Sunday, December 30, 2007

Tuesday, December 25, 2007

"वो खाली आँगन, उजड़ी कलियाँ।
वो वीरान बगीचे, बेरंग तितलियाँ।।
न जाने आज फिर क्यों याद आए।
वो खाली रस्ते, वो सूनी गलियाँ।।"

आज बहुत दिनों के बाद यकायक अपने गाँव की याद आ गई। एक अरसा हो गया गाँव गए हुए। इस दौरान जीवन पटना-दिल्ली के बीच की पैसेंजर ट्रेन बनकर रह गया है। समय कैसे फिसलता चला गया, पता ही नहीं चला। पहले पढ़ाई, फिर नौकरी की तालाश। और जब नौकरी मिल गई तो फ़ुरसत की तलाश। याद भी तब आई जब कल रात अपने छत पर चाँद नज़र आया। वही चाँद जो गाँव में गाहे-बगाहे रोज़ नज़र आता था, आज वर्षों बाद छत पर फिर मिला। सर्दी में मेरी तरह वह भी ठिठुर रहा था।

गाँव में दादी रहती है जो अब काफ़ी बूढ़ी हो गई है। लगभग सत्तर पार। बाबा के गुज़र जाने के बाद उस हवेलीनुमा घर में पता नहीं अकेले कैसे अपना समय गुज़ार रही है। कहने को तो बुढिया को ईश्वर ने दो बेटे, तीन बेटियाँ और लगभग दर्जन भर नाती-पोते दिए है। लेकिन फिर भी वो उस चाँद के मानिंद ही तनहा है। माँ कहती है कि दादी का पटना में मन नहीं लगता है। उसे गांव ही रास आता है। साल में एक-दो बार पेंशन लेने पटना आती है और पैसा मिलते ही फिर उसे कुल देवता याद आने लगते हैं। कहती है नौकर-चाकर के भरोसे देवता को नहीं छोड़ा जा सकता है। पता नहीं साँझ भी दिखाते होंगे कि नहीं! दरवाजे पर लालटेन भी जलाते होंगे कि नहीं! पता नहीं कैसे हमारी दादियाँ-नानियाँ अकेले गाँवों में अपना जीवन बिता रही हैं।

मेरे गाँव में अब जवान नहीं रहते। गाँव तो बूढ़े-बूढ़ियों के लिए है। खाली आँखें, विरान दिल और थके बदन वाले बूढ़े। समय के सापेक्ष गाँव के कई बूढ़े मर गए, कई जवान बूढ़े हो गए। लेकिन पता नहीं गाँव का कोई बच्चा वहाँ जवान क्यों नहीं हुआ। पढ़े लिखे जवान दिल्ली-मुंबई आ गए है और जिन्हें पढ़ने का मौका नहीं मिला वो पंजाब-हरियाणा या फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में अपना पसीना बहा रहे हैं। शायद आठ-दस साल बाद मेरा गाँव सुनसान हो जाए। अब बूढ़े ही बूढ़ों को कंधा भी देने लगे हैं। पहले गाँव के जवान बच्चे होली, दशहरा या फिर आम के मौसम में गाँव जाते थे। अब शहरों में ही लोहड़ी, वेलेंटाईन डे या न्यू ईयर मना कर खुश हो लेते हैं। गाँव के आम-लीची भी अब लंबी सफ़र तय कर अमरीका-यूरोप जाने लगे हैं। आम अब खाने में अच्छा भी नहीं लगता है। चॉकलेट, पेस्ट्री, पिज़्जा दिल को रास आ गया है। बचपन की क़िताबों में गाँव में बसने वाला भारत अब इंडिया बन शहरों में रहने लगा है। वहीं जन्म लेता है, जवान होता है और फिर वहीं मर भी जाता है। यह कहानी सिर्फ़ मेरे गाँव की नहीं है। कमोबेश यही हालत राही मासूम रज़ा के गंगौली, नागार्जुन के तरौनी या फिर श्रीलाल शुक्ल के शिवपालगंज की भी है।

Sunday, December 23, 2007

क्या हम वाकई कुकुरमुत्ता जेनरेशन हैं ?

- विवेक सत्य मित्रम

बहुत दिनों बाद अपने गाँव गया था। ज़मानिया तहसील पर महफिल जमी थी। बाबूजी के एक करीबी मित्र ने एक बार फिर वही राग अलापा जो वो पिछले कई सालों से अलापते आ रहे हैं। बेहद जोरदार तरीके से कहा कि आज कि जेनरेशन ' कुकुरमुत्ता जेनरेशन ' है। इसके बाद करीब दस मिनट तक युवा पीढ़ी को गरियाने का कार्यक्रम चला। लेकिन जब बात बर्दाश्त से बाहर हो गयी। मुझे लगने लगा कि दरअसल ये सीधे तौर पर मुझे गली दी जा रही है तो मैंने अपने तेवर में कहा कि महाशय ये जेनरेशन आपकी जेनरेशन से कहीं ज्यादा प्रोग्रेसिव, लिबरल, ट्रांस्परेंट और काबिल है। ये आपकी जेनरेशन से कम से कम सौ गुना बेहतर है। बात आयी गयी हो गयी, लेकिन कुकुरमुत्ता शब्द रह रह कर जेहन में आ जाता है और मैं सोच में पद जाता हूँ कि कहीं मैंने महज जवाब देने के लिए तो भरी भरकम बातें नहीं कर दीं..क्या मेरी जेनरेशन वाकई कुकुरमुत्ते कि तरह कमज़ोर है..कुछ भी ठोस ढंग से कहना मुश्किल लग रह है....खैर, ये बात इसलिए लिख दी कि समझ नहीं पा रहा हूँ कि आख़िर एक पीढ़ी जिसके कन्धों ने हमारा बोझ उठाया है..उसे हमें कुकुरमुत्ता कहने में कोई तकलीफ क्यों नहीं होती....? सवाल गंभीर है।

Saturday, December 22, 2007

मदद की गुहार करती महाकाली गुफा

मुंबई में पुरात्‍व महत्‍व की एक गुफा के भविष्‍य के सामने संकट आ गया है। मुंबई में और इस शहर के आसपास कई ऐसे इलाके हैं जो आपकों हजारों साल पहले ले जा सकते हैं। मुम्बई के अँधेरी उपनगर में स्थित महा काली गुफा एक ऐसा ही स्‍थान है लेकिन इन दिनों यह गुफा अपने आसपास के लोगों से परेशान है ।

शहर के उपनगर अँधेरी पूर्व से करीब दो किलोमीटर दूर है महाकाली वही गुफा है जिसने संघर्ष के दिनों में विश्‍व विख्‍यात लेखक और गीतकार जावेद अख्‍तर को जगह दी थी। कई रात अख्‍तर साहब ने यहीं बिताई है। लेकिन अब स्थिति थोड़ी बदल गई है। यह गुफा इन दिनों स्‍थानीय वाशिंदों से परेशान है । गुफा के छत पर स्‍थानीय लोग धूप सेंकते मिल जाएं या पतंग उड़ाते तो कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है। गुफा के अंदर लोग बीड़ी सिगरेट के साथ दारु पीते दिख सकते हैं। यहां पर सुरक्षा के नाम पर कुछ भी इंतजाम नहीं है।

महाकाली गुफा के इतिहास की बात करें तो करीब यह दो हजार साल पुरानी बौद्व गुफा है। महाकाली गुफा के बीचोबीच एक शिव मन्दिर है। यहाँ एक विशाल शिवलिंग हैं। लम्बाई करीब आठ फीट। लोगों का कहना है कि शिवलिंग पर सिक्का चिपकाने से मनोकामना पूरी हो जाती है। मन्दिर के परिसर की दीवार पर कुछ देवी देवता के चित्र बने हुए हैं। मन्दिर के दोनों और कई कमरे हैं, शायद रहने के लिए कोई धर्मशाला होगी। गुफा के नीचे पानी का भंडार है लेकिन लाख कोशिश के बाद भी पानी का स्त्रोत नहीं मिल पाया हमें। मन्दिर के बाहर एक दीवार पर एक नाग का बड़ा सा चित्र गुफा की दीवार पर है।

यह खबर यहां भी पढ़ी जा सकती है

Monday, December 17, 2007

चमचागिरी के स्कूल का शिलान्यास !

- विवेक सत्य मित्रम्
इंडियन इंस्टीट्यूट आफ चमचागिरी (अध्याय दो)

पहले अध्याय में आपने पढ़ा था कि मैंने रिटायरमेंट के बाद स्कूल खोलने का फैसला किया है। ये स्कूल चमचागिरी का पहला स्कूल होगा। ये विचार मेरे जेहन में क्यों आया इस पर पहले अध्याय में बात हो चुकी है। अब हम बात करेंगे दूसरे पहलुओं पर। लेकिन शुरु करेंगे उस सवाल से...ऐसा शख्स भला चमचागिरी कैसे सिखा पाएगा जो खुद इसमें कोई कमाल न दिखा पाया हो..-

...तो सवाल ये है कि भला वो आदमी चमचागिरी क्या सिखाएगा जो खुद ये काबिलियत डेवलप नहीं कर पाया? लेकिन इस सवाल के खिलाफ मेरे पास तमाम तर्क हैं। पर मेरे तर्कों के बाद आप दुबारा सवाल न करें तभी कहानी आगे बढ़ पाएगी। तो प्रभु, आप इलाहाबाद या दिल्ली में से किसी एक जगह से तो परिचित होंगे ही ( ऐसा मैं मानकर चल रहा हूं)..। आपने देखा ही होगा, किस तरह गैर आईएएस, गैर इंजीनियर और गैर डाक्टर इन तमाम पेशों में जगह बनाने के गुर सिखाते हैं। और लोग कामयाब न होते हों ऐसा भी नहीं है। तो सरकार, अगर ये तमाम लोग बिना आईएएस बने आईएएस, बिना इंजीनियर बने इंजीनियर और बिना डाक्टर बने डाक्टर बनने के नुस्खे दे सकते हैं तो भला मैं चमचागिरी का कोर्स क्यों नहीं चला सकता। वैसे भी मुझे इस खास प्रजाति की तरह तरह किस्मों के करीब रहने का नायाब अनुभव तो होगा ही। साथ ही मैं किसी न किसी ऐसे इंसान की इस खूबी के साइड इफेक्ट्स का शिकार तो कभी न कभी बना ही होउंगा। हकीकत तो ये है कि महज पांच सालों में ही इस तरह के तमाम साइड इफेक्ट्स से रुबरु हो चुका हूं। बहरहाल, इस बात से थोड़ा आगे बढ़ते हैं। तो अब ये तय हुआ कि रिटायरमेंट के बाद मैं चमचागिरी का स्कूल खोलूंगा। ज्यों ही मैं इस फैसले पर पहुंचता हूं मुझे इस स्कूल के लिए जरुरी पूंजी का खयाल बेचैन कर देता है। लेकिन तभी मुझे याद आता है कि मैं आज से २५ साल बाद के लिए सब कुछ प्लान कर रहा हूं। उस वक्त तक तो लोगों को इस तरह की तालीम देना, समाजसेवा जैसा हो चुका होगा। इस तरह, स्कूल की फंडिंग की परेशानी खत्म हो गई। मुझे तो उम्मीद है कि तब तक चमचागिरी शिक्षा के लिए कुछ एनजीओ भी बन चुके होंगे और इसके लिए विदेशों से भी ठीक ठाक डोनेशन मिलेगा जैसे प्रौढ़ शिक्षा के नाम पर दर्जनों एनजीओ करोड़ों रुपए बना चुके हैं। वैसे भी ये एक किस्म का वोकेशनल कोर्स होगा...जिसके लिए सरकार से भी फंड मिल जाएगा। इस तरह स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की चिंता खत्म। अब दूसरी चिंता, आखिर स्कूल का नाम क्या होगा? लेकिन ये मुश्किल काम नहीं है। देश में पहली बार खुलने वाले संस्थानों के लिए तो कोई दिक्कत ही नहीं है। और आम तौर पर इस तरह के पहले संस्थानों के नाम के आगे इंडियन इंस्टीट्यूट आफ....तो लगा ही होता है। तो ये तय हुआ कि मेरा स्कूल चूंकि चमचागिरी सिखाने वाला पहला इंस्टीट्यूट होगा..सो इसका नाम होगा...इंडियन इंस्टीट्यूट आफ चमचागिरी ( आईआईसी )। जहां जहां भी इंस्टीट्यूट का नाम लिखा जाएगा..वहां एक लोगो भी होगा। और ये लोगो गिरगिट का होगा। मेरे खयाल से गिरगिट से अच्छा कोई लोगो हो ही नहीं सकता...इसे देखकर स्कूल के छात्रों के लिए ये याद रखना आसान हो जाएगा कि रंग बदलने की खूबी, कामयाब चापलूस बनने की पहली शर्त होती है।
स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर, नाम और लोगो के बाद इसकी फैकल्टी पर विचार करना होगा। यहां पर सवाल ये बनता है कि फैकल्टी परमानेंट हो या गेस्ट्स से काम चलाया जाए। चूंकि ये स्कूल मेरे रिटायरमेंट रिहैबिलिटेशन प्लान का परिणाम होगा...लिहाजा मैं कतई किसी और को इसमें हिस्सेदार नहीं बनाऊंगा। साथ ही इसका एक फायदा ये होगा कि समय के साथ चापलूसी में आ रहे बदलावों की भी हमें जानकारी मिलती रहेगी। एक वक्त के बाद चापलूसी के तौर तरीकों में भी बदलाव आएगा। सो उस समय के धुरंधरों को ही बुलाना छात्रों के हित में होगा। फैकल्टी का चुनाव करते हुए बकायदा उनसे एक फार्म भरवाया जाएगा। इस फार्म में कुछ ऐसे कालम होंगे जिनसे ये पता चल सके कि इनमें चापलूसी की टैलेंट कितनी मात्रा में है। फार्म से मिली जानकारियों के आधार पर एक लिस्ट तैयार की जाएगी। इस लिस्ट में उन लोगों को प्रिविलेज दिया जाएगा जो किसी खास समुदाय, जाति, धर्म या विचारधारा वाले आर्गनाइजेशन में कम से कम समय में कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचा हो जिनसे उसका दूर दूर तक कोई वास्ता न हो। उन लोगों को भी तरजीह दी जाएगी जो एक संस्थान को छोड़ने के बाद तीसरी या चौथी बार उसमें नौकरी हासिल करने में कामयाब रहे हों।
चमचागिरी के इस स्कूल के कुछ और मजेदार पहलू बाकी हैं। इनका खुलासा अगली कड़ी में किया जाएगा....

Sunday, December 16, 2007

जल्द खुलेगा... भारत का पहला चमचागिरी स्कूल

- विवेक सत्य मित्रम्
(अगर आप भी किसी न किसी जॉब में हैं तो आप चाहें या न चाहें इस कहानी का हिस्सा हैं। आपका किरदार क्या है..? ये तो आप ही बता सकते हैं। जिंदगी में हम बहुत सी चीजों से इसलिए नफरत करने लगते हैं क्योंकि वो हमारे पास नहीं होती। मेरे लिए चमचागिरी भी ऐसी ही एक काबिलियत है जिसकी एबसेंस मुझे बहुत खली है। और इसके नहीं होने से जिंदगी में बहुत कुछ जो मिल सकता था, नहीं मिल पाया। इसलिए इसकी महिमा का बखान कर रहा हूं, शायद आपके काम आ जाए। फिलहाल पेश है.... इंडियन इंस्टीट्यूट आफ चमचागिरी –अध्याय एक )

प्राइवेट जाब वालों को रिटायरमेंट की चिंता सताती है। मुझे भी सताने लगी है। पांच सालों से जर्नलिज्म में हूं, अभी तक तो कोई तीर मार नहीं पाया। स्यूडो अपर मिडिल क्लास होने की फिराक में सिर पे हजारों का कर्जा हो गया है सो अलग। यही नहीं, ईश्वर ने मेरे शरीर के किसी हिस्से में सुर्खाब के वो पर भी नहीं लगाए जिनकी मदद से मेरे कई सारे बैचमेट और जूनियर्स कामयाबी की नई बुलंदियां हासिल कर रहे हैं। और लगता नहीं कि निकट भविष्य में साइंटिस्ट सुर्खाब के पर डेवलप कर पाएंगे। मान लीजिए, कर भी लिया तो इस बात की क्या गारंटी है कि उनके लिए जरुरी जीनोम संरचना मेरे शरीर में मौजूद हो। कुल मिलाकर बायोलाजिकली मैं इसके लिए फिट साबित हो जाऊं, इस बात की भी गारंटी नहीं है। खैर, जर्नलिज्म से उठाकर फेंक दिए जाने के बाद कौन सा धंधा कर पाउंगा...बहुत सोचा। माथापच्ची की। मेरे एक मित्र ने बताया कि वो वेस्ट मैनेजमेंट में कुछ करने की सोच रहा है। एक ने कहा कि वो किसी जर्नलिज्म इंस्टीट्यूट में फैकल्टी हो जाएगा। किसी ने कहा कि वो गांव जाकर खेती बाड़ी संभालेगा। मैंने भी इन तमाम धंधों के बारे में सोचा। वेस्ट मैनेजमेंट करना इसलिए मुश्किल लगा क्योंकि इसके लिए जरुरी साफ्टवेयर मेरे भीतर नहीं है। अगर कबाड़ से जुगाड़ करने की काबिलियत रखते हों तो ये फील्ड ठीक है, अगर नहीं तो आप खुद ही कबाड़ हो जाएंगे। और यही वो डर है जो इस फील्ड के लिए जरुरी साफ्टवेयर मेरे भीतर इंस्टाल नहीं होने देगा। लिहाजा इस आप्शन को मैं टेक्निकली सपोर्ट नहीं करता। जहां तक बात पत्रकारिता पढ़ाने की है, तो भईया..वो आदमी भला क्या पत्रकारिता पढ़ाएगा जो खुद इस फील्ड में इतनी कमाई नहीं कर पाया कि उसे रिटायरमेंट के बाद के लिए कुछ सोचना न पड़े। मुझे तो लगता है अगर मैं फ्री में भी पढ़ाने को तैयार हो जाऊं तो कोई लड़का पढ़ने को तैयार नहीं होगा। आफ्टर आल इट्स आल अबाउट मेकिंग मनी। इस तरह उस धंधे से भी कमाई नहीं कर पाऊंगा जिसके लिए पूरी जिंदगी लगा दी। ले देकर अब अपनी खेती बाड़ी देखनी होगी। उसमें भी सोचने वाली बात ये है कि तब तक मेरे नाम में एक धूर भी जमीन हो..तब तो ये आप्शन मेरे सामने बचा रहे। लेकिन मेरे खानदान में जिस तरह से जमीन जायदाद घटती चली गई उसे देखकर तो इसकी उम्मीद रखना खुद को गफलत में रखने में जैसा है। मसलन आज से ४० साल पहले मेरे परिवार के पास कुल ३०० बीघे जमीन जायदाद हुआ करती थी। लेकिन आज की तारीख में हम दो भाइयों के हिस्से बमुश्किल १० बीघे जमीन है। अब तो आप खुद ही भविष्य का अंदाजा लगा सकते हैं। इस तरह, ये भी कोई ठोस आप्शन नहीं है। इतनी पूंजी होगी नहीं कि नून तेल लकड़ी की ही दुकान खोल दूं। इसलिए आज मैं इस कंप्यूटर को साक्षी मानकर कहता हूं कि मैं रिटायरमेंट के बाद एक ऐसा स्कूल खोलूंगा जिसमें कामयाब चापलूस बनने की तालीम दी जाएगी। और इस स्कूल का नाम होगा..इंडियन इंस्टीट्यूट आफ चमचागिरी...। लेकिन इसके साथ ही एक सवाल खुद खड़ा होगा कि जिसे चमचागिरी करने नहीं आई वो भला इस तरह का स्कूल क्या खाक चलाएगा...?
( ये इस श्रृंखला का पहला लेख था। दरअसल लिखते - लिखते बहुत ज्यादा हो गया। इसलिए ब्लाग जैसे माध्यम की बाध्यताओं के मद्देनजर मुझे लगा कि इसे कई कड़ियों में पेश करना ठीक रहेगा। लिहाजा चमचागिरी स्कूल खोलने से जुड़े दूसरे पहलुओं पर अगले अंकों में बात होगी..)

Friday, December 14, 2007

मखंचू की संगीत साधना..

अभिषेक सत्य व्रतम्


पिछले
साल गर्मियों में गांव गया था। मेरा गांव यू.पी में गाजीपुर जिले की एक तहसील ज़मानियां से एक कोस की दूरी पर है। मूलभूत सुविधाओं के नाम पर एक प्राईमरी स्कूल है जिसमे मुश्किल से 30 बच्चे होंगे। आधे दलितों के तो आधे ब्राह्मणों के। गांव का भूगोल ऐसा है कि ब्राह्मणों और दलितों का अनुपात लगभग बराबर है। इन दो जातियों के अलावा कुछ परिवार लोहार, नाई और कानू के हैं।
आंगन मे बैठा था तभी हार्मोनिअम की आवाज सुनाई पडी। जब मैने अपनी चाची से पूछा तो पता चला कि मखंचू है। मखंचू की उम्र मुझसे 7-8 साल ज्यादा होगी, रिश्ते में मेरे चाचा लगते हैं। शायद दसवीं पास हैं। उनका असली नाम न तो मुझे पता है न ही मेरे घर वालों को। बचपन से उनको इसी नाम से जानता हूं। बहरहाल जब ध्यान दिया तो गाने की हल्की आवाज़ भी सुनाई दी। मखंचू के घर की और मेरे घर के दीवार एक ही है। चूकि हमारे ही खानदान के है सो आर्थिक स्थिती भी कमोबेश वैसी ही है। थोडी देर बाद चाची ने ये बताया कि मखंचू आजकल महेन्दर.... से संगीत सीख रहे हैं। सुनकर अच्छा लगा। महेन्दर मेरे ही गांव के दलित बस्ती का है और उसे गाने बजाने का शौक है। मैने भी कई बार उसे गाते हुए सुना है। अच्छा गाता है। ब्राह्मण परिवारों में भी जब कभी गाने बजाने के कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है तो महेन्दर को भी ज़रूर बुलाया जाता है और उसे भी उतना ही सम्मान दिया जाता है जितना कि किसी और को। लेकिन मखंचू के संगीत साधना के बारे मे जब चाची ने एक अनोखी बात बताई तो मुझे अचम्भा हुआ। चाची ने बताया कि मखंचू, महेन्दर का पैर छूकर प्रणाम करता है। ऐसा अपने गांव में पहली बार सुना। और तो और ये भी पता चला कि महेन्दर चारपाई पर बैठता है और मखंचू स्वय नीचे. अगल- बगल के कुछ बुजुर्ग पीठ पीछे गरियाते है लेकिन मखन्चू को इस बात कि कोई परवाह नही है।
ब्लाग्वाणी पर टहल रहा था कि ये लाइनें दिख गयी.. हूबहू लिख दे रहा हूं-
"सतीश वर्मादूबे जी लैट्रिन साफ करने लगे, तो इसका मतलब यह नहीं निकाला जाए कि शूद्रों को न्याय मिल गया। जब वर्णाश्रम व्यवस्था से जाति व्यवस्था की नींव पडी, तभी से ही शूद्रों के लिए अंत्यज कर्म का घोषित...... "
मुझे भी लगता है कि समाज बदल रहा है। हम कह सकते है कि आज किसी की भी सामाजिक स्थिती का आकलन उसकी आर्थिक स्थिति के आधार पर किया जा रहा है। लेकिन ऐसा भी नही है कि समाज में व्यवहार के स्तर पे जो भी बद्लाव हम महसूस कर रहे हैं उसका आधार केवल और केवल आर्थिक है। एक स्वस्थ सोच का विकास हो रहा है जिसमे सबकी भगीदारी है खासतौर पे युवाओ की भूमिका बहुत ही सराहनीय है। मेरा बस यही कहना है कि छिछ्ली मानसिकता से बाहर निकलकर इस बद्लाव को सकारात्मक सोच के साथ स्वीकार किया जाना चाहिये न कि न्याय और अन्याय के पलडे पर आंखे गडाए रखनी चाहिए। बदलाव हमेशा इनक्रिमेण्टल होता है। वक्त तो लगेगा ही।
किसी तरह ऐसे लोग अगर बदले की भावना त्याग दें तो शौचालय की सफाई करने वाला आदमी सिर्फ आदमी दिखेगा ब्राह्मण या शूद्र नही। क्योंकि आज कोई भी काम " कास्ट स्पेसिफिक' नही रह गया है. न दूध बेचना , न बाल काटना, न सब्जी बेचना, न ही शौचालय साफ करना। और हां!! कलम घिसना भी....

सौंदर्य का अर्थशास्त्र

- राजीव कुमार
( महज कुछ ही घंटों में दो पोस्ट आए। और दोनों ही पोस्ट राजीव कुमार के नाम से हैं, पर ये दोनों शख्स अलग-अलग हैं। ये टिप्पणी सिर्फ ये बताने के लिए है कि आज एक सुखद संयोग देखने को मिला है। मसलन, दोनों राजीव कुमार बिहार से हैं, दोनों ही टीवी टुडे ग्रुप में काम करते हैं और दोनों ने ही आईआईएमसी से अलग-अलग सालों में जर्नलिज्म का कोर्स किया है। खैर, दोनों के लेखों का आनंद लीजिए..। - विवेक सत्य मित्रम् )


हम
भारतीय भी अजीब इनफिरियरिटी कांप्लेक्स से ग्रसित होते है।
हमारे यहाँ लड़कियाँ चाहे कितना भी पढ़-लिख लें, गोरा होने की चाहत सबमें कूट-कूट कर भरी होती है। वर्ण श्याम हो तो सांवला होने की चाहत, सांवला हो तो गोरे होने का। और अगर गोरा हैं तो और भी गोरे होने का। महिलाओं के इस मनोदशा ने न जाने कितने पतियों, बापों और ब्यॉय फ्रेंडों को कंगाली के मुहाने तक पहुंचा दिया है। अभी हाल में पटना जा रहा था। मेरे साथ एक परिवार भी अपनी बेटी की शादी के लिए जा रहा था। परिवार के सभी लोग सेकेन्ड क्लास स्लिपर में बैठे थे लेकिन जिस लड़की का विवाह होना था वो एसी में। वो इसलिए क्योंकि उन्हें डर था कि पटना पहुंचते-पहुंचते लड़की का कॉम्प्लेक्शन न बिगड़ जाए। महिलाओं की इस मनोदशा का लाभ सौंदर्य प्रसाधन कंपनियाँ भी जम कर उठा रही हैं। लोरियल, पांड्स, इमामी, हिंदुस्तान लीवर आदि सरीके कंपनियां रोज़-रोज़ सेल के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। सर्वेक्षण ऐजेंसी ऐ सी निलसन के एक आंकड़े पर यकीन करे तो पता चलता है कि साल 2005 में भारत में सौंदर्य प्रसाधन का धंधा सालाना साढ़े 16 हज़ार करोड़ का था। यह आंकड़ा हर वर्ष 6-7 फ़ीसदी की दर से बढ़ भी रहा है। इस 16 हज़ार करोड़ में भी सिर्फ़ कॉम्प्लेक्शन सुधारने वाली प्रसाधनों का बिज़नेस 7 हज़ार करोड़ का है। है न कमाल की बात!

पर्सनल केयर मार्केट में सबसे बड़ा हिस्सा हिंदुस्तान लीवर का है। ज़र्मन यूनिलीवर की यह भारतीय सब्सियडरी, देश के प्रसाधन व्यापार के 30 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित करता है। हिंदुस्तान लीवर के प्रमुख उत्पादों में लक्स, लाईफबॉय, पीयर्स, रेक्सोना, फेयर एंड लवली, पॉड्स, सनसिल्क, क्लिनिक हेयर एन्ड केयर, पेप्सोडेंट, क्लोज अप और एक्स है। इसके अलावा हिंदुस्तान लीवर ने हाल में ही 1947 में स्थापित भारतीय कंपनी लेक्मे का भी अधिग्रहण कर लिया है। साथ ही लीवर देश भर ब्युटी सैलून का एक नेटवर्क भी संचालित करता है।

भारतीय बाज़ार में दूसरे नंबर पर प्रॉक्टर एंड गैंबल है। इस अमरिकी मल्टीनेशनल का यूएसपी है हेयर केयर। पेंटीन, रिज़्वायस और हेड एंड सोल्जर इसी के उत्पाद है। इसके बाद कोल्गेट पामोलीव का स्थान है। इसके बुके में टूथ पेस्ट, सेविंग क्रीम के अलावा कुछ बाथरूम प्रोडक्ट भी है। कोल्गेट ने वर्ष 2000 में कोल्ड क्रीम चार्मिस भी बाज़ार में उतारा।

प्रसाधन कंपनी लोरिएल का भी देशी बाज़ार में महत्वपूर्ण हिस्सा है। हलांकि इस कंपनी के उत्पाद मुख्य रूप से शहरी उपभोक्ता को लक्ष्य में रख कर बनाए गए हैं। फिर भी बाज़ार में कंपनी का हिस्सा 7 प्रतिशत के आसपास स्थिर है। लोरिएल का मुख्य उत्पाद गार्नियर के नाम से बाज़ार में बेचा जा रहा है। कंपनी के बुके में मुख्य रूप से हेयर केयर, स्किन केयर और बालों को रंगीन बनाने वाले उत्पाद हैं। लोरिएल के बाद भारत में हैंकल का स्थान है। फा, मार्गो और नीम साबुन इसके उत्पादों में प्रमुख हैं।

इसके अलावा एमवे, एवन और ओरिफ्लेम जैसी कंपनियां भी भारतीयों को सुंदर बनाने में व्यस्त हैं। इन कंपनियों का व्यापार करने का फंडा दूसरों से कुछ अलग है। ये अपने प्रोडक्ट को किराना दुकानों या रिटेल चैन के बजाय स्वयं अपने निजि नेटवर्क से बेचने में विश्वास करती हैं। इस मार्केटिंग के अभिनव प्रयोग के बदौलत ही मंहगे होने के बावज़ूद भी एमवे के उत्पाद गांव-गांव तक पहुंच गए हैं।

हलांकि कॉस्मेटिक बाज़ार पर मल्टीनेशनल कंपनियों की ही बादशाहत है, लेकिन कुछ भारतीय कंपनियां भी इस क्षेत्र में अपनी जगह पर टिके हुए है। इनमें गोदरेज और डाबर का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। गोदरेज के प्रोडक्ट्स में सिंथाल, फेयर एंड ग्लो और डाबर अपने वाटिका, अनमोल आदि उत्पादों से खूबसूरती बढ़ाने के धंधे में व्यस्त है।

ऐसा नहीं है कि इन कंपनियों का टार्गेट कंज़्युमर महिलाएं ही होती हैं। पुरुषों में भी सुन्दर दिखने की प्रबल इच्छा होती है। और इसी इच्छा का सम्मान करते हुए इमामी ने 2005 में फेयर एंड हैंडसम को बाज़ार में लांच किया। इस क्रीम के माध्यम से कंपनी ने एक झटके में ही सौंदर्य से उपेक्षित आधी जंसंख्या यानि पुरूषों को भी अपनी लपेट में ले लिया। अपने लांच के पहले वर्ष में ही इस क्रीम ने बाज़ार से 36 करोड़ बटोरा जो 2006 में 70 करोड़ तक पहूंच गया। लगभग 100 फ़ीसदी का विकास दर।

इन आंकड़ो में ग्रे मार्केट का कोई स्थान नहीं है। सीआईआई के आंकड़े बताते हैं कि देश में कास्मेटिक ग्रे मार्केट लगभग व्हाईट मार्केट से दुगनी है। सस्ते होने के कारण ग्रे प्रोडक्ट प्राय: कस्बाई या फिर देहाती मार्केट में धड़ल्ले से बिक जाते हैं। देखने में बिल्कुल आरिजनल सा लगने वाले इन उत्पादों के नामों की एक बानगी देखिए - लेक्मे - लाईक मी, फेयर एंड लवली - फेयर एंड लोनली, हेवेन्स गार्डेन - हैंगिंग गार्डेन, सनसिल्क - समसिल्क आदि।

अपने सामान को बेचने के लिए कंपनियाँ तरह-तरह के प्रचार का सहारा लेती हैं। गौर से इन विज्ञापनों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि उपभोक्ता को ब्लैक मेल किया जा रहा है। इन विज्ञापनों की वजह से इन मल्टीनेशनल का माल आज देश के गाँव-गाँव तक पहूंच गया है। एचएलएल इंवेस्टर मीट 2006 के आंकड़ों के मुताबिक आज देश के कुल आबादी का 2.1 फ़ीसदी डियोडरेन्ट इस्तेमाल करता है। वहीं 22 फ़ीसदी लोग फेयरनेस क्रीम यूज़ करते हैं।

ऐसे पता नहीं गोरा दिखने का फितूर लोगों में होता क्यों है। हमारे यहाँ भोजपूरी में एक कहावत है "जो बात बा सँवर में उ गोर में कहाँ"। कहने का मतलब कि और नैन-नक़्श तीखे हों तो दमकता सांवला रूप सुबह की चमक को भी फ़ीका कर सकता है। और अपनी रेखा, काजोल और बिपासा भी तो सांवली ही हैं न। और कुछ बात तो जरूर है इन तीनों में। आप भी इत्तेफ़ाक रखेंगे।

अभी हाल में लोरियल ने एक क्रीम लांच किया है जिसका केमिकल कंपोजीशन लेक्टोकेलामाईन है। कहते है फाउंडेशन के साथ इस क्रीम को इस्तेमाल करने से आप झट से गोरे हो जाएंगे। अमावास्या में चाँद निकल आएगा। अल्प समय का यह क्रिमी फेनोमेनन आपको सांवले या काले होने के कांप्लेक्स से थोड़ी देर के लिए ही सही राहत तो दे ही देगा। बस क्रीम लगाओ और मंदाकिनी या फिर जुगल हंसराज की तरह चमचमा जाओ। हफ्ता एक, हफ्ता दो, हफ्ता तीन वाले झंझट से भी मुक्त। रिस्क सिर्फ़ एक है कि ग़लती से बारिश न हो जाए। अगर बारिश हो गई तो फिर......।

डिसक्लेमर: सौदर्य शास्त्र का मेरा ज्ञान बिल्कुल ही अधूरा है। अगर ग़लती से कुछ ग़लती लिख दिया हो तो क्षमा चाहूंगा।

न्यायपालिका बनाम न्यायपालिका

- राजीव कुमार
( अच्छा लग रहा है कि ऑफ द रिकॉर्ड पर लिखने वालों की तादाद बढ़ रही है। राजीव यूं तो मेरे बैचमेट रहे हैं लेकिन ऐसा पहली बार है जब इनका लिखा कुछ पढ़ने को मिल रहा है। बहरहाल वो टीवी टुडे ग्रुप के न्यूज चैनल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उम्मीद है आगे भी उनकी भागीदारी कायम रहेगी। -विवेक सत्य मित्रम् )
लीजिए, पहले तो न्यायपालिका पर कार्यपालिका अपने अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण का आरोप लगाया करती थी लेकिन अब तो भाई न्यायपालिका के भीतर ही जंग झिड़ती नजर आ रही है। जैसा कि आपने अखबारों में पढ़ा और टीवी पर सुना होगा, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एके माथुर और मार्कंडेय काटजू की पीठ ने कहा था कि न्यायपालिका की सक्रियता के नाम पर कार्यपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप करना असंवैधानिक है। लेकिन अब खुद मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट न्यायपालिका की सक्रियता पर हाल में की गई दो जजों की पीठ की टिप्पणी से बँधा नहीं है। अब भाई ऐसा नहीं तो कम से कम सोच-विचार कर ऐसे फैसले सुनाए जाने चाहिए न, पब्लिक में भ्रम क्यों फैलाते हैं। ये तो सब जानते थे कि जज कानून बना कर उसे लागू नहीं करवा सकते, तो फैसले में नई बात क्या थी। थी न नई बात लेकिन उसे तो न्यायपालिका के प्रधान ने ही खारिज कर दिया। लेकिन थोड़े दिनों के लिए ही सही जनता के प्रतिनिधि काफी खुश हुए...अफसोस उनकी खुशी अब काफुर हो गई। लेकिन न्यायपालिका के इस विवादास्पद फैसले पर कार्यपालिका चुटकी लेने से पीछे नहीं रहेगी....

Thursday, December 13, 2007

बीसीसीआई के दामाद वीरु...!

- अभिषेक सत्य व्रतम्

क्या टीम इंडिया में प्रवेश पाने के लिए प्रदर्शन कोई मायने रखता है ?? जवाब तो हमेशा हाँ होना चाहिए। वैसे ये सवाल कुछ अज़ीब भी है। कुछ लोग तो ये भी कह सकते हैं की "अबे इडियट हो क्या??? ये क्या बेवकूफों वाले सवाल करते रहते हो।" हाँ, ये सवाल तो वाकई मूर्खों वाला होता अगर टीम इंडिया में सेंधमारी की कोई गुंजाइश नहीं रहती तो। एक बात और ये कि चयन करते वक़्त चयनकर्ताओं का ध्यान किस बात पर होना चाहिए? हालिया प्रदर्शन पर या भूतकाल में लगाये गये किसी दोहरे या तिहरे शतक की ओर ?? अगर प्रदर्शन का वाकई कोई मतलब होता तो शायद विरेन्दर सेहवाग का अभी टीम में आना मुश्किल ही नहीं असम्भव भी था। वैसे वीरु के सिलसिले में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब लगातार खराब पर्फार्मेंस के बावजूद उन्हें टीम में शामिल किया गया हो।

वीरु को टीम में घुसेड़ने के पीछे दलील ये दी गई कि गौतम गम्भीर को चोट लगने की वजह से वीरू को मौका मिल गया। वाह भाई वाह!! इससे तो यही लगता है कि जिस काम के लिये गम्भीर को टीम में लिया गया होता, वह केवल और केवल वीरू को ही पता है। भाई ये तो पता ही है कि वीरू दिल्ली के कप्तान हैं और चूंकि गम्भीर भी दिल्ली की ही नुमाइन्दगी करते हैं इसलिए कुछ खुफिया बातें या कुछ खास नुस्खे वीरू ने गम्भीर को बताए होंगे। हमारे चयनकर्ताओं ने शायद यही बात सोची होगी... क्यों वेंगसरकर साहब!! सही कहा न मैंने!!

लेकिन आप लोगों ने आकाश चोपड़ा का नाम तो सुना ही होगा.. अरे वो भी दिल्ली का ही है और इस सीजन में तो उसने जमकर रन भी बटोरे हैं। हो सकता है याद न आया हो। आखिर कितने ढ़ेर सारे काम रहते हैं आप लोगों के जिम्मे। कॉलम लिखने से लेकर ना जाने क्या-क्या!! है कि नहीं? पर इतना तो याद रखना ही चहिये कि आकाश भी दिल्ली के ही हैं। और ओपनिंग भी करते हैं... रन भी कुछ कम नहीं बनाए हैं उन्होंने... आंकड़े गिनाने का क्या फायदा!! बस्स! इतनी जानकारी काफी है कि हाल में खेले गए जिन घरेलू मैचों में वीरु फ्लाप हो गये थे जबकि साथ खेलते हुए आकाश ने एक शतक और एक दोहरा शतक था।

आकाश भी माथा पीट रहे होंगे कि काश उन्होंने भी अगर चार-पांच साल पहले कोई जोरदार पारी खेली होती तो आज उनको ये दिन नहीं देखना पड़ता। अब भई वीरू की पारिया हैं ही इतनी लाजवाब कि तुरंत याद आ जाती हैं। भले ही अभी उनका बल्ला एक अर्धशतक का भी मोहताज हो.... और तो और उनका 309 का पहाड़ "दीवार" के शशि कपूर की "मां" से किसी भी मामले मे कमतर थोड़े ही है। तभी तो 24 सम्भावितों कि सूची में नाम ना होने के बावजूद सीधे टीम में अचानक पैदाइश हो गई। हो सकता है सहवाग का नाम सम्भावितों की सूची में इसलिए नहीं दिया गया हो कि लोग सेलेक्शन कमेटी के खिलाफ आग ना उगलने लगे... आखिर पर्फार्मेंस के दम पर तो उनकी जगह तो सम्भावितों की लिस्ट में भी नहीं होनी चहिए थी। वीरू का बल्ला तो ऐसा खामोश है कि बोलने का नाम ही नहीं ले रहा है। वैसे भी फिक्र करने की क्या बात है जब ऐसे ही...।

देश मे कई ऐसे जाबांज है जिनका बल्ला लगातार गरज रहा है, लेकिन वे लगातार नज़रअन्दाज़ कर दिए जाते हैं... क्योंकि उनके पास न तो "309" ही है, न ही "309" जैसी पहुंच वाले लोग. है तो बस अकूत काबिलियत जिसका बहुत मोल नहीं है। उनको कभी यह कहकर टीम में नहीं लिया जाता है कि टीम में गुंजाइश नहीं थी, तो कभी टीम काम्बीनेशन का रोना रोया जाता है। कभी-कभी तो जानदार प्रदर्शन के बावजूद ओछा बयान आता है कि" अमुक नामों पर विचार नहीं किया गया......." आकाश चोपडा, पार्थीव पटेल, एस बद्रीनाथ, सुरेश रैना ऐसे ही कुछ होनहार प्लेयर्स में से हैं जो पिछ्ले कुछ महीनों से लगातार टीम इंडिया के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं. लेकिन समय बीतने पर उनके अच्छे प्रदर्शनों को वैसे ही कूड़ेदान में डाल दिया जाता है जैसे कि अच्छी सिंकी रोटियों को भी बासी होने के बाद फेंक देते हैं।

वैसे इस बात में कोई शक नहीं है कि वीरू में किसी भी बालिंग अटैक की बधिया उधेड़ने का माद्दा है लेकिन टीम के गठन के वक़्त बीसीसीआई के आकाओं को ये नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव का एकमात्र पैमाना प्रदर्शन है। इस प्रकार के दोहरे मानदंडों से नुकसान तो क्रिकेट का ही होगा। कई सालों के बाद जब वसीम जाफर को टीम में लिया गया था तो इस बात की कानाफूसी हुई थी कि जाफर को टीम में जगह इस वजह से मिली क्योंकि जाफर के पिता शरद पवार की गाड़ी चलाते थे.. लेकिन जाफर ने अपने दमखम से अपने आलोचकों का मुंह बन्द कर दिया था। कुल मिलाकर कहना यही चाहता हूं कि वीरु को टीम में लेने के पीछे आखिर कौन है, अब ये सोचना जरुरी हो गया है।