Saturday, October 25, 2008

क्यों पुरबिया लोग पलायन करते है ...

आखिरकार क्यों पुरबिया लोग पलायन करते है ......कारण अशिक्षा , बेरोजगारी , गरीबी और बढ़ते अपराध है । इनके पीछे क्या कोई यह जनता है की कारण कौन है ????? जवाब आता है वही राजनीती की अड़ंगेबाजी। बिहार में कभी लालू की कभी नीतिश की ..... उत्तर प्रदेश में माया मुलायम भी कम नही है । कहने को तो इन प्रदेशो में खनिज संसाधनों की कमी नही है लेकिन रोजगार के तो जैसे लाले पड़ गए है
उद्योग धंधो की कमी के चलते ये यू पी और बिहार के लोग महानगरो की ओर रुख करते है और वहां जगह भी बना लेते है । इसमे कोई संदेह नही है कि ये पुरबिया मेहनती और इमानदार है। लेकिन ये कम अपने यहाँ भी किया जा सकता है । इसके लिए जरुरत है सरकार क खिलाफ एक आन्दोलन कि एक क्रांति कि ।
क्यो ये पुरबिया मजबूर है पलायन
के लिए ?
अब जवाब ये निकल के आता है यहाँ कि सरकार जो विगत पच्चीस सालो से यहाँ राज कर रही है । क्यों महाराष्ट्र और अन्य महानगरो में उत्तर प्रदेश और बिहार कि अपेक्षा रोजगार अधिक है । देश के संसद में सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व ये पुरबिया ही करते है तो अपने प्रदेश में विकाश के नाम पे इनकी संख्या कम क्यो हो जाती है ?
हमारा ये मानना है की राज ठाकरे को दोष देने के बजाय ये पुरबिया अपने नेता लालू , नीतिश , मायावती , और मुलायम को दोष दे तो ज्यादा ठीक होगा । ये वो नेता है जिनके कारण ये पुरबिया पलायनवादी रुख अख्तियार करते है ।
कहते है राजनीती में सब जायज है तो राज ठाकरे की राजनीती भी एक तरीके से जायज है । जब ये उत्तर प्रदेश और बिहार के नेता अप्रत्य्क्ष्य रूप से प्रदेश को खोखला कर रहे है तो राज ठाकरे प्रत्यक्ष्य रूप से अपने वोट बैंक को मजबूत कर रहे है ।
देखना यह है की ये वोट की राजनीती कब तक चलती रहेगी ? कब तक हम मासूम जनता इन राजनीती के ठेकेदारों की बलि चढ़ते रहेंगे? ? ?

Thursday, October 23, 2008

राज ठाकरे का नेक्स्ट प्लान

राज ठाकरे मुचलके पर रिहा होने के बाद क्या करेंगे, पेश है उनका अगला प्लान, वो इसका ऐलान जल्द ही कर देंगे -
राज ठाकरे क्लास में सेंकेंड आने वाले छात्र को सिखाएंगे कि फर्स्ट नहीं आ रहा तो कोई बात नहीं, फर्स्ट आने वाले छात्र को लात मार बाहर धकेल दो.
संसद में केवल दिल्ली के लोग ही जा सकेंगे क्योंकि ये दिल्ली में है.
प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और दूसरे बड़े पदों पर केवल दिल्ली के लोग ही हो सकेंगे.
मुंबई में कोई हिंदी फिल्म नहीं बनेगी, केवल मराठी फिल्म बनेगी.
हर राज्य की सीमा पर बस, ट्रेन और हवाई जहाज रोक दिए जाएंगे और उनके स्टाफ बदल दिए जाएंगे, लोकल स्टाफ भर्ती किए जाएंगे.
महाराष्ट्र के जितने लोग दूसरे लोग दूसरे राज्यों मे काम कर रहे हैं, उनको वहां से निकाल दिया जाएगा, क्योंकि वे स्थानीय लोगों की नौकरियों पर हमला बोल रहे हैं.
भगवान शिव, गणेश और पार्वती की पूजा महाराष्ट्र में नहीं होगी क्योंकि वो उत्तर के देवता हैं...हिमालय में उनका घर है.
ताज महल देखने केवल उत्तर प्रदेश के लोग ही जा सकेंगे.
महाराष्ट्र के किसानों के लिए केंद्र से किसी तरह का पैसा नहीं लिया जाएगा क्योंकि ये पैसा तो पूरे देश का है, फिर केवल महाराष्ट्र को कैसे दिया जा सकता है.
महाराष्ट्र से तमाम मल्टी नेशनल कंपनियों को भगा दिया जाएगा. इन विदेशी कंपनियों का यहां क्या काम. उनकी महाराष्ट्रा माइक्रोसाफ्ट, महाराष्ट्रा पेप्सी और महाराष्ट्रा मारुति कंपनियां खोली जाएंगी.
अब कोई भी मोबाइल पर मराठी के अलावा किसी भी भाषा बात करते पाया गया तो उसका मोबाइल तोड़ दिया जाएगा.
महाराष्ट्र में किसी के घर में टीवी पर मराठी के अलावा किसी और भाषा के कार्यक्रम नहीं चलेगा. अगर ऐसा होता है तो उनका टीवी तोड़ दिया जाएगा...जेम्स बांड की फिल्म देखनी है तो पहले मराठी में जेम्स बांड का अनुवाद होगा.
हम मर जाएंगे, 10 गुने दाम पर अनाज खरीद कर खाएंगे लेकिन दूसरे राज्यों से अनाज नहीं मंगाएंगे. इसके लिए हम संकल्प लेंगे.
कोई भी ट्रेन किसी मराठी ने नहीं बनाई और रेल मंत्री भी बिहारी हैं. इसलिए सभी ट्रेनें रोक दी जाएंगी.
महाराष्ट्र के बच्चों को हम बाहर बिल्कुल नहीं भेजेंगे. वो यही जन्म लेंगे, यही पढ़ाई करेंगे, यहीं नौकरी करेंगे, कमाएंगे-खाएंगे और मर जाएंगे, उन्हें कहीं बाहर नहीं जाना होगा, तभी वे सच्चे मराठी कहलाएंगे.
ये सारी बातें राज ठाकरे की आइडियोलॉजी को प्रोजेक्ट करके लिखा गया है. मुझे ये सब एक मेल के जरिए प्राप्त हुआ.

Wednesday, October 22, 2008

राजा के दो सींग, किम-किम-किम ?

बचपन में एक कहानी सुनी थी...जिसका शीर्षक यही था - राजा के दो सींग, किम-किम-किम...
हुआ यूं कि बहुत पहले एक राजा हुआ करता था जिसके सिर पर दो सींग थे...इसे छुपाने के लिए वो हमेशा ही मुकुट पहने रहता था...बाल काटने वाला नाई ही जानता था कि उसके सिर पर सींग हैं...पुस्तैनी नाई की मौत के बाद राजा पर चिंता के घनघोर बादल मंडराने लगे कि अब उनके बाल कौन काटेगा...क्यों कि जो भी काटेगा ये राज सबको बता देगा कि राजा के दो सींग हैं...किसी तरह खोज कर एक नाई लाया गया...नाम था - बब्बन. जब राजा जी ने बाल कटवाने के लिए अपना सिर नाई के आगे किया तो बब्बन हजाम ठठाकर हंसने लगा...उसे आश्चर्य भी हुआ और हंसी भी आई...खैर किसी तरह उसने राजा के बाल काटे...राजा ने उसे सख्त हिदायत दी कि अगर उसने ये बात किसी को बताई उसका सर कलम करवा दिया जाएगा...बब्बन डर गया..उसने किसी को नहीं बताया...दिन बीतते गए..बब्बन सबके बाल काटता रहा..लेकिन उस दिन के बाद से उसके पेट में एक अजीब तरह का दर्द रहने लगा...उसे लगता जैसे वो सींग वाली बात उसके पेट की दीवारों को खरोंच रही है और कह रही हो कि मुझे बाहर निकालो..मुझे बाहर निकालो....ज्यों-ज्यों दवा की मर्ज बढ़ता ही गया...बब्बन के पेट का घाव बढ़ता ही गया...एक दिन वो जंगल चला गया...और एक सूखे पेड़ के सामने सारी बातें जोर-जोर उगल दीं...अब वो हल्का महसूस कर रहा था....कुछ दिनों बाद राजा जी के यहां एक संगीत समारोह आयोजित हुआ...राजा की सल्तनत के अलावा दूर-दूर देश के कई राजा भी आए हुए थे...समारोह शुरु हुआ...शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम था...सारंगी, तबला और ढोलक पर साज दिए जाने थे..समां बंधा था...लेकिन बाजा बजते ही सबके कान चौकन्ने हो गए...कलाकार जो धुन निकालना चाहते वो निकली ही नहीं रही थी..कुछ और धुन निकल रही थी...सबने सुना...उस धुन को...सारंगी बजी- राजा के दो सींग...तबले की थाप से आवाज आई - किम..किम..किम...देर तक यही दोनों बड़-बड़ करते रहे..अब राजा को तो काटो तो खून नहीं...सिर पे सींग वाली इतनी छुपाने के बावजूद इतनी फैल गई कि बाजा भी बाजा फाड़के बोल रहा है कि राजा के दो सींग....अभी तक ढोलक वाला खामोश था...ढोलक पर हाथ पड़ते ही वो बोल पड़ा - बब्बन हजाम..बब्बन हजाम....


(अं अं अं माथे पर शिकन मत लाइए...आपका सवाल यही है ना कि ये कैसे हो गया, बताऊंगा लेकिन पहले आप बताइए कैसे हुआ होगा ऐसा...क्योंकि बहुत मुमकिन है आप जानते हों ?)

Wednesday, October 15, 2008

आखिर बहन जी को फायदा कया है ?

मोटे तौर पर देखा जाए तो यहीं लगता है कि मायावती ने गलती की है। एक रेल कोच फैक्ट्री को रोकने से यूपी को हुई घाटे की गलती, दूसरी कांग्रेस को तूल देने की गलती-जो कांग्रेस को बोनस के रुप में यूपी की सियासी जमीन पर मिल गया है। लेकिन बसपा के लिए इसके इससे भी बड़े मतलब हैं। आनेवाले वक्त में कांग्रेस को अगर किसी पार्टी से नुक्सान हो सकता है तो वो बसपा ही है। कांग्रेस के जो भी परंपरागत वोट बैंक थे, वो किसी न किसी पार्टी ने हड़प लिया है। सवर्ण बीजेपी के साथ तो मुसलमान बीजेपी को हराने के काबिल किसी के भी साथ है। दलितों का ही एक बड़ा वोट बैंक बचा था जो बसपा से पहले कांग्रेस को मिलता रहा है, कमोवेश अभी भी यूपी-बिहार से इतर मिलता ही है। लेकिन बहन जी इस बार बड़ी तैयारी में है। और वो वो जानती है कि यूपी में कांग्रेस को भले ही रेल कोच विवाद से थोड़ी सुर्खियां मिल जाए, उसका संगठन इस काबिल नहीं है कि बसपा विरोधी मतों का स्वभाविक दावेदार खुद को जता सके। दूसरी बात ये कि आकंठ जातिवाद में डूबी सूबे की सियासत कांग्रेस को कोई बड़ी उम्मीद नहीं देती।
फिर भी मायावती इससे क्या फायदा हो सकता है...? दरअसल, बहनजी सोनिया गांधी से सीधा टकराव लेकर अपनी देशव्यापी छवि को पुख्ता करना चाहती हैं। वो चाहती है कि ये टकराव जितना बढ़ेगा-मुल्क के दूसरे हिस्सों से दलितों की नाराजगी कांग्रेस से उतनी ही बढ़ती जाएगी। वो चाहती है कि ये नाराजगी बढ़ती जाए और पूरे देश के दलित बसपा की छतरी तले जमा हो जाए। और मायावती के लिए ये काम जितना कांग्रेस से लड़कर फायदे का हो सकता है, उतना बीजेपी के साथ लड़कर नहीं।मौजूदा वक्त में मायावती का ज्यादा असर यूपी के आलावा मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, और यूपी से सटे बिहार के इलाकों में है। मायावती चाहती है कि वो कांग्रेस से लड़कर उस आधार को पूरे देश में फैलाए। ऐसा नहीं है कि बसपा दूसरे जगह नहीं है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 3 फीसदी वोट बटोरे तो हिमाचल में 7 फीसदी। दोनों ही जगह कांग्रेस हार गई। लेकिन मायावती इसे और भी पुख्ता करना चाहती है।
लेकिन इस राह में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें हैं। बहनजी ने देशभर में पार्टी संगठन को फैलाने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है। वो यूपी से गद्दी से चिपके रहना चाहती है। साथ ही उन्होने पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेताओं को तैयार नहीं किया है। देखा जाए तो ये बीमारी दलितों और पिछड़ों की तकरीबन हरेक पार्टी में है और ऐसे सभी नेताओं ने पार्टी नेतृत्व अपने खानदान वालों के पास ही रहने देने में दिलचस्पी दिखाई है। तीसरी बात ये कि बसपा के लिए या शायद पूरे दलित समाज के लिए कांशीराम कुछ पहले ही स्वर्ग सिधार गए।

मायावती के पास आज कांशीराम जैसा न तो थिंक टैंक है और न ही मायावती में कांशीराम बनने की संभावनांए हैं। मायावती पोलिटिशियन तो हैं-स्टेट्समैन नहीं। और यहीं वो कमजोरी है जो मायावती और बसपा के देश स्तर पर फैलने में रोड़ा हो सकती है। मायावतीको इसके िलए यूपी की गद्दी किसी काबिल नेता को सौंपनी होगी, और दिल्ली की सियासत में पूरा ध्यान देना होगा। क्योंकि देश की जनता का एक मनोविज्ञान है, वो देश का नेता उसे ही मानता है जो दिल्ली से राजनीति करे और संगठन को देशभर में फैलाए। लेकिन ये बड़े हिम्मत का काम है, यूपी का सीएम खुद को दलितों का मसीहा घोषित कर सकता है।और पार्टी कई बार टूट-फूट और बिखराव का शिकार बन सकती है।

लेकिन मायावती ने थोड़ा सा त्याग और संयम दिखाया तो इसमें कोई दो मत नहीं कि बसपा में काफी संभावनाएं हो सकती है।आखिर हमें ये सोचना चाहिए की वाजपेयी से लेकर नरसिंहराव और चंद्रशेखर तक ने पीएम बनने के लिए लंबे वक्त तक इंतजार किया-अगर वो चाहते तो काफी पहले शायद 60 या 70 के दशक में ही यूपी के सीएम बन जाते।लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस से टकराव बसपा के अपने हित में है, यूपी का चाहे जो हो जाए।

माया - सोनिया के जंग में ......

माया सरकार के बारे में कहा जाता है कि ...माया अपने शासन काल में दोस्तों पे ज्यादा ही ध्यान रखती है और दुश्मनों पे पैनी नजर रखती हैअभी ताजा - ताजा विवाद उभर के सामने आया है वो रायबरेली का है जहाँ पर सोनिया सरकार कि एक महत्वाकान्छी योजना रेल कोच फैक्ट्री शुरू होने वाली थी१४ अक्तूबर को सोनिया शिलान्यास भी करने वाली थी बाकिर माया को ये सब मंजूर नही था
बात कुछ भी हो लेकिन इस माया - सोनिया के बीच विवाद में पिस रहे है आम लोगो के सपनेवो सब्जबाग सोनिया ने दिखाए थे चूर चूर हो गएग्रामीणों कि उम्मीदे कि ये थी कि फैक्ट्री लगेगी रोजगार मिलेगा , उन्हें क्या पता था कि राजनीती के आगे ये सब नही चलता
रेल कोच फैक्ट्री के बंद होने से वह के लोगो में काफी आक्रोश है , खून खराबे किसी भी स्थिति बन गई थी, शायद रायबरेली दूसरा सिंगुर भी बन जाताहाँ एक बात और कुछ भी घटना होती है तो आरोप प्रत्यारोप का दौर जरुर चलता हैमाया का कहना है किसी अगर सोनिया को उत्तर प्रदेश में विकास करना है तो तमाम जगह है जहा वो विकास कर सकती है रायबरेली के पीछे क्यो पड़ी है
इसका सबसे ज्यादा प्रभाव गरीब आदमी पे ही पड़ता हैफिलहाल गलती किसी कि भी हो चोट तो आम आदमी को ही लगती हैपेट तो आम आदमी का ही जलता है भाई ।

Monday, October 13, 2008

सिमी की तरह बजरंग दल पर भी बैन लगे, क्यों !


मांग उठ रही है बजरंगियों पर बैन लगाने की...मु्द्दे पर सबसे ज्यादा हो-हल्ला मचा रहे हैं सियासी गलियारों में दलाली के झंडे बुलंद करने वाले...राष्ट्रीय एकता परिषद की मीटिंग क्या गुल खिलाने वाली है..ये तो शाम तक पता चल जाएगा...फिलहाल अटकलों का बाजार गर्म है कि बजरंग दल पर बैन लग जाएगा...लेकिन जैसा कि पिछली बार कैबिनेट मीटिंग में ये विचार केवल एक विचार बन कर ही रह गया..बहुत मुमकिन है कि इस बार भी मामला टांय-टांय फिस्स हो जाए...तर्क दिया जा रहा है कि जैसे सिमी पर बैन
लगा वैसे ही बजरंग दल पर भी लगना चाहिए...यहां सवाल ये खड़ा होता है कि सिमी और बजरंग दल में कैसी समानता है...दोनों ही संगठन कट्टर माने जाते हैं...एक मुस्लिम कट्टरपंथी तो दूसरा हिंदू कट्टरपंथी...लेकिन जिस तरह की आतंकी वारदातें सिमी ने अंजाम दी हैं...क्या उस तरह का एक भी कारनामा बजरंग दल के नाम है !!कहने वाले कहेंगे कि हां है, परभणी,नांदेड़ और दूसरी कई जगहों पर मसजिद को बम से उ़डाने की साजिश...कानपुर में बम बनाते पकड़े गए दो बजरंग दल कार्यकर्ता...(नाम याद नहीं आ रहा)...या इससे भी पेट भी नहीं भरा तो गड़े मुर्दे उखाड़कर बजरंग दल को आतंकवादी करार दे देंगे...कहेंगे बाबरी मसजिद किसने गिरवाई...ग्राहम स्टेंस और उसके दो मासूम बेटों का कत्ल किसने करवाया...और भी ढेर सारे इल्जाम लगा दिए जाएंगे...लेकिन जिस तरह हिंदू ही नहीं किसी भी मजहब के आदमी के दिल में सिमी या इंडियन मुजाहिद्दीन का केवल नाम ही दहशत पैदा कर देता है...क्या वैसा डर बजरंग दल का नाम सुनकर किसी मुसलमान के दिल में पैदा होता है...अगर हां तब तो लगा देना चाहिए..बजरंग दल पर भी प्रतिबंध...लेकिन नहीं, तब तो ये सरासर ज्यादती होगी बजरंग दल के साथ...अगर मान लें कि राष्ट्रीय एकता परिषद की मीटिंग के बाद बजरंग दल पर प्रतिबंध लग ही जाता है...तो पहले तो बजरंग दल सड़कों पर उतर आएंगे..भयंकर विरोध करेंगे...प्रतिबंध लग जाने के बाद पुलिस इन कार्यकर्ताओं को पकड़कर जेल में बंद कर देगी...लेकिन यहां पर हमारे सियासी विचारक सिमी से इसकी एक समानता भूल जा रहे हैं...क्योंकि जैसे सिमी ने नाम बदल लिया और भूमिगत होकर काम कर रहे हैं....खतरनाक धमाकों को धमकाकर अंजाम दे रहे हैं वैसे ही बजरंग दल वाले भी तो कर सकते हैं....

Monday, October 6, 2008

राजधर्म जाए पर सत्ता न जाए

मित्रों, मैंने अपना ब्लॉग sunosunao.blogspot.com में कुछ लिखने का प्रयास किया है I आवस्य पढ़ें और अपना विचार/प्रतिक्रिया खुले दिल से लीखें I

नाम नमाज, काम सड़क जाम

....कल मेरे जख्मों पे अपनी हंसी के धमाकों का बारुद छिड़कने के बाद आज रोने, गुस्साने या अपना ब्लड प्रेशर फ्चक्चुएट कराने के लिए तैयार हो जाइए....!! क्योंकि आज मैं बताऊंगा कि क्या वजह है अपने रोड एक्सीडेंट को शेरनी का चुम्मा करार देने की.....रोज की तरह कल भी मैं अपने घर से तकरीबन १२ बजे निकला था, लेकिन पता नहीं कैसे दशहरी रावण दिमाग में घुस गया...और मैंने ५४३ नंबर की बस की बजाय ऑटो पकड़ लिया...यहीं से मेरे जख्म अंदर ही अंदर कुलबुलाने लगे, बस सही मौके की तलाश में थे बाहर आने के लिए.....ऑटो के बाहर बस पर लदे लोग...स्कूटर और बाइक पर बंदर की तरह चिपके लोग...कार की एसी में भी झल्ला रहे लोग चले रहे हैं....मैं भी चला जा रहा हूं...ऑटो में लदकर...मुझे भी लग रहा है जैसे मैं लदा हुआ हूं किसी पर...क्योंकि जहां कहीं भी नजर दौड़ा रहा हूं...हर किसी में बस एक ही चेहरा दिख रहा है....बस एक ही चेहरा......खैर, इसकी चर्चा फिर कभी...ऑटो आखिर ऑफिस पहुंच गया...दिवास्वप्नलोक और स्वप्न सुंदरी के आकर्षण की तंद्रा टूटी.....जेब टटोली...केवल ६० रुपए...किराया हुआ था ८० रुपए...ऑटोवाले से बोला- आगे एटीएम ले चलो....एटीएम गया....लेकिन वही हुआ जिसका डर लग रहा था.....दशहरी रावण ससुरा पहले ही पहुंच गया था और एटीएम मशीन के अंदर सारा पैसा मुंह में दबाकर बैठ गया था...मैंने चार बार मुंह से पैसा खींचना चाहा मगर जैसे उसे कलियुग बाबा का स्पेशल आशीर्वाद त्रेतायुग में ही मिल गया था....एसबीआई और पीएनबी दोनों की एटीएम मशीनों ने कुछ भी उगलने से इनकार कर दिया....''अब क्या....अभी कौन होगा...ऑफिस में.....फलां...फलां...फलां.......हुंह किसी ने नहीं मागूंगा....फालतू में क्यों एहसान लूं किसी का......''...अंदर के जख्म दिमाग पे बड़ी चालाकी से हावी होकर हीहीहीही कर रहे थे......ऑटो वाले को एक नया आदेश मिला....गढ़ी चलो वहां एचडीएफसी का एटीएम है....पैसा निकाल कर दे दूंगा.....मुझे याद नहीं था कि उस दिन शुक्रवार है....और शुक्रवार को तो दुनिया के तमाम सफेद जालीदार टोपी वाले अपनी-अपनी टोपियां झाड़-पोंछकर शान से निकलते हैं......कबीरदास जी की भाषा में किसी बहरी अलौकिक शक्ति को खुश करने के लिए सड़क को अपनी बपौती, अपने बाप-दादा की जागीर समझ कर घंटा भर उलटते-पुलटते रहते हैं.......ओखला मंडी और गढ़ी से पहले इतना ट्रैफिक था जैसे ओखला में प्रलय आ रही हो और सारे लोग ओखला छोड़कर जाने पर आमादा हों और बीच में इबादत करने रुक गए हों........मेरा ऑटो एक रिक्शेवाले और उस पर बैठी एक दंपति को बचाने के चक्कर में जा टकराया....कत्लेआम बाइ फटाफट स्पीड के लिए मशहूर ब्लू लाइन बस से....मैं अभी भी उन्हीं ख्यालों में खोया...उसी चेहरे के पीछे दीवाना....बस फिर क्या था मेरे जख्मों के लिए भरपूर मौका था निकल पड़े मेरे अंदर बाहर आकर अट्टहास करने लगे.......ऑटो घूमा ४५ डिग्री के कोण पर मैं घूमा ९० डिग्री के कोण पर और धप्प...आवाज नहीं हुई....लेकिन सुनाई सबको दे गई...धरती मां ने काफी समय से मुझे गले नहीं लगाया था.....सो उस दिन उनकी हसरत पूरी हो गई.....कलेजे को ठंडक मिल गई.....और गले मिलने की निशानी भी देती गईं मुझे.....मेरे जख्म अब अपनी लंबी-लंबी लाल-लाल जीभ निकाल कर चिढ़ा रहे थे मुझे.....और यही नहीं पानी के बुलबुलों की तरह मोटे भी होते जा रहे थे.....बचपन में पढ़े गए चाचा चौधरी और बांकेलाल के कॉमिक्स याद आने लगे....सिर पर डंडा पड़ने के बाद आस-पास तारे मंडराने लगते थे और सिर के ऊपर एक लड्डू निकल आता था....चित्र में देखकर मैं खूब खीखीखीखी किया करता था...असलियत आज फोकस हो रही थी....मन में जो गालियां आ रही थीं और जिनके लिए आ रही थीं, बाहर निकल पड़तीं तो शायद आज दिल्ली सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहा होता......खैर, मैंने खुद से ज्यादा अपनी जुबान को सम्हाला और किसीतरह एटीएम से पैसे निकालकर ऑटोवाले को दिया....ऑफिस के वाश बेसिन में अपना हाथ धोते वक्त 'मर्डर' फिल्म का वो सीन याद आ रहा था जिसमें अस्मित पटेल, इमरान हाशमी का खून करने के बाद अपने हाथ धो रहा होता है........

(कुछ ज्यादा ही बड़ा हो गया...नईं!!!!...........कूल रहिए, मुझे पता है कुछ सवाल पेट में गुड़गुड़ाने के बाद ऊपर पहुंचकर कुलबुला रहे हैं आपके यक्क दिमाग में.......!, बस टिप्पियाइए, और प्रेशर कुकर की सीटी की तरह अपना ब्लड प्रेशर भी.......सीईईईईईईई........)

Saturday, October 4, 2008

शेरनी ने ले ली चुम्मी, शुक्र है होंठ बच गए !

हादसा कल का है....बयां अब कर रहा हूं....जहां शेरनी ने चुम्मी ली थी...वहां अब पट्टी बंधी है....कीबोर्ड पर उंगलियां बमुश्किल चल पा रही हैं.....पट्टी आज ही बंधवाई है....कल रुमाल बांधकर घूम रहा था.....ऑफिस में काम भी कर रहा था....................ओफ्फ, दिमाग को ज्यादा मत दौड़ाइए....मैं क्या खबरिया चैनलों की तरह टीआरपी के चक्कर में कल्पनालोक क्रिएट कर रहा हूं....दरअसल आज मेरा ऑफ है....पूरे दिन घूमता रहा....कहीं कहीं किसी किसी काम से...आज ढेर सारे मुद्दे भी हैं मेरे पास लिखने के लिए...वो रिक्शेवाले की सड़क पर बिखरी हुई दाल हो.....कनॉट प्लेस में भीख मांगता हिजड़ा हो....बंद पड़ा सेंट्रल पार्क हो...दिल्ली में पधारीं अमेरिकी विदेश सचिव कोंडोलिज़ा राइस हों या दिन-भर सोते-जागते...हर वक्त जिसका चेहरा मेरी आंखों के सामने आजकल छाया हुआ है वो हो....मुद्दों की भरमार है मेरे पास लेकिन.....कल वाली ही बात करना ज्यादा रुचिकर लग रहा है मुझे.....दरअसल लिक्खाड़ लोगों की सबसे बड़ी परेशानी होती है.....वो कुछ भी पचा नहीं पाते...उगलने के लिए बेताब रहते हैं....मेरा भी वही हाल है.......कल क्या हुआ...कि मैं अपने ऑफिस में, न्यूजरुम में दाखिल हुआ....बाएं हाथ में रुमाल बांधकर.....शीर्षक उसी से जुड़ा है...मैंने भरसक कोशिश की कि मेरा बायां हाथ दिखे...लेकिन भला ऐसा कैसे हो पाता....कंप्यूटर पर बैठकर छुपाने की कोशिश भी की लेकिन...इंसानी आंखें तो वही कोना तलाशती हैं जो छुपाया जा रहा हो.....एक के बाद एक जिसने देखा, सवाल दागा.....सवालों के एक से एक मज़मून...- क्या भई, कहां भिड़ गए...किससे हाथापाई हो गई...अरे मिथिलेश भाई से कौन भिड़ेगा...!!!....क्या हुआ जनाब, कहां गिर गए.....अरे, ये क्या हुआ...चोट लग गई क्या...दवा ली कि नहीं.....मजे की बात ये रही कि...किसी ने भी रुमाल के अंदर झांकने की जुर्रत नहीं की....लेकिन जुर्रत करने वाले और मज़ा लेने वाले भी कम नहीं....अपनी बेबाक-बिंदास छवि के लिए मशहूर एक क्राइम रिपोर्टर ने कहा- ''टशन में बांध रखा है...या....????".....अब तक तो मैं लोगों को सच बताता जा रहा था लेकिन इस जुमले से मुझे प्रेरणा मिली....अंदर का नटखट बच्चे को जैसे तेज भूख लग गई वो अपनी खुराक तलाशने लगा....यहां वहां कुछ भी मिल जाए चुरमुरा, बिस्कुट या तीखा मसालेदार नमकीन, कुछ भी....उसके बाद जिसने पूछा, जवाब यही मिला...''कुछ नहीं यार, ऐसे ही टशन में...!'' .....उधर एक प्रोमो प्रोड्यूसर ने छेड़ा- अरे मियां, किस बिल्ली से कटवा के रहे हो.....मैंने कहा- अबे, बिल्ली नहीं, शेरनी ने चुम्मी ले ली, शुक्र है होंठ सही-सलामत है....!

(अगर आप ये समझ रहे हों कि मैंने अपने हाथ पर फर्जी तरीके से, केवल टशन मारने के लिए बांध रखा था तो आपको बता दूं ऐसा बिल्कुल नहीं है...अभी मेरे हाथ पे पट्टी बंधी है....दाहिना पैर पूरा सूजा हुआ है....कल छुट्टी भी नहीं मिल रही....पोस्ट लिखने के दौरान ही फोन आ चुका है...कल ऑफिस रोजाना के टाइम से दो घंटे पहले पहुंचना है....तो कल ऑफिस पहुंचूंगा.........बाएं हाथ में पट्टी और सूजा हुआ पैर लेकर...ये हादसा कैसे हुआ वो फिर कभी क्योंकि वो सब बयान करने से हास्य रस नहीं, रौद्र रस की निष्पति होगी.....तो एक बार में एक ही रस ....का पान करें तो अच्छा....है ना !)

यही है बापू को नमन !

(यह लेख मेरे मेल पर अक्टूबर को १२:२३ बजे ही आ गया था लेकिन प्रकाशित काफी लेट कर पा रहा हूं...इसके लिए माफी चाहूंगा...आपको बता दूं लेखक श्री विभूति नारायण चतुर्वेदी फिलहाल पीटीआई -भाषा में वरिष्ठ पत्रकार हैं...)

मोहनदास करमचंद गांधी और कस्तूरबा के खून से पैदा हुई संतति की संख्या बढ़कर सौ के पार हो चुकी है लेकिन इस खानदान की मौजूदा पीढ़ी को अब तक एक भी ऐसा मौका मयस्सर नहीं हो सका है कि वे एक साथ जुट सके। तारा से लेकर तुषार तक परिवार के सदस्यों को इसका मलाल भी है।

महात्मा गांधी के दूसरे पुत्र मणिलाल गांधी के पौत्र तुषार गांधी ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि यह नहीं हो पाया है। परिवार इतना फैल चुका है कि उसे एक साथ कर पाना मुश्किल हो गया है। उन्होंने बताया कि बापू और बा के चार पुत्रों हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास के पुत्र-पुत्रियों का वंश अब सौ से ऊपर हो चुका है और इस खानदान के कुल 130 सदस्य हिन्दुस्तान के अलावा दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, कनाडा इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया आदि देशों में रह रहे हैं। इसी संदर्भ में गांधी के तीसरे पुत्र देवदास गांधी की ज्येष्ठ पुत्री तारा भट्टाचार्य ने कहा कि हमारी मर्जी तो बहुत है कि हमें मिलना चाहिए लेकिन हम सब अपने-अपने क्षेत्रों में लगे हैं। इस बारे में सोच भी है कि सभी इकट्ठा हों लेकिन हो नहीं पाया है।

कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक न्यास की उपाध्यक्ष तारा ने बताया कि इस बारे में कोशिश की जा रही है और उन्हें उम्मीद है कि साल के अंत में ऐसा कोई समागम हो पाएगा। उन्होंने कहा कि विदेश में रहने वालों को जुटा पाना संभव नहीं हो पा रहा है लेकिन भारत में रहने वाले लोग समय समय पर मिलते रहते हैं और हमलोग खुश होते हैं।

करमचंद गांधी और पुतली बाई के सबसे छोटे पुत्र मोहन दास का विवाह मात्र 13 साल की उम्र में कस्तूरबा से हो गया था और उनके चार पुत्र हुए और उसके बाद यह खानदान लगातार बढ़ा है। महात्मा ने हालांकि भारतीय आजादी की लड़ाई की कमान संभालने से पहले 1914 में ही परिवार का परित्याग कर दिया था और सभी भारतीयों को अपना मानस पुत्र मान लिया था लेकिन गांधी के सबसे बड़े पुत्र हरिलाल की चार संतानें हुई और उनकी सबसे बड़ी पुत्री नीलम पारिख पिछले साल मुंबई में गांधी के अस्थि कलश विसर्जन में शामिल हुई।

महात्मा के सबसे बड़े पुत्र से मेल न खाने की बात सभी लोगों को पता है और उन्होंने खुद लिखा भी है कि मेरे जीवन के दो सबसे बड़े खेद- दो लोगों को मैं कभी रजामंद नहीं कर सका- मेरे मुस्लिम दोस्त मोहम्मद अली जिन्ना और मेरे अपने पुत्र हरिलाल गांधी।

नीलम ने अपने पिता पर एक पुस्तक भी लिखी है- महात्मा गांधीज लास्ट ट्रेजर-हरिलाल गांधी जिसमें इस बात पर कुछ रोशनी डाली गई है। गांधी के दूसरे पुत्र मणिलाल गांधी के एक पुत्र अरुण गांधी और दो पुत्रियां सीता और इला हुई। अरुण हाल के दिनों में विवादों में भी घिर गए थे जब उन्होंने वाशिंगटन पोस्ट वेबसाइट पर एक आलेख प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने यहूदियों और इजरायल के बारे में कुछ टिप्पणी की। इस विवाद के बाद उन्हें अमेरिका के रोचेस्टर विश्वविद्यालय में उनके द्वारा स्थापित महात्मा गांधी शांति पीठ से इस्तीफा देना पड़ा।

अरुण गांधी के ही पुत्र तुषार गांधी हैं जो फिलहाल कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं और पेशे से बैंकर हैं। वह सामाजिक और राजनीतिक कार्यो में लगे हैं। महात्मा के तीसरे पुत्र रामदास की पुत्री सुमित्रा गांधी कुलकर्णी राज्यसभा [1972 से 1976] की सदस्य रहीं और आपातकाल के मुद्दे पर इंदिरा गांधी से उनका मतभेद हुआ। उन्होंने गांधी पर एक पुस्तक अनमोल विरासत लिखी और देश के राष्ट्रपति पद के चुनाव में उतर कर सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने का प्रयास भी किया। गांधी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी खुद हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक रहे और उन्हें कभी-कभार बापू के निजी सहायक के तौर पर साबरमति आश्रम में काम करने का भी मौका मिला। देवदास के एक पुत्र गोपाल कृष्ण गांधी मौजूदा समय में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं और उन्होंने पूर्व में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के तौर पर विभिन्न देशों में भारतीय मिशनों में काम किया जिसमें श्रीलंका भी शामिल है जहां से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया।

देवदास गांधी के एक अन्य पुत्र राजमोहन गांधी भी राज्यसभा के दो साल तक सदस्य रहे और उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ा। राजमोहन ने कई पुस्तकें भी लिखी हैं। उनके सबसे छोटे भाई रामचंद्र गांधी पिछले साल जून में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मृत पाए गए थे जो पेशे से दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे और फक्कड़ी उनके मिजाज में थी। गांधी खानदान की अब पांचवीं छठीं पीढ़ी पैदा हो चुकी है और महात्मा गांधी हिज अपोस्टल्स पुस्तक के लेखक वेद प्रकाश मेहता के अनुसार गांधी खानदान के लोग कई देशों में जीवन बीमा बेचने से लेकर अंतरिक्ष इंजीनियरिंग तक के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पोरबंदर से लोकसभा का चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले तुषार ने गांधी रक्त वंशजों के राजनीति में सफल नहीं होने के बारे में पूछे जाने पर कहा कि मैं समझता हूं कि शायद हमारी काबलियत में वह नहीं है जो आज राजनीति में सफल होने के लिए चाहिए। बापू ने अपने जीवनकाल में परिवार को कभी आगे नहीं बढ़ाया और इसका सम्मान उस समय परिवार ने भी किया और राजनीति तथा सार्वजनिक जीवन से दूर रहा। उन्होंने कहा कि मेरे चाचा [राजमोहन], बुआ [सुमित्रा] और मैंने कोशिश की। हमारे में वह काबलियत नहीं है जो जरूरी होती है। जो निपुणता चाहिए वह शायद नहीं है। तुषार ने कहा कि उन्होंने 1998 में लोकसभा पहुंचने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो सके। तुषार पहले समाजवादी पार्टी के सदस्य थे। उन्होंने बताया कि उनकी एक बुआ इला गांधी दक्षिण अफ्रीका में वहां की संसद की सदस्य रहीं। मणिलाल गांधी की पुत्री इला 1994 से 2004 तक दक्षिण अफ्रीकी संसद की सदस्य रहीं और वह गांधीवाद के प्रचार प्रसार में सक्रिय हैं।

महात्मा गांधी के परिवार के भारतीय राजनीति में सफल नहीं रहने के बारे में गांधी शांति प्रतिष्ठान के सचिव सुरेन्द्र कुमार ने कहा कि जिस तरह का संरक्षण अपने बच्चों को देकर अन्य राजनेता उन्हें आगे बढ़ाते हैं गांधीजी ने वह संरक्षण नहीं दिया। वे मानते थे जिनमें क्षमता है वे खुद आगे बढ़ें। यह पूछे जाने पर कि समाज को क्या गांधी परिवार से राजनीतिक उम्मीद करनी चाहिए उन्होंने कहा समाज को किसी परिवार से नहीं बल्कि चिंतन से उम्मीद रखनी चाहिए। यह गांधीवादी चिंतन ही है जो गोपालकृष्ण गांधी [पश्चिम बंगाल के राज्यपाल] को अग्रिम पंक्ति में खड़ा करता है।