजन हुआ और वे मजबूर हो अपना शोक प्रकट करते रहे।उनकी इस मजबूरी को ही उनका अवमूल्यन करते हुए लोगों ने उनके नाम के साथ जोड़ दिया, यह सर्वथा अनुचितहै।''

डॉ अविनाश त्रिपाठी, व्याख्याता वनस्पति विज्ञान, इलाहाबाद
'' गांधीजी के संबंध में तीन बातें विचारणीय हैं-
वे बहुत कृषकाय शरीर के थे।
उन्होंने प्राय: मजबूरन ही अंग्रेजों से समझौते किये
भारत के विभाजन के मुद्दे पर जिन्ना के हठ के आगे वे मजबूर हो गये।
दूसरे किसी भी शख्स ने कभी मजबूर होकर समझौते नहीं किये, इसीलिए मजबूरी का नाम महात्मा गांधी कहाजाता है...''

ब्लॉगवाणी के जरिए इन लोगों के विचार मिेले-
सुरेश चंद्र गुप्त
''मेरे विचार में यह कहावत नेहरू की देन है। नेहरू ने गांधी को कभी अपना आदर्श नहीं माना, वह केवल अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए गाँधी से जुड़े थे। आज़ादी के बाद नेहरू को गांधी की जिद पर कई ऐसे फैसले करने परे जो उन्हें पसंद नहीं थे. नेहरू के लिए गांधी एक मजबूरी का नाम थे.''

सुरेश चिपलूणकर
''राष्ट्रपिता भी उन्हें "मजबूरी" में ही बनाया गया (माना गया) शायद इसीलिये… क्योंकि तिलक, भगतसिंह, बोस के होते हुए कुर्सी और चमचागिरी की मजबूरी में नेहरु ने उन्हें राष्ट्रपिता घोषित किया.''


(.....इस कड़ी को आप आगे बढ़ा सकते हैं....लिखिए आप क्या सोचते हैं इस मुद्दे पर, क्यों अक्सर लोग कहते हैं 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी !' अपने विचार आप यहां टिप्पणी के रूप में दर्ज कर दें या मुझे मेल कर दें। )

वो खबर बनाती थी, अब खबर बन गई !

सौम्या विश्वनाथन। कुल उम्र 26 साल। पत्रकारिता का करियर 5 साल से कुछ ज्यादा। यूं तो मैं सौम्या को उसके जिंदा रहते जानता भी न था। फिर भी हमारे बीच एक रिश्ता था। पहला तो ये कि हम दोनों ही आईआईएमसी पास आउट थे। दूसरा ये कि वो भी मेरे ही बैच की थी। हम एक दूसरे से परिचित नहीं थे। वो इसलिए कि मैंने दिल्ली में कोर्स किया। उसने ढ़ेंकनाल से किया। कमोबेश एक ही तरह के करियर से गुजरते हुए। वो एक अंग्रेजी चैनल में प्रोड्यूसर थी। मैं एक हिंदी चैनल में प्रोड्यूसर हूं। वो भी खबर बनाती थी। मैं भी खबर बनाता हूं। कहा जा रहा है। एक खबर के चक्कर में ही उसे ऑफिस में लेट हो गया। और उस रात के बाद का सवेरा वो कभी नहीं देख पाई। मालूम नहीं..उसके साथ क्या हुआ। मालूम नहीं किसने उसे मौत के घाट उतारा। मालूम नहीं आगे क्या होगा। मगर इतना जरुर महसूस कर पा रहा हूं..कि खबरों के साथ खेलते खेलते हर खबर खिलौना सी लगने लगी है। मेरी एक बैचमैट बेरहमी से मौत के घाट उतार दी जाती है...और मैं उसकी खबर बनातेवक्त ये सोच रहा हूं..उसकी मौत को शानदार ढ़ंग से बयां करने के लिए कैसी भाषा..कैसे शब्दों का इस्तेमाल करुं..। सचमुच हर रोज मौत का तमाशा बनाते बनाते हमारे जज्बातों का तमाशा बन गया है..औऱ हम बेबस हैं...कायदे से हम अपनी उस दोस्त के लिए दुखी भी नहीं हो सकते...जो खबर बनाते बनाते खुद खबर बन गई है।

ये तो हुई मेरी कहानी। कुछ लोग ऐसे भी हैं..जिन्होंने सौम्या के साथ वक्त बिताया है.. सौम्या का जाना उनकी जिंदगी में कैसा खालीपन लेकर आया है...वो आप यहां पढ़ सकते हैं-
वो बार बार आती रही मेरे ख्यालों में

Tuesday, September 30, 2008

क्या मीडिया में बिहारवाद चलता है ?

इंडिया न्यूज में बतौर प्रोड्यूसर काम कर रहे सचिन अग्रवाल काफी परेशान हैं। उनकी बेचैनी और परेशानी इस लेख में साफ झलकती है। शायद ऑफिस में प्रतिक्रिया जताने का मौका उन्हें नहीं मिल पाया। लिहाजा वो अपनी बात यहां रख रहे हैं। सचिन अग्रवाल ईटीवी, टोटल टीवी, एस 1 और आजाद न्यूज जैसे जमे जमाए चैनलों में काम कर चुके हैं। अपनी बात बेहद बेबाकी से रखते हैं। जो कुछ वो कह रहे हैं, उससे सहमति असहमति अलग मुद्दा है...पर उनसे सहानुभूति जरुर है।- मॉडरेटर

क्या बिहारी बॉस बिहारी लोगों को सपोर्ट करते हैं......कहा तो ये ही जाता है कि हां करते हैं....मैं भुक्तभोगी हूं भी और नहीं भी....कभी लगता है कि ये होता है कभी लगता नहीं ...आखिर बॉस को भी तो नौकरी करनी है ...मालिक को दे या ना दे बाजार को तो जवाब देना ही पड़ेगा.... अगर वाद चलाएगा तो खुद बर्बाद हो जाएगा...अब वो फिदाईन तो हैं नहीं कि किसी वाद के लिए अपनी जान देदे .....मैं जहां का रहने वाला हूं वहां के लोगों की मदद इस हद तक तो नहीं करूंगा कि मेर ऊपर इल्जाम लगने लगें मुझे जगह जगह जाकर जवाब देना पड़े....मेरा अखिल भारतीय होने की छवि को क्षेत्रीय बना दिया जाए....बॉस भी तो इन चीजों से जूझता होगा....लेकिन फिर भी मन नहीं मानता ...मन में ये हर वक्त चलता रहता है कि बिहार के लोग बिहारियों को सपोर्ट करते हैं...ऐसा न होता तो आज हर जगह हर बड़ी कुर्सी पर यही लोग क्यों बैठे हैं.....कुछ तो है....क्या बिहार से ज्यादातर लोग पलायन करते हैं इसलिए मीडिया में भी ज्यादातर बिहारी है ...क्या बिहार के लोग पढ़ने लिखने वाले ज्यादा होते हैं...एक कारण ये भी है कि बिहार के लोग यूपीएससी के ग्लैमर में जब बिखर जाते हैं और नेता बनने के उनके पास चांस नहीं रह जाते तो ताकत की खोज उन्हे मीडिया में ले आती हो ...हो सकता है .....क्या बिहार के लोग अपने लोगों की मदद करते हैं....अगर करते हैं तो कोई बुराई नहीं...लेकिन मेरा नुकसान करके अगर उनकी मदद करेंगे तो बुराई है ...क्योंकि मैं शायद उनकी जगह होऊं तो ऐसा नहीं करूंगा...तो क्या बॉस अपनी कुर्सी को मजबूत करने के लिए अपने वफादार लोगों को भरने के चक्कर में बिहारवाद में पड़ जाता है....कुर्सी पर जो भी बैठेगा उसे काम करके तो देना होगा वरना नमस्कार होने में टाइम नहीं लगेगा...लेकिन कुर्सी पर बैठने के बाद उसके चारो पाए मजबूत भी करने पड़ते हैं...तो क्या पाए मजबूत करने के चक्कर में अधिकारी काबिलियत की बजाय़ इलाके को तरजीह देने लगते हैं.....मेरा ये मतलब नहीं कि बिहार के लोग प्रतिभाशाली नहीं होते ...हां मेरा मतलब ये जरूर है कि बिहार का हर पत्रकार मुझसे ज्यादा प्रतिभाशली नहीं....मैं जानता हूं मीडिया के कुछ लोगों को जिनके बारे में सुना है कि वो सिर्फ बिहार के लोगों को ही नौकरी देते हैं...उनके साथ काम करने को नहीं मिला....मिल भी गया तो राज ठाकरे तो मैं नहीं बन पाऊंगा.....लेकिन सच जानने ललक जरूर है ...आप लोग मेरी मदद करें......बताइए मैं दिल की सुनूं या दिमाग की ...या कहीं ऐसा है कि दोनो ही एक ही बात बोल रहे हों और मुझे अलग अलग लग रही हों.....दिल कहता है कि मान लो मीडिया ...प्लीज मेरी मदद करें.....

Sunday, September 28, 2008

अविनाश जी...महरौली में बम मैंने फोड़ा, शुक्र है आपका मोहल्ला बच गया !


स्थान- दिल्ली के ओखला इलाके में एक न्यूज चैनल का आफिस
समय- 3.40 मिनट
हालात- आफिस पहुंचने से कुछ वक्त पहले ही मुझे एफएम के जरिए मालूम हो चला था कि महरौली में बम फट गया है।
आफिस पहुंचकर जैसे ही मैंने अपना जीमेल अकाउंट खोला.. उसमें 3.15 मिनट का एक ईमेल नजर आया।
ये ईमेल मोहल्ला के मॉडरेटर और वर्तमान में दैनिक भाष्कर में सेवाएं दे रहे अविनाश दास जी का था। यूं तो ये
ईमेल बस डेढ़ लाइन का था...मगर इन डेढ़ लाइनों में जो कुछ लिखा गया था। उससे अंदाजा लगाना मुश्किल था
कि अविनाश जी ने क्या सोचकर ये ईमेल मुझे भेजा था। ईमेल में बस इतना ही लिखा गया था "सारे आतंकवादी
तो पकड़े या मार डाले गये थे, फिर महरौली में किसने बम फोड़ा?"

जामिया नगर में हुए मुठभेड़ को लेकर लिखे गए एक लेख के जवाब में मैंने एक लेख लिखा था। बहुत से लोगों ने पढ़ा.. जिसे जो समझ में आया.. टिप्पणी दे गए। मगर मोहल्ले वाले अविनाश जी ने मान लिया..कि मैं तो फर्जी मुठभेड़ों का समर्थक हूं। चूंकि मेरे लेख में मुठभेड़ को फर्जी ठहराए जाने के तार्किक विश्लेषण पर कुछ सहज जिज्ञासाएं जाहिर की गई थीं..। और शायद.. ये जिज्ञासाएं अविनाश जी को नागवार गुजरीं.. और इसके मायने उन्होंने कुछ इस तरह निकाले मानो मुझे पुलिसिया मुठभेड़ में एक्शन फिल्मों का पुट नजर आता हो..या फिर मैं वामपंथियों को छोड़कर बाकी बचे सांप्रदायिक हिंदुओं का प्रवीण तोगड़िया टाइप कोई नेता हूं...जिसे मुसलमानों की बढ़ती आबादी से खतरा नजर आता हो। अजीब बात है...जो वामपंथी नहीं है.. उसे पक्के तौर पर आरएसएस का कार्यकर्ता मान लिया जाता है। जो दक्षिणपंथी नहीं है..उस पर लेफ्टिस्ट होने का तमगा चिपका दिया जाता है। अफसोस तब होता है..जब ये काम वो लोग करते हैं..जिन्हें समाज में इसी बात का सम्मान मिला है..कि वो बाकियों की तरह भेड़चाल में नहीं चलते..। जिनसे ये उम्मीद पाली जाती है कि वो अपने दिमाग की खिड़कियां और दरवाजे खोलकर रहते हैं। मैं ये सब कुछ इसलिए नहीं लिख रहा कि..इसे एक मुद्दा बनाकर वैचारिक जुगाली का एक और नायाब मौका खोजा जाए...। ये एक सहज प्रतिक्रिया है....उस पूर्वाग्रह के प्रति जो अविनाश जी ने मेरे बारे में ना केवल बनाई बल्कि जाहिर भी की। खैर..अविनाश जी! मैं ये तो नहीं जानता..सचमुच महरौली में बम किसने फोड़ा..लेकिन अगर सचमुच आपको लगता है कि आतंकवाद के नाम पर होने वाले एनकाउंटर पर सवाल नहीं उठाकर मैंने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है तो चलिए मैं ही ये गुनाह कबूल कर लेता हूं...। हां..मैंने ही फोड़ा है महरौली में बम.. क्योंकि आपके मुताबिक.. सारे आतंकवादी या तो पकड़े या मार दिए गए थे...। शायद आपने ये ईमेल तो मुझे ये मानकर लिखा है कि मैं दिल्ली पुलिस का प्रवक्ता हूं.. या फिर इंडियन मुजाहिद्दीन का सरगना...। जो कुछ मानना हो मान लीजिए...मगर प्लीज..पूर्वाग्रह का चश्मा उतार दीजिए... क्योंकि लेफ्ट में जो एक बात बहुत जोर देकर कही जाती है कि "तय करो कि किस ओर हो..इस ओर या..." इससे बेहूदा सूक्ति कुछ भी नहीं हो सकती। विचारधाराओं के बौद्धिक मकड़जाल में आम आदमी के भीतर की सहजता और इंसानियत को खत्म करने की ये साजिश खत्म होनी चाहिए...। मैं जानता हूं...आपको ये बातें अच्छी नहीं लग रही होंगी.. मगर क्या आप मुझे एक वैलि़ड रीजन बता सकते हैं...आपने मुझसे क्यों पूछा.."सारे आतंकवादी तो पकड़े या मार डाले गये थे, फिर महरौली में किसने बम फोड़ा?" जब मीडिया में काम करने वाला हर शख्स खबर चलाने, बनाने या जानकारी हासिल करने में लगा हुआ था..ठीक उस वक्त.. वो भी धमाके के महज घंटे भर के भीतर आपको यही बात क्यों ध्यान में आई...कि आपको मुझे मेल करना है ? अगर आप इस पर अपना पक्ष रखना चाहें तो..अच्छा है...लेकिन विषय को कहीं और मत ले जाइएगा। वैसे भी.. इस्लामिक आतंकवाद...गोधरा नरसंहार कांड...बाबरी मस्जिद कांड...फलीस्तीन-इस्राइल विवाद...सोहराबुद्दीन केस.. जाहिरा शेख, नाथूराम गोडसे.. के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है.. और ना ही मुझे पोलिश..रशियन..या फिर बांग्ला लिटरेचर पढ़ने का ही मौका मिला। उम्मीद करता हूं..आप मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेंगे। क्योंकि ये सिर्फ आपका पूर्वाग्रह दूर करने की कोशिश भर है। बाकी.. आपसे शास्त्रार्थ करने की हिम्मत मैं जुटा भी नहीं सकता।

Tuesday, September 23, 2008

क्या बीमारी है ये भड़ास डॉट कॉम

क्या बीमारी है भइया ये ...ये किसी दिन मेरे खिलाफ न छाप दे...अब तो बड़ा आदमी बनने से डर लगता है ...किसी दिन मेरी हकीकत न छाप दे....ये भी नहीं पता कि जो छपेगा वो सच ही होगा...इतना जरूर है जो छपा होगा उसमें चटखारे लेने की पूरी गुंजाइश होगी...हर चैनल ... हर पत्रकार की खबर ले रहा है ...लेकिन इसका अंदाज मुझे पसंद नहीं....कम से कम पत्रकारों के लिए छपने वाली खबरें तो ऐसी हों जो चौसठिय़ा के अंदाज में न हों...हम सब पढ़े लिखे हैं और इससे ज्यादा दिक्कत इस बात की है कि अपने को पढ़ा लिखा मानते हैं...यशवन्त जी कृपया इतनी इज्जत न उतारें लोगों की ....निजी टिप्पणियों से बचें....संस्थान चलाने के लिए बहुत सी चीजें होती हैं...इस ब्लॉग को हर किसी का अपना फ्रस्टेशन निकालने का पखाना न बनाए....आप अच्छा काम कर रहें लेकिन प्लीज उसे अच्छी तरह से करें...पत्रकारिता में मौजूद मेरे जैसे दलित विचारकों की कुंठाओं को आवाज दें लेकिन मेरी शब्दावली को अपने संपादकीय शब्द तो दें...जो मैं बोलता हू प्लीज वैसे ही मत छाप दिया करें....मैं तो जाने अफसरों के लिए क्या क्या बोलता हूं...कई बार तो वो आलाकमान के परिवार की महिला सद्स्यों के बारे में मेरी कल्पनाशीलता का यौनातिरेक होता है .....तो क्या वो भी आप छाप देंगे....या अभी वो समय आने वाला है ......आया नहीं है .....इसे निजता की ओर न ले जाएं....किसी की इज्जत न लूटें....इज्जत लूटना बुरी बात है ......धन्यवाद

क्या मै महफूज हूँ ???? .......

बम ब्लास्ट की ख़बर को तवज्जो देना हम पत्रकारों का फर्ज होता है .....लेकिन जब आम आदमी की सोचते है तो लगता है की अभी बहुत कुछ बाकी है..कही कोशी तो कही सिंगुर या कुछ और ??? .....पहले तो नही लेकिन अब जब भी घर से निकालता हूँ ...तो मन में एक अनजाना सा डर बना रहता है की कही ब्लास्ट न हो जाए ...बस में मेट्रो में या फ़िर कही भी हर उस शक्श को संदेह की नजरो से देखता हूँ जिसके हाथ में कोई बैग होता है ...... लगातार हो रही आतंकवादी गतिविधियों से हर आदमी अपने आप को डरा हुआ महसूस कर रहा है......लेकिन लोगो कि दिनचर्या वैसे ही चल रही है जैसे पहले चल रही थी ...क्योंकि हम भारतीय है ,,,हमें कोई डिगा नही सकता .......लेकिन आम आदमी के लिए बदला है तो मन में एक डर .....
दोस्तों मै जिंदगी में कभी भी किसी से नही डरा हूँ ..... लेकिन किसी ब्लास्ट का शिकार हो के बे मौत नही मरना चाहता हूँ .... भगवान से यही दुआ है कि अगर कभी जान जाए तो देश की सेवा करते हुए जाए बस........ क्या खुफिया एजंसी इतनी निकम्मी हो गई है कि आम आदमी घर से निकलने के बाद वापस घर पहुच पाए ??????क्या ये मुमकिन है ????

Sunday, September 21, 2008

मैं कब बनूंगा आतंकवादी

मेरे जैसे लोग क्य़ों बन जाते हैं आंतकवादी....पढ़ने वाले ..लिखने वाले...परिवार से प्यार करने वाले ...जिंदगी से प्यार करने वाले...मौत से डरने वाले.....नौकरी करने वाले ...महत्वाकांक्षी...पैसा कमाने की जिद पाले हुए....दुनिया को खूबसूरत मानने वाले...कम्प्यूटर पर गिटपिट करेन वाले......मोबाइल इस्तेमाल करने वाले...लड़कियों से प्रेम करने वाले...,क्या है जो सारे रास्ते बदल देता है....सारे सपनों की दिशा बदल देता है ....सारे रिश्तों को जुनू से ढक देता है ...जिंदगी से मोहब्बत खत्म कर देता है .....लाश बनाकर छोड़देता है ...एक तारीख नवाज देता है ....जिस दिन होगी शरीर की मौत....मरने से पहले कितनी बार मरते होंगे मेंरे जैसे वो लोग जो बन गए आतंकवादी....पैसा तो नहीं होता होगा इसकी वजह....भविष्य बनाना तो नहीं होता इसका अंजाम....सिस्टम से तो मैं भी नाराज हूं फिर मैं क्यों नहीं बन पाता आतंकवादी...क्या उसे हासिल करने के लिए ज्यादा कलेजा चाहिए....क्या वो बनने के लिए जितना गुस्सा चाहिए मुझमें नहीं...क्या नाइंसाफी के शिकार लोग ही बनते हैं आतंकवादी....या जो अपराधी हैं वही बनते हैं आतंकवादी......ये सच है कि आंतकवादी क्रूर सिस्टम चाहिए...ये भी सच है कि आतंकवादी को खतरनाक बनाने के लिए एक नियोजित साजिश चाहिए....ट्रेन्ड टीचर चाहिए....ये सब मौजूद है...सारी वजहें मौजूद हैं ...सारे साधन मौजूद हैं.....फिर भी मैं नहीं बन सकता आतंकवादी....क्योंकि मैं नहीं लेता नफरत से इनर्जी....दहशत फैलाने के लिए चाहिए नफरत.चारों तऱफ फैली और मेरे अंदर बसी नफरत अबतक मेरे चलने फिरने सोचने समझने की वजह नहीं बना पाई है ....जबतक ऐसा है मैं नहीं बन सकता आतंकवादी ....