Sunday, June 13, 2010
Sunday, May 9, 2010
चकल्लस में मीडिया...

नमस्कार दोस्तों-
मीडिया मीडिया और मीडिया..........हर जगह ये लोग पहुंचे रहते है....बिना बताये और बिना बुलाये....अभी हाल ही में शिरडी में एक घटना घटी...या कहे कि घटना घटा दी गयी...रितिका रोशन मीडिया के दुश्मन बन गये थे...हर न्यूज़ चैनल उनको खलनायक के रूप में पेश कर रहा था.....मीडिया के साथ बदसलूकी का पूरा ठीकरा रितिक रोशन पर फोड़ दिया गया.. पूरा माजरा हम आपको बताते है कि क्या हुआ था उस दिन.....फिल्म अभिनेता रितिक रोशन अपने परिवार के साथ शिरडी के सांई बाबा के मंदिर में दर्शन करने गये थे...जो कि वो हमेशा किसी भी फिल्म के रिलीज होने के पहले करते है....ऐसा इस बार भी किये..लेकिन घटना ये घटी कि बिना बुलाये मेंहमान वहां भी पहुंच गये....फिर क्या होना था...वही जो बिना बुलाये मेहमान करते है...धक्का मुक्की का दौर चला...और इल्जाम लगा रितिक रोशन पर...रितिक को कहा गया कि वो फिल्म के पब्लिसिटी के लिये इस तरीके की हरकत कर रहे है..जबकि रितिक ने ट्विटर पर लिखे कि ये उनका निजी दौरा था जिसमें वो मीडिया को मना कर रहे थे लेकिन मीडिया ने नहीं माना और उनका फोटो खीचने लगें...जिसकी वजह से ये सारा मामला हो गया...अब रितिक रोशन को भी समझना चाहिये कि शिरडी के सांई बाबा उनके अकेले तो है नही...मीडिया ने बकायदा मंदिर प्रशासन से अनुमति लेके मंदिर में प्रवेश किया था....खैर ऐसे मौको पर मीडिया ताक में रहती है कि कोई घटना ऐसी हो जाये जिससे उनको मशाला मिल जाये...भाई मीडिया के बारे में जहां तक मै जानता हूं वहां एक बात सामने निकल के आती है..वो बात ये है कि रिपोर्टर जब भी किसी ख़बर के लिये ऑफिस से निकलता है तब उसका मेन मोटो यही होता है कि कोई ब्रेकिंग मिल जाये नहीं तो बना ली जायेगी क्योंकि बॉस की तारीफ जो बटोरनी है...इन रिपोर्टर लोगो को ये पता होना चाहिये कि वो इन सस्ती टीआरपी के चक्कर में जो काम करते है उससे सामने वाले के दिल पर क्या बीतती है....न्यूज़ चैनल वालो के लिये सबसे बड़ी खबर वॉलीवुड से होती है...अगर मुंबई में किसी कलाकार को छींक आ गयी तो ये लोग पूरे मुंबई के तापमान का पोस्टमॉर्टम कर देंगे....लेकिन अगर उड़ीसा या फिर झारखंड में किसी नक्सली का कहर टूटेगा तो ये उस ख़बर को महज टिकर में अपडेट कर देते है......खैर रितिक रोशन जैसा मामला खली और कुछ दिन पहले टीम इंडिया के स्पिनर हरभजन सिंह के साथ हुआ.....अब देखने वाली बात ये होगी कि कभी सच्चाई को सामने लाने की मुहिम में लगी मीडिया अपने पुराने अस्तित्व में कब लौटेगी ।
आपका
विवेक मिश्रा
मीडिया मीडिया और मीडिया..........हर जगह ये लोग पहुंचे रहते है....बिना बताये और बिना बुलाये....अभी हाल ही में शिरडी में एक घटना घटी...या कहे कि घटना घटा दी गयी...रितिका रोशन मीडिया के दुश्मन बन गये थे...हर न्यूज़ चैनल उनको खलनायक के रूप में पेश कर रहा था.....मीडिया के साथ बदसलूकी का पूरा ठीकरा रितिक रोशन पर फोड़ दिया गया.. पूरा माजरा हम आपको बताते है कि क्या हुआ था उस दिन.....फिल्म अभिनेता रितिक रोशन अपने परिवार के साथ शिरडी के सांई बाबा के मंदिर में दर्शन करने गये थे...जो कि वो हमेशा किसी भी फिल्म के रिलीज होने के पहले करते है....ऐसा इस बार भी किये..लेकिन घटना ये घटी कि बिना बुलाये मेंहमान वहां भी पहुंच गये....फिर क्या होना था...वही जो बिना बुलाये मेहमान करते है...धक्का मुक्की का दौर चला...और इल्जाम लगा रितिक रोशन पर...रितिक को कहा गया कि वो फिल्म के पब्लिसिटी के लिये इस तरीके की हरकत कर रहे है..जबकि रितिक ने ट्विटर पर लिखे कि ये उनका निजी दौरा था जिसमें वो मीडिया को मना कर रहे थे लेकिन मीडिया ने नहीं माना और उनका फोटो खीचने लगें...जिसकी वजह से ये सारा मामला हो गया...अब रितिक रोशन को भी समझना चाहिये कि शिरडी के सांई बाबा उनके अकेले तो है नही...मीडिया ने बकायदा मंदिर प्रशासन से अनुमति लेके मंदिर में प्रवेश किया था....खैर ऐसे मौको पर मीडिया ताक में रहती है कि कोई घटना ऐसी हो जाये जिससे उनको मशाला मिल जाये...भाई मीडिया के बारे में जहां तक मै जानता हूं वहां एक बात सामने निकल के आती है..वो बात ये है कि रिपोर्टर जब भी किसी ख़बर के लिये ऑफिस से निकलता है तब उसका मेन मोटो यही होता है कि कोई ब्रेकिंग मिल जाये नहीं तो बना ली जायेगी क्योंकि बॉस की तारीफ जो बटोरनी है...इन रिपोर्टर लोगो को ये पता होना चाहिये कि वो इन सस्ती टीआरपी के चक्कर में जो काम करते है उससे सामने वाले के दिल पर क्या बीतती है....न्यूज़ चैनल वालो के लिये सबसे बड़ी खबर वॉलीवुड से होती है...अगर मुंबई में किसी कलाकार को छींक आ गयी तो ये लोग पूरे मुंबई के तापमान का पोस्टमॉर्टम कर देंगे....लेकिन अगर उड़ीसा या फिर झारखंड में किसी नक्सली का कहर टूटेगा तो ये उस ख़बर को महज टिकर में अपडेट कर देते है......खैर रितिक रोशन जैसा मामला खली और कुछ दिन पहले टीम इंडिया के स्पिनर हरभजन सिंह के साथ हुआ.....अब देखने वाली बात ये होगी कि कभी सच्चाई को सामने लाने की मुहिम में लगी मीडिया अपने पुराने अस्तित्व में कब लौटेगी ।
आपका
विवेक मिश्रा
Monday, April 19, 2010
आईपीएल मतलब गड़बड़घोटाला...


नमस्कार दोस्तो...
पूरे डेढ़ महीने तक चला आईपीएल का सफर अब आईपीएल खत्म होने के कगार पर है...लेकिन इन दिनों के बीच सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि आईपीएल में क्रिकेट से बढ़कर विवाद ज्यादा बिका...आखिरी समय में तो मोदी और थरूर की जंग नें तो आईपीएल का सारा काला चिट्ठा ही खोल के रख दिया...मोदी जहां सुनंदा नाम की सुंदरी का सहारा ले रहे थे॥वहीं थरूर साउथ अफ्रीकी मॉडल गैब्रिएला के दामन को पकड़े थे... हां एक बात जरूर देखने को मिली, कि मोदी के कार्यालय में आयकर विभाग का छापा पड़ा तो ढ़ेर सारे दस्तावेज मिले जो कि मोदी के विपरीत जाते है....कुछ लोगो के मुताबिक क्रिकेट...क्रिकेट नही रह गया है...क्रिकेट बन गया है जुआ.. जी हां सुनंदा पुष्कर जैसे लोग इस जुए में पैसा लगाती है जिसका फल उनको दुगुना होता है...इस पूरे प्रकरण के बाद शशि थरूर को अपना विदेश राज्य मंत्री पद की कुर्बानी देनी पड़ी..जबकि ललित मोदी पर गाज गिरनी बाकी है....
ललित मोदी के बारे में...
ललित मोदी को आईपीएल के तीनो सीजन को सफलता पूर्वक चलाने का खिताब जरूर मिलना चाहिये....क्योंकि ये वही ललित मोदी है जो पिछले साल सुरक्षा को लेके गृहमंत्री पी. चिदंबरम का विरोध करके इस क्रिकेट के जुए को साउथ अफ्रीका में सफलता पूर्वक खेलवाये....वाकई में मोदी जी आप बधाई के पात्र है..लेकिन अगर आपके पैसे पर गौर फरमायें तो निकल के आता है कि....इन तीन सालो में आपके पास हर वो नई चीजे दिखी है जो एक अरबपति के पास होना चाहिये...ए दिगर की बात है कि आप खुद रईसो के श्रेणी में आते है..आपके पास ढ़ेरों कंपनिया है..लेकिन इन तीन सालो में आपके गैरेज में BMW, मर्सिडीज और प्राईवेट प्लेन जरूर बढ़े है..भाई मोदी साहब हर साख पे उल्लू बैठा है...आप जो पैसा इंडियन प्रीमियर लीग में बना रहे थे....उस पर सरकार की नज़र 2009 से ही लगी हुई थी...अभी तो और खुलासे बाकी है..देखने वाली बात ये होगी कि जेन्टलमैन वाले खेल क्रिकेट को जुआ बनाने वाले ये मोदी जैसे लोगों के पर कब कतरे जायेंगें.....
आपका
विवेक मिश्रा
Wednesday, March 10, 2010
काहे का रिजर्वेशन !
देश की आधी आबादी की चिंता सबको है सरकार को, विपक्ष को, महिला आयोग को और नारी हितों की झंडाबरदार उन तमाम संगठनों को भी जो आए दिन जंतर-मंतर पर अपनी तख्तियों के साथ पहुंच जाते हैं और चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे रहकर वो सारे काम करते हैं जो ये साबित कर दे कि देश की सारी महिलाओं की फिक्र अगर किसी को है तो वो केवल वहीं हैं.लेकिन जिसकी चिंता में वो दोहरे हुए जा रहे हैं उस अबला नारी को तो ये भी पता नहीं कि आरक्षण किस चिड़िया का नाम है! संसद किसकी पंचायत है और वहां जो नेताइन जी पहुंचेंगी वो क्या करेंगी वहां ! हो भी तो कैसे, बेचारी फुलमतिया की तो सुबह होती है झाड़ू-पोछे से और रात होती है जूठे बर्तनों की घिसघिसाहट से। दिन में अगर उसे बोलने-बतियाने या गल-चऊर करने का मौका भी मिलता है तो बातें कुछ ऐसी ही होती हैं- ‘फलनवें की दुल्हनिया बड़ी नकचढ़ी है...या ढेकनवे का मरद तो दिन-रा दारु पी के टुन्न रहता है और मेहरारु को झोंटा पकड़ के पीटता है स्साला..’ हां, जब चुनाव आएगा तब थोड़ा बहुत समझ में आएगा, लेकिन क्या ?...यही ना, कि अब तक नेताजी उसके घर आते थे वोट मांगने, अब नेताइन आएंगी, पूरे दल-बल के साथ। फूलमतिया सोचेगी- ‘मेहरारु मेहरारु का दरद नहीं तो कउन समझेगा ! लेकिन नेताइन ऐसा क्या कर देंगी जो अब तक नेताजी नहीं कर पाते थे ? क्या वो घूंघट का झंझट दूर कर देंगी ? क्या वो उसकी बिटिया का बियाह बिना दहेज के करवा देंगी ? क्या वो उसकी अम्मा जी या बाउजी को वो ये समझा पाएंगी कि बिटिया हो या बिटवा कोई फर्क नहीं पड़ता ? या वो उन शोहदों-लफंगों-गुडों-बदमाशों को ठीक कर देंगी जो आए दिन उसकी बिटिया या ननद का दुपट्टा या हाथ खींचकर भाग जाते हैं ? या उसके ससुर, ताऊ, जेठ या देवर की नकेल कस सकेंगी जो रात होते ही शुरू हो जाते हैं ?...एक तो ये सारे सवाल नेताइन से पूछने की हिम्मत ही नहीं होगी उसे, अगर उसने किसी तरह किसी चढ़ाने-वढ़ाने से ये सवाल पूछ भी लिए तो जवाब में क्या मिलेगा ?....बगल में खड़े नेताजी की चढ़ी-चढ़ी घूरती आंखें, उनकी पल-पल बदलती त्यौरियां...जिनका मतलब बस यही होगा ‘बहुत चल रही है तेरी जबान ! कहां है तेरा मरद ?’ और ऐसा तो तब होगा जब उसका मरद उसे ये सब बोलने देगा, वरना वो अगर भीतर से सिर पर पल्लू डाले बाहर आने लगेगी तभी उसका मरद टोक देगा ‘तू कहां जा रही है करमजली, चल अंदर’ और वैसे भी वो इन ‘फालतू’ पचड़ों में पड़ना भी चाहती- ‘अब तक कुछ हुआ है भला जो ये नेताइन कर देंगी, बड़ी आईं नेतागिरी करने, पहले अपना ही घर संभाल लें’ उधर उसका मरद भी हाथ खुजलाता हुआ ‘हे-हे…’ करता हुआ नेताइन से बोलेगा-‘हां, हां, आपको ही वोट देंगे..लेकिन....’ हाथ खुजलाते हुए उसकी नजरें कागज के कुछ हरे-हरे टुकड़ें तलाशेंगी, अगर मिल गए तो ठीक वरना ‘जय राम जी की’ और भी नेताइनें हैं वो भी आती ही होंगी अपना लाव-लश्कर लेकर। किवाड़ बंदकर वो सोचेगा ‘पिछली बार तो फलांने भइया जीते थे, उनकी मेहरारु खड़ी हुई हैं इस बार ! बड़ा हो-हल्ला है उनका। इस बार उ नहीं तो उनकी मेहरारु ही, सही का फरक पड़ता है !’ उसे फर्क पड़े न पड़े लेकिन असली फर्क तो उसे पड़ेगा जो इस महिला आऱक्षण के दम पर पहली बार चुनाव लड़ेगी। हर किसी औरत के वश का नहीं। अगर उसका पति-पिता-भाई-ससुर-काका-ताऊ कोई भी सियासी अखाड़े का पहलवान नहीं है तो भला उसे दांव-पेंच कहां से आएंगे ! अगर किसी से उसने दांव-पेंच सीखने की कोशिश भी की तो सियासी गुरु अपनी चेली से काम तो निकालेगा ही। अब ये उस लड़की या औरत पर है कि वो सियासी बिसात पर कितना आगे जाना चाहती है ! जितना ऊंचा जाना हो उतनी ही बड़ी दक्षिणा ! दक्षिणा देने से वो ही बचेंगी जो किसी ऊंची रसूख वाले की बीवी-बेटी-बहू होंगी। लेकिन काम तो वही है। जो काम अब तक नेताजी करते थे वही काम अब नेताइन को करना पड़ेगा, भले ही वो किचेन से करें। बच्चे की मालिश करते-करते कागजात पर दस्तखत करें चाहे जैसे करें। घर का बोझ पहले से था ही अब कागज-पत्तर का भी बोझ बढ़ा। नेताजी सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना अपनी शान के खिलाफ समझते थे, अब नेताइन को घर के कामों से फुरसत ही नहीं मिल पाएगी जो जा पाए, बहाना भी सॉलिड ! और अगर कुछ हिम्मती महिलाएं आगे भी आईं जिनका राजनीति में कोई नाते-रिश्तेदार नहीं है तो उन्हें कड़ा संघर्ष करना ही होगा। कॉलेज लेवल पर ही देखिए ज्यादा महिला उम्मीदवार किसी न किसी राजनेता या बाहुबली से ताल्लुक रखती है, किसी दबंग छात्रनेता की बहन या गर्लफ्रेंड होती है या फिर किसी रसूख वाले की रईसजादी ! अगर गलती से कोई आम लड़की चुनाव में खड़ी होती है तो उसे प्रलोभन या धमकी देकर बैठा दिया जाता है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिस पर बड़े-बड़े बाहुबली अजगर साम-दाम-दंड-भेद के साथ नजरें गड़ाएं बैठे हैं, वहां बेचारी मिडिल क्लास की नेताइन कैसे पहुंच पाएगी ? क्या वो इस आरक्षण की बैसाखी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर पाएगी ?
देश की आधी आबादी की चिंता सबको है सरकार को, विपक्ष को, महिला आयोग को और नारी हितों की झंडाबरदार उन तमाम संगठनों को भी जो आए दिन जंतर-मंतर पर अपनी तख्तियों के साथ पहुंच जाते हैं और चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे रहकर वो सारे काम करते हैं जो ये साबित कर दे कि देश की सारी महिलाओं की फिक्र अगर किसी को है तो वो केवल वहीं हैं.लेकिन जिसकी चिंता में वो दोहरे हुए जा रहे हैं उस अबला नारी को तो ये भी पता नहीं कि आरक्षण किस चिड़िया का नाम है! संसद किसकी पंचायत है और वहां जो नेताइन जी पहुंचेंगी वो क्या करेंगी वहां ! हो भी तो कैसे, बेचारी फुलमतिया की तो सुबह होती है झाड़ू-पोछे से और रात होती है जूठे बर्तनों की घिसघिसाहट से। दिन में अगर उसे बोलने-बतियाने या गल-चऊर करने का मौका भी मिलता है तो बातें कुछ ऐसी ही होती हैं- ‘फलनवें की दुल्हनिया बड़ी नकचढ़ी है...या ढेकनवे का मरद तो दिन-रा दारु पी के टुन्न रहता है और मेहरारु को झोंटा पकड़ के पीटता है स्साला..’ हां, जब चुनाव आएगा तब थोड़ा बहुत समझ में आएगा, लेकिन क्या ?...यही ना, कि अब तक नेताजी उसके घर आते थे वोट मांगने, अब नेताइन आएंगी, पूरे दल-बल के साथ। फूलमतिया सोचेगी- ‘मेहरारु मेहरारु का दरद नहीं तो कउन समझेगा ! लेकिन नेताइन ऐसा क्या कर देंगी जो अब तक नेताजी नहीं कर पाते थे ? क्या वो घूंघट का झंझट दूर कर देंगी ? क्या वो उसकी बिटिया का बियाह बिना दहेज के करवा देंगी ? क्या वो उसकी अम्मा जी या बाउजी को वो ये समझा पाएंगी कि बिटिया हो या बिटवा कोई फर्क नहीं पड़ता ? या वो उन शोहदों-लफंगों-गुडों-बदमाशों को ठीक कर देंगी जो आए दिन उसकी बिटिया या ननद का दुपट्टा या हाथ खींचकर भाग जाते हैं ? या उसके ससुर, ताऊ, जेठ या देवर की नकेल कस सकेंगी जो रात होते ही शुरू हो जाते हैं ?...एक तो ये सारे सवाल नेताइन से पूछने की हिम्मत ही नहीं होगी उसे, अगर उसने किसी तरह किसी चढ़ाने-वढ़ाने से ये सवाल पूछ भी लिए तो जवाब में क्या मिलेगा ?....बगल में खड़े नेताजी की चढ़ी-चढ़ी घूरती आंखें, उनकी पल-पल बदलती त्यौरियां...जिनका मतलब बस यही होगा ‘बहुत चल रही है तेरी जबान ! कहां है तेरा मरद ?’ और ऐसा तो तब होगा जब उसका मरद उसे ये सब बोलने देगा, वरना वो अगर भीतर से सिर पर पल्लू डाले बाहर आने लगेगी तभी उसका मरद टोक देगा ‘तू कहां जा रही है करमजली, चल अंदर’ और वैसे भी वो इन ‘फालतू’ पचड़ों में पड़ना भी चाहती- ‘अब तक कुछ हुआ है भला जो ये नेताइन कर देंगी, बड़ी आईं नेतागिरी करने, पहले अपना ही घर संभाल लें’ उधर उसका मरद भी हाथ खुजलाता हुआ ‘हे-हे…’ करता हुआ नेताइन से बोलेगा-‘हां, हां, आपको ही वोट देंगे..लेकिन....’ हाथ खुजलाते हुए उसकी नजरें कागज के कुछ हरे-हरे टुकड़ें तलाशेंगी, अगर मिल गए तो ठीक वरना ‘जय राम जी की’ और भी नेताइनें हैं वो भी आती ही होंगी अपना लाव-लश्कर लेकर। किवाड़ बंदकर वो सोचेगा ‘पिछली बार तो फलांने भइया जीते थे, उनकी मेहरारु खड़ी हुई हैं इस बार ! बड़ा हो-हल्ला है उनका। इस बार उ नहीं तो उनकी मेहरारु ही, सही का फरक पड़ता है !’ उसे फर्क पड़े न पड़े लेकिन असली फर्क तो उसे पड़ेगा जो इस महिला आऱक्षण के दम पर पहली बार चुनाव लड़ेगी। हर किसी औरत के वश का नहीं। अगर उसका पति-पिता-भाई-ससुर-काका-ताऊ कोई भी सियासी अखाड़े का पहलवान नहीं है तो भला उसे दांव-पेंच कहां से आएंगे ! अगर किसी से उसने दांव-पेंच सीखने की कोशिश भी की तो सियासी गुरु अपनी चेली से काम तो निकालेगा ही। अब ये उस लड़की या औरत पर है कि वो सियासी बिसात पर कितना आगे जाना चाहती है ! जितना ऊंचा जाना हो उतनी ही बड़ी दक्षिणा ! दक्षिणा देने से वो ही बचेंगी जो किसी ऊंची रसूख वाले की बीवी-बेटी-बहू होंगी। लेकिन काम तो वही है। जो काम अब तक नेताजी करते थे वही काम अब नेताइन को करना पड़ेगा, भले ही वो किचेन से करें। बच्चे की मालिश करते-करते कागजात पर दस्तखत करें चाहे जैसे करें। घर का बोझ पहले से था ही अब कागज-पत्तर का भी बोझ बढ़ा। नेताजी सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना अपनी शान के खिलाफ समझते थे, अब नेताइन को घर के कामों से फुरसत ही नहीं मिल पाएगी जो जा पाए, बहाना भी सॉलिड ! और अगर कुछ हिम्मती महिलाएं आगे भी आईं जिनका राजनीति में कोई नाते-रिश्तेदार नहीं है तो उन्हें कड़ा संघर्ष करना ही होगा। कॉलेज लेवल पर ही देखिए ज्यादा महिला उम्मीदवार किसी न किसी राजनेता या बाहुबली से ताल्लुक रखती है, किसी दबंग छात्रनेता की बहन या गर्लफ्रेंड होती है या फिर किसी रसूख वाले की रईसजादी ! अगर गलती से कोई आम लड़की चुनाव में खड़ी होती है तो उसे प्रलोभन या धमकी देकर बैठा दिया जाता है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिस पर बड़े-बड़े बाहुबली अजगर साम-दाम-दंड-भेद के साथ नजरें गड़ाएं बैठे हैं, वहां बेचारी मिडिल क्लास की नेताइन कैसे पहुंच पाएगी ? क्या वो इस आरक्षण की बैसाखी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर पाएगी ?देश की आधी आबादी की चिंता सबको है सरकार को, विपक्ष को, महिला आयोग को और नारी हितों की झंडाबरदार उन तमाम संगठनों को भी जो आए दिन जंतर-मंतर पर अपनी तख्तियों के साथ पहुंच जाते हैं और चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे रहकर वो सारे काम करते हैं जो ये साबित कर दे कि देश की सारी महिलाओं की फिक्र अगर किसी को है तो वो केवल वहीं हैं.लेकिन जिसकी चिंता में वो दोहरे हुए जा रहे हैं उस अबला नारी को तो ये भी पता नहीं कि आरक्षण किस चिड़िया का नाम है! संसद किसकी पंचायत है और वहां जो नेताइन जी पहुंचेंगी वो क्या करेंगी वहां ! हो भी तो कैसे, बेचारी फुलमतिया की तो सुबह होती है झाड़ू-पोछे से और रात होती है जूठे बर्तनों की घिसघिसाहट से। दिन में अगर उसे बोलने-बतियाने या गल-चऊर करने का मौका भी मिलता है तो बातें कुछ ऐसी ही होती हैं- ‘फलनवें की दुल्हनिया बड़ी नकचढ़ी है...या ढेकनवे का मरद तो दिन-रा दारु पी के टुन्न रहता है और मेहरारु को झोंटा पकड़ के पीटता है स्साला..’ हां, जब चुनाव आएगा तब थोड़ा बहुत समझ में आएगा, लेकिन क्या ?...यही ना, कि अब तक नेताजी उसके घर आते थे वोट मांगने, अब नेताइन आएंगी, पूरे दल-बल के साथ। फूलमतिया सोचेगी- ‘मेहरारु मेहरारु का दरद नहीं तो कउन समझेगा ! लेकिन नेताइन ऐसा क्या कर देंगी जो अब तक नेताजी नहीं कर पाते थे ? क्या वो घूंघट का झंझट दूर कर देंगी ? क्या वो उसकी बिटिया का बियाह बिना दहेज के करवा देंगी ? क्या वो उसकी अम्मा जी या बाउजी को वो ये समझा पाएंगी कि बिटिया हो या बिटवा कोई फर्क नहीं पड़ता ? या वो उन शोहदों-लफंगों-गुडों-बदमाशों को ठीक कर देंगी जो आए दिन उसकी बिटिया या ननद का दुपट्टा या हाथ खींचकर भाग जाते हैं ? या उसके ससुर, ताऊ, जेठ या देवर की नकेल कस सकेंगी जो रात होते ही शुरू हो जाते हैं ?...एक तो ये सारे सवाल नेताइन से पूछने की हिम्मत ही नहीं होगी उसे, अगर उसने किसी तरह किसी चढ़ाने-वढ़ाने से ये सवाल पूछ भी लिए तो जवाब में क्या मिलेगा ?....बगल में खड़े नेताजी की चढ़ी-चढ़ी घूरती आंखें, उनकी पल-पल बदलती त्यौरियां...जिनका मतलब बस यही होगा ‘बहुत चल रही है तेरी जबान ! कहां है तेरा मरद ?’ और ऐसा तो तब होगा जब उसका मरद उसे ये सब बोलने देगा, वरना वो अगर भीतर से सिर पर पल्लू डाले बाहर आने लगेगी तभी उसका मरद टोक देगा ‘तू कहां जा रही है करमजली, चल अंदर’ और वैसे भी वो इन ‘फालतू’ पचड़ों में पड़ना भी चाहती- ‘अब तक कुछ हुआ है भला जो ये नेताइन कर देंगी, बड़ी आईं नेतागिरी करने, पहले अपना ही घर संभाल लें’ उधर उसका मरद भी हाथ खुजलाता हुआ ‘हे-हे…’ करता हुआ नेताइन से बोलेगा-‘हां, हां, आपको ही वोट देंगे..लेकिन....’ हाथ खुजलाते हुए उसकी नजरें कागज के कुछ हरे-हरे टुकड़ें तलाशेंगी, अगर मिल गए तो ठीक वरना ‘जय राम जी की’ और भी नेताइनें हैं वो भी आती ही होंगी अपना लाव-लश्कर लेकर। किवाड़ बंदकर वो सोचेगा ‘पिछली बार तो फलांने भइया जीते थे, उनकी मेहरारु खड़ी हुई हैं इस बार ! बड़ा हो-हल्ला है उनका। इस बार उ नहीं तो उनकी मेहरारु ही, सही का फरक पड़ता है !’ उसे फर्क पड़े न पड़े लेकिन असली फर्क तो उसे पड़ेगा जो इस महिला आऱक्षण के दम पर पहली बार चुनाव लड़ेगी। हर किसी औरत के वश का नहीं। अगर उसका पति-पिता-भाई-ससुर-काका-ताऊ कोई भी सियासी अखाड़े का पहलवान नहीं है तो भला उसे दांव-पेंच कहां से आएंगे ! अगर किसी से उसने दांव-पेंच सीखने की कोशिश भी की तो सियासी गुरु अपनी चेली से काम तो निकालेगा ही। अब ये उस लड़की या औरत पर है कि वो सियासी बिसात पर कितना आगे जाना चाहती है ! जितना ऊंचा जाना हो उतनी ही बड़ी दक्षिणा ! दक्षिणा देने से वो ही बचेंगी जो किसी ऊंची रसूख वाले की बीवी-बेटी-बहू होंगी। लेकिन काम तो वही है। जो काम अब तक नेताजी करते थे वही काम अब नेताइन को करना पड़ेगा, भले ही वो किचेन से करें। बच्चे की मालिश करते-करते कागजात पर दस्तखत करें चाहे जैसे करें। घर का बोझ पहले से था ही अब कागज-पत्तर का भी बोझ बढ़ा। नेताजी सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना अपनी शान के खिलाफ समझते थे, अब नेताइन को घर के कामों से फुरसत ही नहीं मिल पाएगी जो जा पाए, बहाना भी सॉलिड ! और अगर कुछ हिम्मती महिलाएं आगे भी आईं जिनका राजनीति में कोई नाते-रिश्तेदार नहीं है तो उन्हें कड़ा संघर्ष करना ही होगा। कॉलेज लेवल पर ही देखिए ज्यादा महिला उम्मीदवार किसी न किसी राजनेता या बाहुबली से ताल्लुक रखती है, किसी दबंग छात्रनेता की बहन या गर्लफ्रेंड होती है या फिर किसी रसूख वाले की रईसजादी ! अगर गलती से कोई आम लड़की चुनाव में खड़ी होती है तो उसे प्रलोभन या धमकी देकर बैठा दिया जाता है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिस पर बड़े-बड़े बाहुबली अजगर साम-दाम-दंड-भेद के साथ नजरें गड़ाएं बैठे हैं, वहां बेचारी मिडिल क्लास की नेताइन कैसे पहुंच पाएगी ? क्या वो इस आरक्षण की बैसाखी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर पाएगी ?
देश की आधी आबादी की चिंता सबको है सरकार को, विपक्ष को, महिला आयोग को और नारी हितों की झंडाबरदार उन तमाम संगठनों को भी जो आए दिन जंतर-मंतर पर अपनी तख्तियों के साथ पहुंच जाते हैं और चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे रहकर वो सारे काम करते हैं जो ये साबित कर दे कि देश की सारी महिलाओं की फिक्र अगर किसी को है तो वो केवल वहीं हैं.लेकिन जिसकी चिंता में वो दोहरे हुए जा रहे हैं उस अबला नारी को तो ये भी पता नहीं कि आरक्षण किस चिड़िया का नाम है! संसद किसकी पंचायत है और वहां जो नेताइन जी पहुंचेंगी वो क्या करेंगी वहां ! हो भी तो कैसे, बेचारी फुलमतिया की तो सुबह होती है झाड़ू-पोछे से और रात होती है जूठे बर्तनों की घिसघिसाहट से। दिन में अगर उसे बोलने-बतियाने या गल-चऊर करने का मौका भी मिलता है तो बातें कुछ ऐसी ही होती हैं- ‘फलनवें की दुल्हनिया बड़ी नकचढ़ी है...या ढेकनवे का मरद तो दिन-रा दारु पी के टुन्न रहता है और मेहरारु को झोंटा पकड़ के पीटता है स्साला..’ हां, जब चुनाव आएगा तब थोड़ा बहुत समझ में आएगा, लेकिन क्या ?...यही ना, कि अब तक नेताजी उसके घर आते थे वोट मांगने, अब नेताइन आएंगी, पूरे दल-बल के साथ। फूलमतिया सोचेगी- ‘मेहरारु मेहरारु का दरद नहीं तो कउन समझेगा ! लेकिन नेताइन ऐसा क्या कर देंगी जो अब तक नेताजी नहीं कर पाते थे ? क्या वो घूंघट का झंझट दूर कर देंगी ? क्या वो उसकी बिटिया का बियाह बिना दहेज के करवा देंगी ? क्या वो उसकी अम्मा जी या बाउजी को वो ये समझा पाएंगी कि बिटिया हो या बिटवा कोई फर्क नहीं पड़ता ? या वो उन शोहदों-लफंगों-गुडों-बदमाशों को ठीक कर देंगी जो आए दिन उसकी बिटिया या ननद का दुपट्टा या हाथ खींचकर भाग जाते हैं ? या उसके ससुर, ताऊ, जेठ या देवर की नकेल कस सकेंगी जो रात होते ही शुरू हो जाते हैं ?...एक तो ये सारे सवाल नेताइन से पूछने की हिम्मत ही नहीं होगी उसे, अगर उसने किसी तरह किसी चढ़ाने-वढ़ाने से ये सवाल पूछ भी लिए तो जवाब में क्या मिलेगा ?....बगल में खड़े नेताजी की चढ़ी-चढ़ी घूरती आंखें, उनकी पल-पल बदलती त्यौरियां...जिनका मतलब बस यही होगा ‘बहुत चल रही है तेरी जबान ! कहां है तेरा मरद ?’ और ऐसा तो तब होगा जब उसका मरद उसे ये सब बोलने देगा, वरना वो अगर भीतर से सिर पर पल्लू डाले बाहर आने लगेगी तभी उसका मरद टोक देगा ‘तू कहां जा रही है करमजली, चल अंदर’ और वैसे भी वो इन ‘फालतू’ पचड़ों में पड़ना भी चाहती- ‘अब तक कुछ हुआ है भला जो ये नेताइन कर देंगी, बड़ी आईं नेतागिरी करने, पहले अपना ही घर संभाल लें’ उधर उसका मरद भी हाथ खुजलाता हुआ ‘हे-हे…’ करता हुआ नेताइन से बोलेगा-‘हां, हां, आपको ही वोट देंगे..लेकिन....’ हाथ खुजलाते हुए उसकी नजरें कागज के कुछ हरे-हरे टुकड़ें तलाशेंगी, अगर मिल गए तो ठीक वरना ‘जय राम जी की’ और भी नेताइनें हैं वो भी आती ही होंगी अपना लाव-लश्कर लेकर। किवाड़ बंदकर वो सोचेगा ‘पिछली बार तो फलांने भइया जीते थे, उनकी मेहरारु खड़ी हुई हैं इस बार ! बड़ा हो-हल्ला है उनका। इस बार उ नहीं तो उनकी मेहरारु ही, सही का फरक पड़ता है !’ उसे फर्क पड़े न पड़े लेकिन असली फर्क तो उसे पड़ेगा जो इस महिला आऱक्षण के दम पर पहली बार चुनाव लड़ेगी। हर किसी औरत के वश का नहीं। अगर उसका पति-पिता-भाई-ससुर-काका-ताऊ कोई भी सियासी अखाड़े का पहलवान नहीं है तो भला उसे दांव-पेंच कहां से आएंगे ! अगर किसी से उसने दांव-पेंच सीखने की कोशिश भी की तो सियासी गुरु अपनी चेली से काम तो निकालेगा ही। अब ये उस लड़की या औरत पर है कि वो सियासी बिसात पर कितना आगे जाना चाहती है ! जितना ऊंचा जाना हो उतनी ही बड़ी दक्षिणा ! दक्षिणा देने से वो ही बचेंगी जो किसी ऊंची रसूख वाले की बीवी-बेटी-बहू होंगी। लेकिन काम तो वही है। जो काम अब तक नेताजी करते थे वही काम अब नेताइन को करना पड़ेगा, भले ही वो किचेन से करें। बच्चे की मालिश करते-करते कागजात पर दस्तखत करें चाहे जैसे करें। घर का बोझ पहले से था ही अब कागज-पत्तर का भी बोझ बढ़ा। नेताजी सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना अपनी शान के खिलाफ समझते थे, अब नेताइन को घर के कामों से फुरसत ही नहीं मिल पाएगी जो जा पाए, बहाना भी सॉलिड ! और अगर कुछ हिम्मती महिलाएं आगे भी आईं जिनका राजनीति में कोई नाते-रिश्तेदार नहीं है तो उन्हें कड़ा संघर्ष करना ही होगा। कॉलेज लेवल पर ही देखिए ज्यादा महिला उम्मीदवार किसी न किसी राजनेता या बाहुबली से ताल्लुक रखती है, किसी दबंग छात्रनेता की बहन या गर्लफ्रेंड होती है या फिर किसी रसूख वाले की रईसजादी ! अगर गलती से कोई आम लड़की चुनाव में खड़ी होती है तो उसे प्रलोभन या धमकी देकर बैठा दिया जाता है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिस पर बड़े-बड़े बाहुबली अजगर साम-दाम-दंड-भेद के साथ नजरें गड़ाएं बैठे हैं, वहां बेचारी मिडिल क्लास की नेताइन कैसे पहुंच पाएगी ? क्या वो इस आरक्षण की बैसाखी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर पाएगी ?
देश की आधी आबादी की चिंता सबको है सरकार को, विपक्ष को, महिला आयोग को और नारी हितों की झंडाबरदार उन तमाम संगठनों को भी जो आए दिन जंतर-मंतर पर अपनी तख्तियों के साथ पहुंच जाते हैं और चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे रहकर वो सारे काम करते हैं जो ये साबित कर दे कि देश की सारी महिलाओं की फिक्र अगर किसी को है तो वो केवल वहीं हैं.लेकिन जिसकी चिंता में वो दोहरे हुए जा रहे हैं उस अबला नारी को तो ये भी पता नहीं कि आरक्षण किस चिड़िया का नाम है! संसद किसकी पंचायत है और वहां जो नेताइन जी पहुंचेंगी वो क्या करेंगी वहां ! हो भी तो कैसे, बेचारी फुलमतिया की तो सुबह होती है झाड़ू-पोछे से और रात होती है जूठे बर्तनों की घिसघिसाहट से। दिन में अगर उसे बोलने-बतियाने या गल-चऊर करने का मौका भी मिलता है तो बातें कुछ ऐसी ही होती हैं- ‘फलनवें की दुल्हनिया बड़ी नकचढ़ी है...या ढेकनवे का मरद तो दिन-रा दारु पी के टुन्न रहता है और मेहरारु को झोंटा पकड़ के पीटता है स्साला..’ हां, जब चुनाव आएगा तब थोड़ा बहुत समझ में आएगा, लेकिन क्या ?...यही ना, कि अब तक नेताजी उसके घर आते थे वोट मांगने, अब नेताइन आएंगी, पूरे दल-बल के साथ। फूलमतिया सोचेगी- ‘मेहरारु मेहरारु का दरद नहीं तो कउन समझेगा ! लेकिन नेताइन ऐसा क्या कर देंगी जो अब तक नेताजी नहीं कर पाते थे ? क्या वो घूंघट का झंझट दूर कर देंगी ? क्या वो उसकी बिटिया का बियाह बिना दहेज के करवा देंगी ? क्या वो उसकी अम्मा जी या बाउजी को वो ये समझा पाएंगी कि बिटिया हो या बिटवा कोई फर्क नहीं पड़ता ? या वो उन शोहदों-लफंगों-गुडों-बदमाशों को ठीक कर देंगी जो आए दिन उसकी बिटिया या ननद का दुपट्टा या हाथ खींचकर भाग जाते हैं ? या उसके ससुर, ताऊ, जेठ या देवर की नकेल कस सकेंगी जो रात होते ही शुरू हो जाते हैं ?...एक तो ये सारे सवाल नेताइन से पूछने की हिम्मत ही नहीं होगी उसे, अगर उसने किसी तरह किसी चढ़ाने-वढ़ाने से ये सवाल पूछ भी लिए तो जवाब में क्या मिलेगा ?....बगल में खड़े नेताजी की चढ़ी-चढ़ी घूरती आंखें, उनकी पल-पल बदलती त्यौरियां...जिनका मतलब बस यही होगा ‘बहुत चल रही है तेरी जबान ! कहां है तेरा मरद ?’ और ऐसा तो तब होगा जब उसका मरद उसे ये सब बोलने देगा, वरना वो अगर भीतर से सिर पर पल्लू डाले बाहर आने लगेगी तभी उसका मरद टोक देगा ‘तू कहां जा रही है करमजली, चल अंदर’ और वैसे भी वो इन ‘फालतू’ पचड़ों में पड़ना भी चाहती- ‘अब तक कुछ हुआ है भला जो ये नेताइन कर देंगी, बड़ी आईं नेतागिरी करने, पहले अपना ही घर संभाल लें’ उधर उसका मरद भी हाथ खुजलाता हुआ ‘हे-हे…’ करता हुआ नेताइन से बोलेगा-‘हां, हां, आपको ही वोट देंगे..लेकिन....’ हाथ खुजलाते हुए उसकी नजरें कागज के कुछ हरे-हरे टुकड़ें तलाशेंगी, अगर मिल गए तो ठीक वरना ‘जय राम जी की’ और भी नेताइनें हैं वो भी आती ही होंगी अपना लाव-लश्कर लेकर। किवाड़ बंदकर वो सोचेगा ‘पिछली बार तो फलांने भइया जीते थे, उनकी मेहरारु खड़ी हुई हैं इस बार ! बड़ा हो-हल्ला है उनका। इस बार उ नहीं तो उनकी मेहरारु ही, सही का फरक पड़ता है !’ उसे फर्क पड़े न पड़े लेकिन असली फर्क तो उसे पड़ेगा जो इस महिला आऱक्षण के दम पर पहली बार चुनाव लड़ेगी। हर किसी औरत के वश का नहीं। अगर उसका पति-पिता-भाई-ससुर-काका-ताऊ कोई भी सियासी अखाड़े का पहलवान नहीं है तो भला उसे दांव-पेंच कहां से आएंगे ! अगर किसी से उसने दांव-पेंच सीखने की कोशिश भी की तो सियासी गुरु अपनी चेली से काम तो निकालेगा ही। अब ये उस लड़की या औरत पर है कि वो सियासी बिसात पर कितना आगे जाना चाहती है ! जितना ऊंचा जाना हो उतनी ही बड़ी दक्षिणा ! दक्षिणा देने से वो ही बचेंगी जो किसी ऊंची रसूख वाले की बीवी-बेटी-बहू होंगी। लेकिन काम तो वही है। जो काम अब तक नेताजी करते थे वही काम अब नेताइन को करना पड़ेगा, भले ही वो किचेन से करें। बच्चे की मालिश करते-करते कागजात पर दस्तखत करें चाहे जैसे करें। घर का बोझ पहले से था ही अब कागज-पत्तर का भी बोझ बढ़ा। नेताजी सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना अपनी शान के खिलाफ समझते थे, अब नेताइन को घर के कामों से फुरसत ही नहीं मिल पाएगी जो जा पाए, बहाना भी सॉलिड ! और अगर कुछ हिम्मती महिलाएं आगे भी आईं जिनका राजनीति में कोई नाते-रिश्तेदार नहीं है तो उन्हें कड़ा संघर्ष करना ही होगा। कॉलेज लेवल पर ही देखिए ज्यादा महिला उम्मीदवार किसी न किसी राजनेता या बाहुबली से ताल्लुक रखती है, किसी दबंग छात्रनेता की बहन या गर्लफ्रेंड होती है या फिर किसी रसूख वाले की रईसजादी ! अगर गलती से कोई आम लड़की चुनाव में खड़ी होती है तो उसे प्रलोभन या धमकी देकर बैठा दिया जाता है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिस पर बड़े-बड़े बाहुबली अजगर साम-दाम-दंड-भेद के साथ नजरें गड़ाएं बैठे हैं, वहां बेचारी मिडिल क्लास की नेताइन कैसे पहुंच पाएगी ? क्या वो इस आरक्षण की बैसाखी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर पाएगी ?देश की आधी आबादी की चिंता सबको है सरकार को, विपक्ष को, महिला आयोग को और नारी हितों की झंडाबरदार उन तमाम संगठनों को भी जो आए दिन जंतर-मंतर पर अपनी तख्तियों के साथ पहुंच जाते हैं और चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे रहकर वो सारे काम करते हैं जो ये साबित कर दे कि देश की सारी महिलाओं की फिक्र अगर किसी को है तो वो केवल वहीं हैं.लेकिन जिसकी चिंता में वो दोहरे हुए जा रहे हैं उस अबला नारी को तो ये भी पता नहीं कि आरक्षण किस चिड़िया का नाम है! संसद किसकी पंचायत है और वहां जो नेताइन जी पहुंचेंगी वो क्या करेंगी वहां ! हो भी तो कैसे, बेचारी फुलमतिया की तो सुबह होती है झाड़ू-पोछे से और रात होती है जूठे बर्तनों की घिसघिसाहट से। दिन में अगर उसे बोलने-बतियाने या गल-चऊर करने का मौका भी मिलता है तो बातें कुछ ऐसी ही होती हैं- ‘फलनवें की दुल्हनिया बड़ी नकचढ़ी है...या ढेकनवे का मरद तो दिन-रा दारु पी के टुन्न रहता है और मेहरारु को झोंटा पकड़ के पीटता है स्साला..’ हां, जब चुनाव आएगा तब थोड़ा बहुत समझ में आएगा, लेकिन क्या ?...यही ना, कि अब तक नेताजी उसके घर आते थे वोट मांगने, अब नेताइन आएंगी, पूरे दल-बल के साथ। फूलमतिया सोचेगी- ‘मेहरारु मेहरारु का दरद नहीं तो कउन समझेगा ! लेकिन नेताइन ऐसा क्या कर देंगी जो अब तक नेताजी नहीं कर पाते थे ? क्या वो घूंघट का झंझट दूर कर देंगी ? क्या वो उसकी बिटिया का बियाह बिना दहेज के करवा देंगी ? क्या वो उसकी अम्मा जी या बाउजी को वो ये समझा पाएंगी कि बिटिया हो या बिटवा कोई फर्क नहीं पड़ता ? या वो उन शोहदों-लफंगों-गुडों-बदमाशों को ठीक कर देंगी जो आए दिन उसकी बिटिया या ननद का दुपट्टा या हाथ खींचकर भाग जाते हैं ? या उसके ससुर, ताऊ, जेठ या देवर की नकेल कस सकेंगी जो रात होते ही शुरू हो जाते हैं ?...एक तो ये सारे सवाल नेताइन से पूछने की हिम्मत ही नहीं होगी उसे, अगर उसने किसी तरह किसी चढ़ाने-वढ़ाने से ये सवाल पूछ भी लिए तो जवाब में क्या मिलेगा ?....बगल में खड़े नेताजी की चढ़ी-चढ़ी घूरती आंखें, उनकी पल-पल बदलती त्यौरियां...जिनका मतलब बस यही होगा ‘बहुत चल रही है तेरी जबान ! कहां है तेरा मरद ?’ और ऐसा तो तब होगा जब उसका मरद उसे ये सब बोलने देगा, वरना वो अगर भीतर से सिर पर पल्लू डाले बाहर आने लगेगी तभी उसका मरद टोक देगा ‘तू कहां जा रही है करमजली, चल अंदर’ और वैसे भी वो इन ‘फालतू’ पचड़ों में पड़ना भी चाहती- ‘अब तक कुछ हुआ है भला जो ये नेताइन कर देंगी, बड़ी आईं नेतागिरी करने, पहले अपना ही घर संभाल लें’ उधर उसका मरद भी हाथ खुजलाता हुआ ‘हे-हे…’ करता हुआ नेताइन से बोलेगा-‘हां, हां, आपको ही वोट देंगे..लेकिन....’ हाथ खुजलाते हुए उसकी नजरें कागज के कुछ हरे-हरे टुकड़ें तलाशेंगी, अगर मिल गए तो ठीक वरना ‘जय राम जी की’ और भी नेताइनें हैं वो भी आती ही होंगी अपना लाव-लश्कर लेकर। किवाड़ बंदकर वो सोचेगा ‘पिछली बार तो फलांने भइया जीते थे, उनकी मेहरारु खड़ी हुई हैं इस बार ! बड़ा हो-हल्ला है उनका। इस बार उ नहीं तो उनकी मेहरारु ही, सही का फरक पड़ता है !’ उसे फर्क पड़े न पड़े लेकिन असली फर्क तो उसे पड़ेगा जो इस महिला आऱक्षण के दम पर पहली बार चुनाव लड़ेगी। हर किसी औरत के वश का नहीं। अगर उसका पति-पिता-भाई-ससुर-काका-ताऊ कोई भी सियासी अखाड़े का पहलवान नहीं है तो भला उसे दांव-पेंच कहां से आएंगे ! अगर किसी से उसने दांव-पेंच सीखने की कोशिश भी की तो सियासी गुरु अपनी चेली से काम तो निकालेगा ही। अब ये उस लड़की या औरत पर है कि वो सियासी बिसात पर कितना आगे जाना चाहती है ! जितना ऊंचा जाना हो उतनी ही बड़ी दक्षिणा ! दक्षिणा देने से वो ही बचेंगी जो किसी ऊंची रसूख वाले की बीवी-बेटी-बहू होंगी। लेकिन काम तो वही है। जो काम अब तक नेताजी करते थे वही काम अब नेताइन को करना पड़ेगा, भले ही वो किचेन से करें। बच्चे की मालिश करते-करते कागजात पर दस्तखत करें चाहे जैसे करें। घर का बोझ पहले से था ही अब कागज-पत्तर का भी बोझ बढ़ा। नेताजी सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना अपनी शान के खिलाफ समझते थे, अब नेताइन को घर के कामों से फुरसत ही नहीं मिल पाएगी जो जा पाए, बहाना भी सॉलिड ! और अगर कुछ हिम्मती महिलाएं आगे भी आईं जिनका राजनीति में कोई नाते-रिश्तेदार नहीं है तो उन्हें कड़ा संघर्ष करना ही होगा। कॉलेज लेवल पर ही देखिए ज्यादा महिला उम्मीदवार किसी न किसी राजनेता या बाहुबली से ताल्लुक रखती है, किसी दबंग छात्रनेता की बहन या गर्लफ्रेंड होती है या फिर किसी रसूख वाले की रईसजादी ! अगर गलती से कोई आम लड़की चुनाव में खड़ी होती है तो उसे प्रलोभन या धमकी देकर बैठा दिया जाता है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिस पर बड़े-बड़े बाहुबली अजगर साम-दाम-दंड-भेद के साथ नजरें गड़ाएं बैठे हैं, वहां बेचारी मिडिल क्लास की नेताइन कैसे पहुंच पाएगी ? क्या वो इस आरक्षण की बैसाखी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर पाएगी ?
देश की आधी आबादी की चिंता सबको है सरकार को, विपक्ष को, महिला आयोग को और नारी हितों की झंडाबरदार उन तमाम संगठनों को भी जो आए दिन जंतर-मंतर पर अपनी तख्तियों के साथ पहुंच जाते हैं और चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे रहकर वो सारे काम करते हैं जो ये साबित कर दे कि देश की सारी महिलाओं की फिक्र अगर किसी को है तो वो केवल वहीं हैं.लेकिन जिसकी चिंता में वो दोहरे हुए जा रहे हैं उस अबला नारी को तो ये भी पता नहीं कि आरक्षण किस चिड़िया का नाम है! संसद किसकी पंचायत है और वहां जो नेताइन जी पहुंचेंगी वो क्या करेंगी वहां ! हो भी तो कैसे, बेचारी फुलमतिया की तो सुबह होती है झाड़ू-पोछे से और रात होती है जूठे बर्तनों की घिसघिसाहट से। दिन में अगर उसे बोलने-बतियाने या गल-चऊर करने का मौका भी मिलता है तो बातें कुछ ऐसी ही होती हैं- ‘फलनवें की दुल्हनिया बड़ी नकचढ़ी है...या ढेकनवे का मरद तो दिन-रा दारु पी के टुन्न रहता है और मेहरारु को झोंटा पकड़ के पीटता है स्साला..’ हां, जब चुनाव आएगा तब थोड़ा बहुत समझ में आएगा, लेकिन क्या ?...यही ना, कि अब तक नेताजी उसके घर आते थे वोट मांगने, अब नेताइन आएंगी, पूरे दल-बल के साथ। फूलमतिया सोचेगी- ‘मेहरारु मेहरारु का दरद नहीं तो कउन समझेगा ! लेकिन नेताइन ऐसा क्या कर देंगी जो अब तक नेताजी नहीं कर पाते थे ? क्या वो घूंघट का झंझट दूर कर देंगी ? क्या वो उसकी बिटिया का बियाह बिना दहेज के करवा देंगी ? क्या वो उसकी अम्मा जी या बाउजी को वो ये समझा पाएंगी कि बिटिया हो या बिटवा कोई फर्क नहीं पड़ता ? या वो उन शोहदों-लफंगों-गुडों-बदमाशों को ठीक कर देंगी जो आए दिन उसकी बिटिया या ननद का दुपट्टा या हाथ खींचकर भाग जाते हैं ? या उसके ससुर, ताऊ, जेठ या देवर की नकेल कस सकेंगी जो रात होते ही शुरू हो जाते हैं ?...एक तो ये सारे सवाल नेताइन से पूछने की हिम्मत ही नहीं होगी उसे, अगर उसने किसी तरह किसी चढ़ाने-वढ़ाने से ये सवाल पूछ भी लिए तो जवाब में क्या मिलेगा ?....बगल में खड़े नेताजी की चढ़ी-चढ़ी घूरती आंखें, उनकी पल-पल बदलती त्यौरियां...जिनका मतलब बस यही होगा ‘बहुत चल रही है तेरी जबान ! कहां है तेरा मरद ?’ और ऐसा तो तब होगा जब उसका मरद उसे ये सब बोलने देगा, वरना वो अगर भीतर से सिर पर पल्लू डाले बाहर आने लगेगी तभी उसका मरद टोक देगा ‘तू कहां जा रही है करमजली, चल अंदर’ और वैसे भी वो इन ‘फालतू’ पचड़ों में पड़ना भी चाहती- ‘अब तक कुछ हुआ है भला जो ये नेताइन कर देंगी, बड़ी आईं नेतागिरी करने, पहले अपना ही घर संभाल लें’ उधर उसका मरद भी हाथ खुजलाता हुआ ‘हे-हे…’ करता हुआ नेताइन से बोलेगा-‘हां, हां, आपको ही वोट देंगे..लेकिन....’ हाथ खुजलाते हुए उसकी नजरें कागज के कुछ हरे-हरे टुकड़ें तलाशेंगी, अगर मिल गए तो ठीक वरना ‘जय राम जी की’ और भी नेताइनें हैं वो भी आती ही होंगी अपना लाव-लश्कर लेकर। किवाड़ बंदकर वो सोचेगा ‘पिछली बार तो फलांने भइया जीते थे, उनकी मेहरारु खड़ी हुई हैं इस बार ! बड़ा हो-हल्ला है उनका। इस बार उ नहीं तो उनकी मेहरारु ही, सही का फरक पड़ता है !’ उसे फर्क पड़े न पड़े लेकिन असली फर्क तो उसे पड़ेगा जो इस महिला आऱक्षण के दम पर पहली बार चुनाव लड़ेगी। हर किसी औरत के वश का नहीं। अगर उसका पति-पिता-भाई-ससुर-काका-ताऊ कोई भी सियासी अखाड़े का पहलवान नहीं है तो भला उसे दांव-पेंच कहां से आएंगे ! अगर किसी से उसने दांव-पेंच सीखने की कोशिश भी की तो सियासी गुरु अपनी चेली से काम तो निकालेगा ही। अब ये उस लड़की या औरत पर है कि वो सियासी बिसात पर कितना आगे जाना चाहती है ! जितना ऊंचा जाना हो उतनी ही बड़ी दक्षिणा ! दक्षिणा देने से वो ही बचेंगी जो किसी ऊंची रसूख वाले की बीवी-बेटी-बहू होंगी। लेकिन काम तो वही है। जो काम अब तक नेताजी करते थे वही काम अब नेताइन को करना पड़ेगा, भले ही वो किचेन से करें। बच्चे की मालिश करते-करते कागजात पर दस्तखत करें चाहे जैसे करें। घर का बोझ पहले से था ही अब कागज-पत्तर का भी बोझ बढ़ा। नेताजी सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना अपनी शान के खिलाफ समझते थे, अब नेताइन को घर के कामों से फुरसत ही नहीं मिल पाएगी जो जा पाए, बहाना भी सॉलिड ! और अगर कुछ हिम्मती महिलाएं आगे भी आईं जिनका राजनीति में कोई नाते-रिश्तेदार नहीं है तो उन्हें कड़ा संघर्ष करना ही होगा। कॉलेज लेवल पर ही देखिए ज्यादा महिला उम्मीदवार किसी न किसी राजनेता या बाहुबली से ताल्लुक रखती है, किसी दबंग छात्रनेता की बहन या गर्लफ्रेंड होती है या फिर किसी रसूख वाले की रईसजादी ! अगर गलती से कोई आम लड़की चुनाव में खड़ी होती है तो उसे प्रलोभन या धमकी देकर बैठा दिया जाता है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी पंचायत में जिस पर बड़े-बड़े बाहुबली अजगर साम-दाम-दंड-भेद के साथ नजरें गड़ाएं बैठे हैं, वहां बेचारी मिडिल क्लास की नेताइन कैसे पहुंच पाएगी ? क्या वो इस आरक्षण की बैसाखी को हथियार की तरह इस्तेमाल कर पाएगी ?
Thursday, February 25, 2010
सचिन रिकॉर्ड तेन्दुलकर...

दोस्तो नमस्कार....
विश्व क्रिकेट में अगर सचिन की बात की जाये तो हर खिलाड़ी उनकी तारीफ ही करता है। खास करके जब उन्होनें वनडे में नाबाद दोहरा शतक लगाया तब....मास्टर की खासियत रही है कि वो जब भी मैदान पर उतरते है तब उनकी एक नयी अदा सामने आ जाती है। २४ अक्तूबर को ग्वालियर का रूप सिंह स्टेडियम में बैठा हर सचिन प्रेमी उनके इस कारनामा का गवाह बना है... साथ में खुद ग्वालियर का रूप सिंह स्टेडियम भी धन्य हो गया है.... क्योकिं क्रिकेट के भगवान ने साक्षात अपने असली रूप में आये। खुद मै भी उस महान क्षण का गवाह बना साथ में सचिन के दोहरे शतक पर लाइव चैट भी किया... दोस्तो सच में बता दूं कि हमने अपने पत्रकारिता में कई लाइव चैट कियें है...लेकिन मै बता दूं कि मेरी अब तक कि जिदंगी का ये लाइव चैट सबसे अहम रहेगा...पूरे आधे घंटे तक कैमरे के सामने मैं सचिन के नाबाद दोहरे शतक जड़ने पर उनका सचिननामा पढ़ता रहा। हमारी सहयोगी एंकर नें हमसे सवाल किया कि विवेक जी आप को कैसा महसूस हो रहा है............इस सवाल के बाद तो मानो मेरे गले से आवाज ही नही निकल रही थी... खुद मैं सचिन का बहुत बड़ा फैन हूं और इस महान पल को अपने लाइव चैट के दौरान अपने दर्शको से रूबरू करा रहा था॥लेकिन इस सवाल के बाद मेरी आखों से आंसू निकल पड़े किसी तरह से मैनें अपने आप को रोका...लेकिन हमारे सहयोगी लोग भांप गये थे कि अब मैं पूरी तरह से रो दूंगा॥लेकिन मैनें अपने आप को संभाला और सचिननामा पढ़ता रहा... दोस्तो यहां पर बता दें कि अगर हिन्दी पत्रकारिता के महात्मा गांधी प्रभाष जोशी जो कि सचिन के महान प्रशंसको में से एक थे......अगर वो जिंदा होते तो उनकी खुशी का ठिकाना ना रहता....क्रिकेट और सचिन पर प्रभाष जी के लेख वाकई में लाजवाब होते थे....खुद मै भी उनके आर्टिकिल से प्रेरणा लिया करता था...और सचिन भी.....अब सचिन से उम्मीद है कि वो अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अपने सौ शतक पूरा करे...
आपका
विवेक
Sunday, January 24, 2010
आईपीएल पर गरमा - गरमी...


दोस्तो नमस्कार.....
बहुत दिन हुआ कुछ लिखे सोचा कुछ लिंखू..... इन दिनो काफी बिजी था....कुछ खास हो भी नही रहा है। जेनेश्वर जी चले गये सो उनको जाना था उम्र हो गयी थी.... लेकिन उनका जाना इसलिये खल गया कि वो लोहिया के आखिरी चिराग कहे जाते थे जो बुझ गया....खैर मरना जीना तो लगा रहता है॥ अब बात की जाये ताजा उबाल कि जी हां ताजा मामला ये है कि आईपीएल आ गया है ... बोली भी लग गयी है... और सबसे बड़ी बात ये है कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों की बोली लगाने कि किसी फ्रैंचाईजी ने जहमत नही उठाई....भाई उठाता भी क्यों... इस उठाने के पीछे कई कारण है...एक तो पाकिस्तान का आंतकवादी रवैया और दूसरका उन पाकिस्तानी खिलाड़ियों की भारत में सुरक्षा... खैर बोली न लगने के पीछे एक लिखित कारण ये भी है कि उन खिलाड़ियों का दाम कुछ ज्यादा था। अफरीदी कि बात करे तो उनकी बोली लगाना शायद किसी टीम के बस की बात नही थी.... अब अफरीदी साहब कि बोली ना लगने से वो नाराज हो गये है.... साथ में अपने बोर्ड को भी अपनी नाराजगी में शामिल कर लिये है...पड़ोसी पाक तो हमेशा से ही भारत के खिलाफ कोई ना कोई मुद्दा तलाशता रहता है वो मुद्दा मिल भी गया....अफरीदी वाले मामले पर पाकिस्तान में बवाल मच गया है .... एक ओर तो भारत-पाक का रिश्ता तल्ख है तो दूसरी ओर आग में घी डालने का काम अफरीदी कर गये....अब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड इस पूरे मामले का छिछालेदर कर दिया है मामला कुछ रंग कुछ और का दे दिया गया है। पाकिस्तान बोर्ड के मुताबिक आईपीएल ने पाकिस्तान की तौहीन कि है.... और इस मामला के बाद कुछ पाकिस्तानी सांसद अपना भारत दौरा भी रद्द कर दिये है... अब खबर ये है कि पाकिस्तान में आईपीएल का प्रसारण भी बंद कर दिया जायेगा....भाई क्रिकेट का कोई मजहब नही होता धर्म नही होता है .... अगर होता है तो केवल इंज्वाय.............................
बहुत दिन हुआ कुछ लिखे सोचा कुछ लिंखू..... इन दिनो काफी बिजी था....कुछ खास हो भी नही रहा है। जेनेश्वर जी चले गये सो उनको जाना था उम्र हो गयी थी.... लेकिन उनका जाना इसलिये खल गया कि वो लोहिया के आखिरी चिराग कहे जाते थे जो बुझ गया....खैर मरना जीना तो लगा रहता है॥ अब बात की जाये ताजा उबाल कि जी हां ताजा मामला ये है कि आईपीएल आ गया है ... बोली भी लग गयी है... और सबसे बड़ी बात ये है कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों की बोली लगाने कि किसी फ्रैंचाईजी ने जहमत नही उठाई....भाई उठाता भी क्यों... इस उठाने के पीछे कई कारण है...एक तो पाकिस्तान का आंतकवादी रवैया और दूसरका उन पाकिस्तानी खिलाड़ियों की भारत में सुरक्षा... खैर बोली न लगने के पीछे एक लिखित कारण ये भी है कि उन खिलाड़ियों का दाम कुछ ज्यादा था। अफरीदी कि बात करे तो उनकी बोली लगाना शायद किसी टीम के बस की बात नही थी.... अब अफरीदी साहब कि बोली ना लगने से वो नाराज हो गये है.... साथ में अपने बोर्ड को भी अपनी नाराजगी में शामिल कर लिये है...पड़ोसी पाक तो हमेशा से ही भारत के खिलाफ कोई ना कोई मुद्दा तलाशता रहता है वो मुद्दा मिल भी गया....अफरीदी वाले मामले पर पाकिस्तान में बवाल मच गया है .... एक ओर तो भारत-पाक का रिश्ता तल्ख है तो दूसरी ओर आग में घी डालने का काम अफरीदी कर गये....अब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड इस पूरे मामले का छिछालेदर कर दिया है मामला कुछ रंग कुछ और का दे दिया गया है। पाकिस्तान बोर्ड के मुताबिक आईपीएल ने पाकिस्तान की तौहीन कि है.... और इस मामला के बाद कुछ पाकिस्तानी सांसद अपना भारत दौरा भी रद्द कर दिये है... अब खबर ये है कि पाकिस्तान में आईपीएल का प्रसारण भी बंद कर दिया जायेगा....भाई क्रिकेट का कोई मजहब नही होता धर्म नही होता है .... अगर होता है तो केवल इंज्वाय.............................
Tuesday, November 10, 2009
ये शीला तूने क्या किया...


दो तीन दिन पहले दिल्ली की बसो में सफर करते हुए अचानक सुनने को मिला कि अब पांच रूपये की जगह दस रूपये का टिकट लगेगा....भाई मैंने पूछा क्या बात है तो जवाब मिला कि शीला का एलान है टिकट तो लगेगा ही....भाई मैंने फिर पूछा कि क्या इसीलिये सरकार बनवाया गया था...फिर जवाब आया टिकट लेले ...कानून ना समझा...खैर किसी तरह मन मसोस कर पैसा निकाला और बरबस मुंह से निकल आया कि ये शीला तूने क्या किया.........
डीटीसी बसो का किराया बढ़ाने के पीछे शीला की दलील थी कि हर महीने डीटीसी घाटे में जा रही थी .....इसलिये किराया बढ़ाना लाजिमी है...भाई हम पूछते है कि पचास परसेन्ट बढ़ाना तो लाजिमी नहीं था...एक रूपया बढ़ाओ दो रूपया बढ़ाओ एक साथ पांच रूपया बढ़ाने के पीछे क्या वजह थी....खैर जहां पंद्रह से बीस रूपये में ऑफिस पहुंचा करते थे अब वो दायरा पच्चीस से तीस रूपये तक पहुंच गया है....दिल्ली में बढ़ रही महंगाई के पीछे कॉमनवेल्थ गेम में हुए खर्च को जोड़ के देखा जा रहा है ...लेकिन यहां पर सबसे बड़ा सवाल ये निकल के आ रहा है कि आखिर हम सरकार चुनते क्यों है....क्या इसीलिये कि जब भी जहां पर ज्यादा खर्च हो वहां पर भरपाई के लिये हर चीज को मंहगी कर दे....आखिर इसी दिन के लिये सरकार को चुना जाता है....नब्बे रूपये दाल तीस का आलू चालीस की चीनी... आटे का भाव पता नही कहां जा पहुंचा हैं.....दिल्ली में इतनी आसानी से मंहगाई को सरकार बढ़ा देती है कोई विरोध करने को आगे आता ही नहीं क्या दिल्ली वालो को सांप सूघ गया है....या फिर विपक्ष नकारा हो गया है......
मैट्रो का किराया अभी बाकी है दोस्त..........
आपका विवेक
डीटीसी बसो का किराया बढ़ाने के पीछे शीला की दलील थी कि हर महीने डीटीसी घाटे में जा रही थी .....इसलिये किराया बढ़ाना लाजिमी है...भाई हम पूछते है कि पचास परसेन्ट बढ़ाना तो लाजिमी नहीं था...एक रूपया बढ़ाओ दो रूपया बढ़ाओ एक साथ पांच रूपया बढ़ाने के पीछे क्या वजह थी....खैर जहां पंद्रह से बीस रूपये में ऑफिस पहुंचा करते थे अब वो दायरा पच्चीस से तीस रूपये तक पहुंच गया है....दिल्ली में बढ़ रही महंगाई के पीछे कॉमनवेल्थ गेम में हुए खर्च को जोड़ के देखा जा रहा है ...लेकिन यहां पर सबसे बड़ा सवाल ये निकल के आ रहा है कि आखिर हम सरकार चुनते क्यों है....क्या इसीलिये कि जब भी जहां पर ज्यादा खर्च हो वहां पर भरपाई के लिये हर चीज को मंहगी कर दे....आखिर इसी दिन के लिये सरकार को चुना जाता है....नब्बे रूपये दाल तीस का आलू चालीस की चीनी... आटे का भाव पता नही कहां जा पहुंचा हैं.....दिल्ली में इतनी आसानी से मंहगाई को सरकार बढ़ा देती है कोई विरोध करने को आगे आता ही नहीं क्या दिल्ली वालो को सांप सूघ गया है....या फिर विपक्ष नकारा हो गया है......
मैट्रो का किराया अभी बाकी है दोस्त..........
आपका विवेक
Friday, November 6, 2009
चले गये दद्दा...

हिन्दी पत्रकारिता के पितामह प्रभाष जोशी हमारे बीच में नहीं है..................
खबर सुनते ही लगा कि धरती डोलने लगी...भूकंप आ गया....ऐसा लगा कि हिन्दी पत्रकारिता अब खत्म हो गयी.....
इलाहाबाद से दिल्ली चला था तो एक इच्छा थी कि लेखनी के इस दद्दा से मिलू...अब ये इच्छा कभी पूरी नहीं होगी । क्रिकेट के प्रति उनकी दीवानगी का आलम ये था कि भारत का कोई मैच वो मिस नही करते थे। शायद ये दीवानगी ही उनको इस दुनिया से रुखसत कर गयी...जोशी जी सचिन के महान प्रशसंको में से एक थे। उनकी एक आर्टिकिल याद आ रही है..... जब सचिन नर्वस नाइन्टी के शिकार होते थे तब उन्होने एक लेख लिखा था....उसमें अपनी भावनाओ को पूरा उकेर कर लिख दिया था...उन्होनें लिखा था जब सचिन अस्सी या नब्बे के करीब पहुंचते थे तब मै अपनी टीवी बंद कर दिया करता था...शायद उनका शतक बन जाये...सचिन के प्रति उनकी अल्हड़ता इतनी थी कि वो ऐसे टोटका कर दिया करते थे....अगर वो आज होते तो सचिन के सत्रह हजार रन बनाने पर ऐसा आर्टिकिल लिखते कि मन बाग-बाग हो जाता। जोशी जी आज हमारे बीच नही है लेकिन उनकी लेखनी उनका आदर्श उनका कलम आंदोलन सब कुछ हमारे जेहन में अमर रहेगा। बाकी उनके बारे में और लिखने कि हिम्मत नहीं हो रही क्योंकि मन बहुत भावुक हो रहा है...
आपका
विवेक
खबर सुनते ही लगा कि धरती डोलने लगी...भूकंप आ गया....ऐसा लगा कि हिन्दी पत्रकारिता अब खत्म हो गयी.....
इलाहाबाद से दिल्ली चला था तो एक इच्छा थी कि लेखनी के इस दद्दा से मिलू...अब ये इच्छा कभी पूरी नहीं होगी । क्रिकेट के प्रति उनकी दीवानगी का आलम ये था कि भारत का कोई मैच वो मिस नही करते थे। शायद ये दीवानगी ही उनको इस दुनिया से रुखसत कर गयी...जोशी जी सचिन के महान प्रशसंको में से एक थे। उनकी एक आर्टिकिल याद आ रही है..... जब सचिन नर्वस नाइन्टी के शिकार होते थे तब उन्होने एक लेख लिखा था....उसमें अपनी भावनाओ को पूरा उकेर कर लिख दिया था...उन्होनें लिखा था जब सचिन अस्सी या नब्बे के करीब पहुंचते थे तब मै अपनी टीवी बंद कर दिया करता था...शायद उनका शतक बन जाये...सचिन के प्रति उनकी अल्हड़ता इतनी थी कि वो ऐसे टोटका कर दिया करते थे....अगर वो आज होते तो सचिन के सत्रह हजार रन बनाने पर ऐसा आर्टिकिल लिखते कि मन बाग-बाग हो जाता। जोशी जी आज हमारे बीच नही है लेकिन उनकी लेखनी उनका आदर्श उनका कलम आंदोलन सब कुछ हमारे जेहन में अमर रहेगा। बाकी उनके बारे में और लिखने कि हिम्मत नहीं हो रही क्योंकि मन बहुत भावुक हो रहा है...
आपका
विवेक
Tuesday, September 1, 2009
फुटबॉल का दर्द...

फुटबॉल एक ऐसा खेल जिसको पैर से खेला जाता है.... इसको लात से भी मारा जाता है..... शायद क्रिकेट के क्रेज से इसको हर कोई लात से ही मार रहा है। इस खेल में खिलाडी़ जितना भी फुटबॉल को लात मारता है खेल में उतना ही मजा आता है। लेकिन फेडरेशन और प्रशासन का उदासीन रवैया के चलते ये खेल आज हासिये पर है। फुटबॉल को लात पड़ रहा है आज के भ्रष्ट प्रशासन का..... साथ में फेडरेशन का जहां पर देखिये भ्रष्टाचार ही इस खेल पर हावी..... आखिरकार राजनीतिक हलके के लोग क्यों इन खेलो पर कुदृष्टि रखे है.....क्यों संसद के गलियारे में चिल्ल-पों करने वाले राजनेता खेल के मैदान पर अपनी हेकड़ी निकालते है....जवाब ये निकल के आता है फेडरेशन में आने वाले सरकारी पैसा इन राजनेताओं को अपनी ओर खींचता है। खैर इस फुटबॉल को जिसको भूटिया का नेतृत्व दूसरी बार सरताज बनाया है उसका हाल बेहाल हो गया है। प्रफुल्ल पटेल जो कि एक राजनेता है उनका नेतृत्व फेडरेशन में एक राजनेता से इतर कुछ भी नहीं है। भारत में यहीं नेहरू कप है जो १९९७ से २००७ तक हासिये पर था....खैर ओएनजीसी की मदद कहे या फिर सरकार का शिगूफा.....नेहरू कप फिर से शुरू हुआ....और भूटिया ने दूसरी बार सीरिया को हरा कर कप पर कब्जा किया.....भारत में राजनीति हर गली और कुचे में देखी और समझी जा सकती है। उसका परिणाम खेल के मैदान में भी देखने को मिलता है..... किसी भी फेडरेशन की बात करे तो हर जगह इन राजनेताओं की एक अच्छी खासी जमात देखने को मिल जायेगी....लेकिन भारतीय फुटबॉल टीम की दूसरी जीत को देख के लगता है कि इसको एक संजीवनी की जरूरत है।
आपका
विवेक
Thursday, July 23, 2009
भारत में भारतीय खेलों की उपेक्षा...
राष्ट्रीय खेल हॉकी का एक बार फिर मजाक उड़ाया गया। स्पोर्ट्स एथोरेटी ऑफ इंडिया ने अपने गैरजिम्मेदाराना रवैया पेश किया। सबसे मजेदार बात इ है कि ये बार-बार मजाक स्पोर्ट्स एथारिटी के ओर से किया गया। दरअसल पूरा मामला ये है कि भारतीय महिला और पुरूष टीम पुणे से दिल्ली आ रहे थे, जिनको लेने के लिये भारतीय खेल प्राधिकरण खिलाड़ियो के लिये होटल में बस नहीं भेजा.. वो खिलाड़ी लोग अपने द्वारा किये गये साधन से होटल से गतंव्य स्थान तक पहुंचे। खैर ये कोई नया मामला नहीं है जब इस तरह से भारतीय हॉकी खिलाड़ियो के साथ बदसलूकी की गयी हो। यहां पर सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात ये है कि हॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल है। जब राष्ट्रीय खेल के साथ ऐसा किया जा सकता है तो किसी भी खेल के साथ ऐसा हो सकता है...भारत में तीरंदाजी हो..कबड्डी हो या फिर कोई भी खेल....जिनका विश्व पटल पर महत्व होता है..इन खेलों के साथ हमेशा से नाइंसाफी ही हुई है...क्रिकेट के इस देश में कभी हॉकी का वर्चस्व होता था...जमाना बदला लोग बदले बदल गया खेल का स्वाद..जहां भारत के गांवो में हॉकी बांस के डंडे से खेला जाता था..आज उसकी जगह लकड़ी का बल्ला ले लिया है..इस मामले पर चिंतित होना लाजिमी है...क्योंकि आने वाले ओलंपिक में स्वर्ण...कांस्य ..रजत जैसे पदक इन्ही खेलो से मिलते है... चीन ...अमेरिका..जापान जैसे देश अपने यहां इस तरीके के खेलों पर पूरा ध्यान देते है...जिससे कभी भी ओलंपिक में उन देशों का स्थान सोना और चांदी लाने में नंबर एक पर होता है।
आपका
विवेक
आपका
विवेक
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