कटुआ कहने में खराबी क्या है भई....जो वो हैं वही तो कहा है वरुण गांधी....ये गाली कहां से हो गई जो न्यूज चैनलों पर इस शब्द के आने पर लंबी बीप लगा दी जा रही है, अरे जब किसी को डायन कहे जाने पर किसी को आपत्ति नहीं हुई.....किसी को काफिर कहे जाने पर आपत्ति नहीं हुई तो फिर कटुओं को कटुआ कहने पर गां....में मिर्च काहे लग रही है भाई... आम बोलचाल में हम कितनी बार अपने मुसलिम दोस्तों को कटुआ कहते हैं...और वो बुरा नहीं मानते.......ये अल्फाज मेरे अपने नहीं है....कहीं किसी के श्रीमुख से सुनी है, लेकिन इन शब्दों ने मुझे कुछ सोचने को मजबूर कर ही दिया। आखिरकार वरुण गांधी पर इतना बवाल क्यों मचा ? मेरे हिसाब से तो अब जाहिर ही है...पूरा का पूरा प्रकरण चुनावी स्टंट है...इस बार के चुनाव में बीजेपी के पास कोई मुद्दा तो है नहीं, राम मंदिर का मुद्दा है नहीं, महंगाई कम हो ही गई...फिर आखिर वो सरकार को घेरे तो कैसे घेरे, इसलिए उसने एक बार फिर हिंदुओं के दबे हुए आक्रोश को भुनाने का प्लान बनाया। और प्लान के तहत ही वरुण गांधी ने ये भड़काऊ भाषण दिया और अपने मीडिया मित्रों के सहारे रातोंरात बीजेपी के स्टार प्रचारक बन गए...अब हालत ये है कि बीजेपी और हिंदुत्व के समर्थक वरुण गांधी के झंडे तले इकट्ठे होने लगे हैं। जाहिर है इसका फायदा बीजेपी को मिलेगा। यही नहीं वरुण गांधी को बाकायदा सरेंडर करवा कर बीजेपी ने वरुण की टीआरपी और बढ़ा दी है...बुद्धिजीवी वर्ग इस पूरे प्रकरण की निंदा कर रहा है...लेकिन जिस वर्ग को वोट देने जाना है वो तो वरुण गांधी पर फिदा हो गई है।
Saturday, March 28, 2009
कटुआ कहने में खराबी का है भाई !
कटुआ कहने में खराबी क्या है भई....जो वो हैं वही तो कहा है वरुण गांधी....ये गाली कहां से हो गई जो न्यूज चैनलों पर इस शब्द के आने पर लंबी बीप लगा दी जा रही है, अरे जब किसी को डायन कहे जाने पर किसी को आपत्ति नहीं हुई.....किसी को काफिर कहे जाने पर आपत्ति नहीं हुई तो फिर कटुओं को कटुआ कहने पर गां....में मिर्च काहे लग रही है भाई... आम बोलचाल में हम कितनी बार अपने मुसलिम दोस्तों को कटुआ कहते हैं...और वो बुरा नहीं मानते.......ये अल्फाज मेरे अपने नहीं है....कहीं किसी के श्रीमुख से सुनी है, लेकिन इन शब्दों ने मुझे कुछ सोचने को मजबूर कर ही दिया। आखिरकार वरुण गांधी पर इतना बवाल क्यों मचा ? मेरे हिसाब से तो अब जाहिर ही है...पूरा का पूरा प्रकरण चुनावी स्टंट है...इस बार के चुनाव में बीजेपी के पास कोई मुद्दा तो है नहीं, राम मंदिर का मुद्दा है नहीं, महंगाई कम हो ही गई...फिर आखिर वो सरकार को घेरे तो कैसे घेरे, इसलिए उसने एक बार फिर हिंदुओं के दबे हुए आक्रोश को भुनाने का प्लान बनाया। और प्लान के तहत ही वरुण गांधी ने ये भड़काऊ भाषण दिया और अपने मीडिया मित्रों के सहारे रातोंरात बीजेपी के स्टार प्रचारक बन गए...अब हालत ये है कि बीजेपी और हिंदुत्व के समर्थक वरुण गांधी के झंडे तले इकट्ठे होने लगे हैं। जाहिर है इसका फायदा बीजेपी को मिलेगा। यही नहीं वरुण गांधी को बाकायदा सरेंडर करवा कर बीजेपी ने वरुण की टीआरपी और बढ़ा दी है...बुद्धिजीवी वर्ग इस पूरे प्रकरण की निंदा कर रहा है...लेकिन जिस वर्ग को वोट देने जाना है वो तो वरुण गांधी पर फिदा हो गई है।
Friday, March 20, 2009
चुनाव और हम.....

सबसे पहले बात भारतीय जनता पार्टी की.... १९९८ के बाद अब जाके पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र जारी हुआ है। घोषणा पत्र में राम मंदिर की बात को प्रमुखता से दिया गया है, एक बार सरकार बनने पर हिंदुवादी नजरिये के बाद बीजेपी राम मंदिर तो नही बना पायी देखते है अब सरकार अगर सरकार बन जाती है तो क्या होता है.......... कांगेस की बात करे तो कांग्रेस अभी तो मेनीफैस्टो नहीं जारी की है लेकिन अपने पांच साल के कार्यकाल को भुनाने में गुरेज नही करेगी।
समाजवाद को भूल चुकी समाजवादी पार्टी अब लोहिया का नाम लेने से नही चुकेगी। खैर चुनाव में सीट जो लेनी है।
आम आदमी के पैसे से अपने घर के रोशनी जलाने वाले ये नेता लोग वोट लेने के चक्कर में कुछ भी करने से नहीं चुकेंगी.........
आम आदमी की जीवन शैली में थोड़ा सा परिवर्तन जरूर हुआ है लेकिन गांव में अभी भी जागरूकता की कमी है। लोग जातिगत राजनीति से उपर नही उठ रहे है। लेकिन जब भी आम जनता जागेगी तो क्रांति जरूर आयेगी।
Friday, February 27, 2009
A must watch
I got a chance to watch this...fantastic performance... a must watch.
http://renaissancepr.blogspot.com/2009/02/must-watch.html
Thanks,
Monday, February 9, 2009
ब्लॉगर्स मेनिफेस्टो- लोकसभा 2009
൧. हर पार्टी की एक बिजली- सड़क नीति हो, उस पर उसकी राय हो, समाधान के तरीके हों और उसका वादा हो कि अगले पांच साल में कितने मेगावाट और किलोमीटर वो जोड़ेंगे।
൨. देश में अलग से शिक्षा का बजट हो, जीडीपी का कमसे कम ൬ फीसदी हमें चाहिए। हर दो किलोमीटर पर एक हायरसेकेंडरी स्कूल और हर जिले में एक यूनिवर्सिटी और एक मेडिकल क़ॉलेज।
൩.प्राथमिक स्तर से अनिवार्य अंग्रेजी हो, यूनिवर्सिटी में सिर्फ अंग्रेजी माध्यम हो-इस पर खुलकर बहस हो।
൪. हर साल कमसे कम एक आईआईटी और एक एम्स की स्थापना।
൫. शिक्षकों और सेना के लिए अलग से बेतन आयोग।
൭. विवादस्पद मुद्दों को सुलझाने के लिए पार्टियों की राय का खुलासा हो।
8.डिफेंस बजट को तार्किक किया जाए.
൯. दलित- आदिवासियों और महिलाओं का अलग बजट हो।
൧൦. पर्यावरण के बारे में नीति
Monday, February 2, 2009
नीतीश बने पॉलिटिक्स के स्लमडॉग
नीतीश कुमार को पालिटिशियन आफ द ईयर अवार्ड में शीला दीक्षित से काफी कड़ी टक्कड़ झेलनी पड़ी। लेकिन नीतीश के इन उपलव्धियों को कुछ लोग कई नजरिये से देखते हैं। बिहार जैसे सूबे में जहां विकास के काम कभी ढ़ंग से हुए ही नहीं, ऐसे जगह पर कुछ भी थोड़ा काम किसी नेता को काफी आगे बढ़ा सकता है-इसमें कोई शक नहीं। लेकिन दूसरी तरफ इसका एक सकारात्मक पक्ष ये भी है कि बिहार जैसे कार्य संस्कृति विहीन सूबे को पटरी पर लाना भी कोई आसान काम नहीं है, और इसमें नीतीश को सफलता मिलती नजर आ रही है।
एक बात तो तय है कि बिहार में अब विकास राजनीति के एजेंडे में शामिल हो गया है। लालू यादव हों या रामविलास पासवान सभी विकास को अपना एजेंडा बना रहे हैं। हलांकि ये कहना अभी भी जल्दबाजी है कि ये विकास, वोट में कितना तब्दील हो पाएगा। फिलहाल बिहार में किसी भी दल के खिलाफ एंटी इन्कमबेंसी का फैक्टर नहीं है। नीतीश के लिए ये बात तो सूकून की है ही, लालू यादव के प्रति भी लोगों का पुराना आक्रोश कम हुआ है। ऐसे में सियासी पार्टियां अगले चुनावों में कोई बड़ा फैक्टर नहीं रहेंगी-हां, उम्मीदवारों का बेहतर चयन जरुर चुनाव परिणामों को प्रभावित करेगा। फिलहाल तो नीतीश कुमार के लिए अवार्डों की बरसात जरुर सुकून देनेवाली है।
Monday, January 26, 2009
मैथिल ब्राह्मण संस्कार
ब्राह्मण हमेशा सँ संस्कारक लेल विख्यात रहल अछि। ओना ई बात अलग अहि जे आई ब्राह्मण अपन संस्कार केँ बिसरि रहल छथि। जाति-प्रथा में ब्राह्मण कें सबसँ श्रेष्ठ मानल गेल अहि जाहि चलते हुनकर कर्तव्य होईत छनि जे ओ अपन ज्ञान आ शास्त्रसम्मत कर्म सँ समाजक मार्ग दर्शन करैत रहथि। ब्राह्मणक किछु प्रमुख संस्कारक बारे मे एतए बतएबाक प्रयास क’ रहल छी...
छठिहार: ब्राह्मणक संस्कारक पहिल शुरुआत छठिहार दिन सँ होईत अछि। छठिहार बच्चा के जन्मक छठम दिन मनाओल जाइत अछि। एहि दिन सांझक समय सति भगवती के सामने अरिपण द विशेष पूजा-पाठ कएल जाईत अछि। एहि अवसर पर मां आ बच्चा के पीयर कपड़ा विशेष तौर पर पहिराओल जाइत अछि आ ओकर बढ़िया संस्कारक कामना कएल जाइत अछि। एहि प्रथा मे महिले टा हिस्सा लैत छथि। छठिहार में प्रयुक्त होबए वला सामग्री: कागत, लाल रोसनाई, पुरहर पाटिल, बियैन, दीप, कजरौटा, शाही कांट, चक्कु, छूरा आ लावा।
नामकरण: जन्मक एगारहम वा बारहम दिन बच्चा केर नामकरण कएल जाइत अछि। एहि अवसर पर पंच देवता, विष्णु, नवग्रह आ पार्थिव शिवलिंग के पूजा विधि विधानक संग कएल जाइत अछि। एकर बाद बच्चा के राशि के हिसाब सँ कोनो उपयुक्त नाम देल जाईत अछि। बच्चा आ मां नबका कपड़ा पहिर भगवानक पूजा-अर्चना करैत छथि। एकर बाद दुरबा पातक डांट के मौध में डुबा बच्चाक ठोर पर नाम लिखल जाईत अछि। नब वस्त्र अक्सरहां बच्चा के मात्रिक सं अबैत अछि। ओना ई कोनो जरूरी नै। अन्नपराशन: अगर बेटा हो त छह सं आठ महिना के बीच आ बेटी हो तो सात सं नौ महिना के बीच कोनो शुभ मुहुर्त मे बच्चा के नबका कपड़ा पहिरा घरक कोनो बुजुर्ग महिला इ विधि करैत छथि। एहि विधिक तहत बच्चा के पहिलुक बेर अन्न खुआओल जाइत अछि। एहि अन्न के तहत मुख्य रूप सँ बच्चा के पायस आ मिठाई खुऔबाक प्रथा अछि। कतेक ठाम इ विधि बच्चा के मामाक द्वारा कयल जाईत अछि। कहल जाईत अछि जे मामा चांदी के बाटी मे बच्चा के पायस खुआबैत छथि। ओना मामाक सामथ्र्य गुने बाटी कोनो आरो चीज के भए सकैत अछि। एहि बारे मे एकटा धारणा ईहो अछि जे अगर इ विधि नै कएल जाइत छैक त बच्चा तोतराय लागैत अछि।
मुड़न: मुड़न अक्सरहां एक सं पांच सालक बीच मे कोनो शुभ मुहुर्त पर कएल जाइत अछि। एहि अवसर पर बच्चा के केस हजाम द्वारा कैंची सँ काटल जाइत अछि जकरा घरक कोनो बुजुर्ग महिला बच्चाक पाछू बैसि अपना आंचर में रखैत छथि। केस कटला के बाद बच्चा के नाहाओल जाइत अछि आ फेर नबका पकड़ा पहिरा दुर्बाछत देल जाइत अछि। एकर बाद बच्चा पहिने भगवती के प्रणाम करैत अछि आ तकर बाद सब केँ पैर छूबि आशीर्वाद लैत अछि। एहि अवसर पर सांझ में भोज-भात आ मिठाई सेहो बांटल जाईत अछि। कतेक ठाम मुड़न पर बलि प्रथाक सेहो प्रचलन अछि जकरा प्रायः जगमुड़न कहल जाईत अछि। सांझ मे केस के बंसबिट्टी या फेर कोनो पवित्र नदी में भंसाओल जाइत अछि। मुड़नक अवसर पर कतेक ठाम बच्चा के कान सेहो छेदल जाईत अछि। बच्चा के कान सोनाक कुंडल सं छेदल जाइत अछि। ओना ई कोनो जरूरी नै कि कुंडल सोने के होमए। हालांकि ई प्रथा कतेक ठाम उपनयन में सेहो कयल जाईत अछि।
अक्षारंभ: प्रायः तीन सँ पांच सालक बीच में कहियो बच्चाक शिक्षारंभ कएल जाईत अछि। हालांकि ई बिधि कतेक ठाम मुड़नेक दिन क’ लेल जाईत अछि। बच्चा के हाथ में चैक पकड़ौबाक शुरुआत आचार्य भोरका उखराहा मे करैत छथि। एहि अवसर पर पंच देवता, कुल देवता, लक्ष्मी-गणेश, सरस्वती, विष्णु, महादेव और ब्रह्मा केेर पूजा कएल जाईत अछि। एकटा साबूत केराक पात पर अरिपण द’ पांच किलो अरबा चाउर ओहि पर पसारल जाईत अछि। एकर बाद आचार्य बच्चा के अपना कोरा मे ल’ बच्चा के दहिना हाथ मे चैक पकड़ा ओहि चावल पर ओम नमः शिवाय लिखबावैत छथि। एकर बाद एहि चावल के पीयर कपड़ा सँ झांपि देल जाईत अछि। चाउर के सांझ में उठा लेल जाईत अछि। ओना बहुत केयो ई बिधि सरस्वती पूजा के दिन क’ लैत छथि। सरस्वती के विद्या के देवी मानल गेल अहि आ लोक एहि दिन के एहि कार्यक लेल विशेष शुभ मानैत छथि।
उपनयन: कहल जाईत अछि जे उपयनक बादे ब्राह्मणत्वक संस्कार लोक मे अबैत अछि। एहि दिन सँ बच्चा के ब्रह्मक ज्ञान होईत अछि आ ओ अपन संस्कारक प्रति सजग होईत अछि। उपनयनक लेल ओना त’ उम्रक कोनो सीमा नहि अछि मुदा कहल जाईत अछि जे जँ पांच सालक भीतर भ’ जए तं ई विशेष उत्तम। उपनयनक विधि विवाहो सँ कहिं भाड़ी होईत अछि। उपनयनक विधि के शुरुआत उद्योग सँ होईत अछि। एकर बाद मैट मंगल, मरब ठट्ठी, चरखकट्टी, कुमरम, मात्रिका पूजा, अभ्युदयक श्रद्धा, चूड़ाकर्ण, उपनयन, वेदारंभ, समाबर्तन आ उपनयनक चारिम दिन रातिम होईत अछि। रातिम दिन सत्यनारायण भगवानक पूजा क’ उपनयनक विधि-विधानक समाप्ति कएल जाईत अछि। उपनयनो मे कतेक ठाम बलि प्रदानक प्रथा अछि।
विवाह: कहल जाईत अछि जे विवाहक बादे मानव जन्म के पूर्ण मानल जाईत अछि वरना जन्म अधूरा अछि। मैथिल विवाहक विधि अछि - सिद्धांत, कुमरम, लाबा भुजाई, आज्ञा डाला, मात्रिका पूजा वा अभ्युदयक श्रद्धा, आम-मौह विवाह, पैर धोआई, परिछन, धोबिनयां सँ सोहाग, नैना-जोगिन, कन्यादान, बिवाह, सिंदुरदान, चतुर्थी आ फेर दुईरांगमन। ओना कतेक ठाम मैथिल विवाह मे कुमरमक प्रथा नहीं अछि। एतबे नहि कतेक ठाम मात्रिका पूजा बरियातिक एलाक बाद होईत अछि तँ कतेक ठाम पहिने भ’ जाईत अछि।
मरण: संस्कारक अंतिम चरम थिक मरण। ताहि चलते एकरा अंतिम संस्कार सेहो कहल जाईत अछि।
Tuesday, January 20, 2009
प्रेम के बारे में कुछ विचार
बुद्धिजीवी लड़की से प्रेम तो और भी खतरनाक होता है !
बुद्धिजीवी लड़के मांसल लड़कियां चाहते हैं !
ज्यादा दिमागदार पुरुष कई-कई प्रेम करते हैं। उनका मानना है कि उनमें बहुत उर्जा है जिसे एक महिला नहीं संभाल सकती !
(सदी के सबसे जीनियस का खिताब पाए बर्टेंन्ड रसेल ने भी शायद एकबार कहा था कि दुनिया में बुद्धिमानों की कमी है-इसलिए उनकी जिम्मेदारी है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं से प्रेम कर ज्यादा से ज्यादा बुद्धिमान पैदा करें।)
कभी-कभी बुद्धिजीवी पुरुष एक ही साथ समर्पित और अपने से उम्र में कम लड़की चाहते हैं तो साथ ही साथ एक बुद्धिजीवी लड़की भी।
कुछ काबिल लोगों का मानना है कि लड़की की आंख और आवाज खूबसूरत नहीं है तो वो ज्यादा देर तक आकर्षित नहीं कर पाएगी !!
आध्यात्मिक प्रेम दूसरे ग्रह पर पाया जाता है। कृपया आध्यात्मिक प्रेमीगण इस कथन को अपने अपमान के तौर पर मत लें।
महिलाओं के सामने ज्यादातर पुरुषों की शराफत उसे पटाने का ही एक तरीका होता है।
एक हालिया शोध कहता है प्रेम में पड़े हुए आदमी की कार्यक्षमता और खूबसूरती बढ़ जाती है।
दोस्तों में एक मजाक प्रचलित है कि जो एक लड़की नहीं पटा पाया वो कारपोरेट जगत को खाक पटाएगा। यानी लड़की पटाने का आपके आत्मविश्वास से गहरा नाता दिखाया गया है।
(हलांकि ये हर हाल में आवश्यक नहीं कि आप प्रेम में पड़ गए तो कारपोरेट जगत में भी सफल ही होंगे। एक अंतर्मुखी और तीन-पांच न जाननेवाला व्यक्ति भी प्रेम में पड़ सकता है। लेकिन कारपोरेट जगत में....हरि.. हरि...)
नोट- उपर्युक्त विवरणों के आधार कुछ अपने अनुभव हैं, तो कुछ मित्रों के। इन विवरणों में सार्वभौम सत्य का दावा नहीं किया गया है।)
Monday, January 19, 2009
अरे भइया, कहां चांदनी चौक, कहां चाइना, इहां तो खाली जोकरई और कुंगफू
Friday, January 16, 2009
जिन्न को बोतल में बंद करना नामुमकिन है नेताजी...
उन्हे खुंदक इस बात की नहीं है कि मुम्बई हमलों का फुटेज क्यों दिखाया गया, खुंदक तो इस बात की है कि उनके बिरादरी के कई स्वनामधन्यों को अतीत में घूस लेते हुए सरेआम नंगा क्यों किया गया। माना कि जनता का एक तबका हमसे इसलिए नाराज है कि हमने कुछ दिन भूत-प्रेत और संपेरों का बीन भी दिखाया था-लेकिन इस बात की आलोचना का हक उन नेताओं को कैसे मिल गया जो दिन रात तांत्रिकों और साधुओं के आशीर्वादों के सहारे चुनाव जीतना चाहते हैं ? ये नेता अपनी निजी जिंदगी में इतने जन-विरोधी हैं जितना इस मुल्क का ब्यूरोक्रेट भी नहीं है। हमें ये याद दिलाने की कोई जरुरत नहीं कि दूरदर्शन जैसे राष्ट्रीय और विशाल संसाधनों से लैश संस्थान की नेताओं ने क्या दुर्गति कर रखी है।
दरअसल सरकार तो मीडिया को खुली प्रतिस्पर्धा के लिए खोलना ही नहीं चाहती थी, भला हो 90 के दशक का,जब देश में गठबंधन सरकारें बनने लगी और लालकिला किसी की बपौती नहीं रहा। अब जब एक बार जिन्न बोतल से बाहर आ ही गया है तो इन नेताओं के बाप का दिन नहीं है कि इसे फिर से अपनी बंदरिया बना लें। अभी तो कुछ नहीं हुआ है, एफएम रेडियो में जरा न्यूज आने दीजिए-नेताओं की हालात तो और खराब होने वाली है-रही सही कसर गांवो तक इंटरनेट की पहुंच खत्म कर देगी। दरअसल ये बौखलाहट दिन से दिन जागरुक होते जाते लोगों के खिलाफ है-टीवी न्यूज मीडिया के खिलाफ नही।
नेताओं को लगता है कि अब भ्रष्ट पैसों से बढ़े तोंद को कैमरे से छिपाना अब आसान नहीं है-इसलिए मीडिया को रेगुलेट करने का नायाब बहाना ढ़ूढ़ा गया है। लेकिन इन खद्दरधारियो को ये नहीं पता कि जनता हमारी आलोचना तो करती है-लेकिन वे इन नेताओं से मुहब्बत भी नहीं करती। इस मुल्क का पोलिटिकल सिस्टम आवाम कि चिंताओं को समझने में नाकाम साबित हुआ है और जनता अभी भी अपने आक्रोश और अपनी समस्याओं का अक्श मीडिया में ही तलाशती है-और वो हमारी आलोचना इसलिए करती है कि उसे लगता है हम राह से भटक रहे हैं।
Wednesday, January 14, 2009
पत्रकारिता पर शिकंजा .....
नही ।
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में संवैधानिक रूप से ये अधिकार मिला हुआ है की हर कोई अपनी बात कह सकता है । अनुच्छेद १९ (1) इस बात का गवाह है कि भारत का हर एक नागरिक अपनी बात को बेखौफ होकर व्यक्त कर सकता है । लेकिन मुंबई हमलो के बाद प्रसारण मंत्रालय को लगा कि प्राइवेट न्यूज़ चैनल टी आर पी को लेकर कुछ ज्यादा ही दिखा रहे है । यहाँ हम ये भी बता देना चाहते है कि ख़ुद सरकारी मिडिया भी मुंबई हमले की कवरेज़ कर रही थी ।
कई मामलो में खबरिया चैनल बहुत ही बढ़िया है, जैसे एन एस जी के जवानो की जांबाजी को दिखाना या फ़िर हमलो की हर बारीक़ से बारीक़ जानकारिया दिखाना ।इसी बीच में आंतकवादी टीवी देख कर जवानो के हर कदम को जानने लगे तो यही न्यूज़ चैनल लाइव प्रसारण बंद कर दिए ।
चाहे कड़ी धुप हो या मुसलाधार बारिस हमारे पत्रकार बंधू कैमरे की नजर से सब कुछ हम लोगो के बीच पहुचाते है । हाँ ये सही है की बाजारवादी युग में टी आर पी के मायने थोड़ा बदल गए है फ़िर भी अभी जो स्थिति है वो सरकारी तंत्र से बहुत ही बढ़िया है ।
हालाँकि हमारे संपादक लोग इसका विरोध कर रहे है और प्रधानमंत्री जी से भी मिलकर इस बारे में बात करेंगे ....देखते है क्या होता है ।