Wednesday, November 28, 2007

नशा शराब में होता तो नाचती बोतल...

( पीटीआई छोड़े करीब डेढ़ साल बीत गए हैं। लेकिन आज मेट्रो नाउ में एक खबर देखी तो खुद को रोक न सका। ये खबर पीटीआई के हवाले से छपी है। खबर को देखकर मैं नास्टेल्जिक हो गया। फिर क्या था, तर्जुमा करने बैठ गया। बहरहाल, एक सवाल ये भी बनता है कि आखिर इसी खबर का ट्रांसलेशन क्यों किया। इसका जवाब हमारे ब्लाग के नाम ऑफ द रिकॉर्ड में छिपा है। जी हां, ये पूरी की पूरी खबर ऑफ द रिकॉर्ड की गई बातचीत पर लिखी गई है। खबर के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं किया गया है। )

• विवेक सत्य मित्रम्

नई दिल्ली। कुछ दिनों पहले कांग्रेस में एक अजीब सी बहस गरमा गई थी। सवाल था, क्या कोई शराबी पार्टी में शामिल हो सकता है या नहीं? पार्टी की नई जेनरेशन के नेता कहते थे ‘हां’। लेकिन बड़े-बुजुर्गों का कहना था ‘कभी नहीं’। दरअसल कांग्रेस की नई पीढ़ी के नेताओं ने पार्टी की सदस्यता लेने के लिए शराब से तौबा करने की अनिवार्य शर्त पर सवाल उठाए थे। पार्टी के इन नेताओं का कहना था कि ज्यादातर लोग ऐसी शर्तों का पालन नहीं करते फिर इन्हें ऱखने का क्या फायदा। लेकिन पार्टी के तमाम दूसरे कद्दावर नेताओं का मानना था कि महात्मा गांधी की विरासत पर राज करने वाली पार्टी में ‘घोषित शराबियों’ की कोई जगह नहीं हो सकती। यंग जेनरेशन ने अपनी बात बेहद दमदार ढ़ंग से ऱखी। उनकी दलील थी कि समय के साथ चीजें बदलती हैं, ऐसे में मेंबरशिप क्राइटेरिया में भी बदलाव किया जाना चाहिए। उनकी मानें तो, “ आज के दौर में इंटरेक्शन के तौर तरीकों में भी काफी बदलाव आ चुका है, लिहाजा कभी कभार शराब पी लेने में हर्ज ही क्या है। वैसे भी आज के नेताओं को पहले की तुलना में ज्यादा बड़े और अलग-अलग किस्म के जनसमुदाय से जुड़ना होता है। ” इन तमाम नेताओं ने अपने विचार रखते हुए अपना नाम जाहिर नहीं करने की शर्त रखी थी। उन्हें डर था कि ऐसा होने पर पार्टी में उन्हें ‘पियक्कड़’ मान लिया जाएगा। इस तरह पार्टी में इस मुद्दे पर दो गुट बन गए। हर आदमी अपनी बात को ज्यादा दमदार ढ़ंग से कहने के बहाने खोज रहा था। देखते ही देखते मामला इतना गरमाया कि इसकी गूंज एआईसीसी की बैठक में भी सुनाई दी। कांग्रेस के युवा तुर्कों ने लगे हाथ इस बात पर भी सवाल उठाया कि आखिर कांग्रेस के साथ वफादारी साबित करने के लिए खादी पहनना कैसी मजबूरी है। लेकिन आखिरकार अनुभवी कांग्रेसियों के सामने उनकी एक न चली। फैसला सुनाया गया कि एक जमाने से चली आ रही परंपराओं में कोई बदलाव नहीं होगा। और ये फैसला आलाकमान का था जिसके बाद किसी if या but की गुंजाइश ही कहां बचती ?

3 comments:

Shahid Akhtar said...

सत्‍य मित्रम को साधुवाद। निस्‍संदेह एक सार्थक प्रयास है। पूर्वग्रह से मुक्‍त सत्‍य मित्रम के विचारों में पैनापन है और यही उनका असली असासा है।

om kabir said...

apki lekhni ka kayal hua, soch ka bhi. apka prayas rang layega.

Anonymous said...

Dear Mitram
to man le hi nasha bottle me nahin hota.
Waise badiya prayas hai, tarif to pahle hi kabir das & shahid saab ne kar hi di hai.
PTI se alag hone ke baad v log wahan ke love hate relation se alag nahin hote.
Thanks
ek baar fir se badiya prayas hai.