Saturday, May 24, 2008

आरुषि..! अच्छा हुआ हम नहीं मिले

- विवेक सत्य मित्रम्

अच्छा हुआ-
हम कभी किसी चौराहे,
किसी गली या फिर-
किसी नुक्कड़ पर नहीं टकराए-
अच्छा हुआ-
तुम उन तमाम लड़कियों में-
कभी शऱीक नहीं थी-
जो गाहे बगाहे-
मेरे ख्वाबों का हिस्सा बनीं-
अच्छा हुआ-
हमारी जिंदगी के सभी रास्ते-
अलग-अलग रहे-
कभी साझा नहीं हुए-
अच्छा हुआ-
कोई ऐसी लड़की नहीं गुजरी-
मेरी नजरों से-
जिसके चेहरे से मिलता हो-
तुम्हारा चेहरा-
वरना-
मुश्किल होता, मेरे लिए-
तु्म्हारी खूबसूरत तस्वीर पर-
वो हर्फ उकेरना-
जिनसे टपक रहा हो खून-
मुश्किल होता, मेरे लिए-
खड़े करना सवाल-
तु्म्हारे चरित्र पर-
मुश्किल होता, मेरे लिए-
हाथ पर हाथ रखे...
देखना वो तमाशा-
जिसमें शामिल रहा मैं भी-
शुरु से आखिर तक-
बना रहा हिस्सा-
भेड़ियों के भीड़तंत्र का।
आरुषि...!
अच्छा हुआ हम कभी नहीं मिले।

एक बचपन ये भी...


उसका बचपन

अपने फटेहाल हाथों से
अधपके मन के बर्तन पर
उकेरता है वह
ग्राहकों-मालिकों की गालियों से
दुनियादारी के अक्षर,
उसने ककहरा नहीं सीखा
मगर सीख गया है बहुत कुछ-
मस्का लगाना, तफरी करना,
मां-बहन की गंदी गालियां...
और सबसे बढ़कर
नंबर दो का पैसा बनाना,
अखबारों के 'रंगीन चित्र'
ताजातरीन फिल्मों की तारिकाओं के
नख-शिख वर्णन होते हैं अक्सर उसकी चर्चाओं में,
प्लेटों-चम्मचों-गिलासों से ही
करता है वह सृजनशीलता की अभिव्यिक्त,
बचपन के बचपने को भूलकर वह
बर्तनों की खरखराहट में भी ढूंढता है
मां की लोरियां और
घिसता जाता है यूं ही अपने बचपने को।

नौकर

1. नौकर


वह रोज चुपचाप आता है,
साफ करता है जूठे बर्तन और घर,
भरता है पानी और सुबह सुबह हमारा पेट।

हमारी गालियों घुड़कियों को सह लेता है,
पचपन की उम्र में भी अपने पीठदर्द की ही तरह।

ककहरा तक नहीं जानता,
शायद इसीलिए बाप दादा की उम्र का होकर भी,
हमें अपना माई-बाप समझता है....


(यह कविता मैंने उन दिनों लिखी थी जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीए सेकंड ईयर का छात्र हुआ करता था। कविता साहित्य अमृत-अंक 2004, दीवार और समवेत पत्रिकाओं में छपी थी। यही नहीं पहली बार कुछ जानकारों ने तारीफ भी की, बहुत अच्छा लगा था उस वक्त..)

खरी-खोटी दोहों की जुबानी-2

- कुमार शैलेन्द्र

दिल छलनी, मन बैठता, घायल जब अहसास,
तब कुछ कर दिखलाएगी, निकली हुई भड़ास।

भारत साठों साल से तीन टांग पर हुंह,
चौथा खंभा लोक को लगे चिढ़ाता मुंह।

महंगाई की आग में घी, डीजल-पेट्रोल,
मुंह मिट्ठू सरकार की खुल जायेगी पोल।

थपकी अपनी पीठ पर, कानों में दे तेल,
राजनीति की कुर्सियां, करें घिनौना खेल।

चिन्दी चिन्दी हो रहा गांव, गरीब, गंवार,
पांच साल उपलब्धि के, गिना रही सरकार।

गांधीजी के बंदरों, मत कर भ्रष्ट मिजाज,
कसमों-सपनों की जरा, कुछ तो रख लो लाज।

पैसा जब से हो गया, इस युग का भगवान,
स्वर्ग नर्क सा हो गया, मनुज बना हैवान।

ऊंचे-ऊंचे हो रहे शहर अमीर-अमीर,
गांव-गरीबी द्रौपदी, झोपड़ियां है चीर।

लेने में आता मजा, मुट्ठी में कानून,
हिंसक कुत्ते चाटते, भारत मां का खून।

सत्ता सुख में तैरना, सच या बड़ा कमाल,
खोल न पाता आंख भी, मुंह खोले घड़ियाल।

Wednesday, May 21, 2008

बाबूजी की कविताओं का ब्लॉग...

बाबूजी की एक किताब बहुत जल्द प्रकाशित होकर आ रही है। इस किताब की तमाम कविताओं को इंटरनेट पर पहुंचाने के लिए एक नया ब्लाग बनाया है। एक एक कर के बाबूजी की कविताएं इस पर उपलब्ध होंगी। ब्लाग का यूआरएल है www.krshailendra.blogspot.com तकरीबन दो दशकों से लिखी जा रही कविताओं में से चुनिंदा कविताएं पहले संग्रह में होंगी... इस संग्रह की कविताएं देखा जाए तो गीत की विधा में हैं... जो अब कम ही देखने को मिलती हैं।
- विवेक सत्य मित्रम्

Saturday, May 17, 2008

एक सेकुलर स्टेट में......

ताज महल, प्रेम का अद्भुत स्तंभसारी दुनिया यही जानती और मानती है,लेकिन यह केवल प्यार का स्तंभ नहीं है,यह गवाह है असुरक्छा का,यह गवाह है एक मुसलमान के प्रेम का,जिसने भारत में प्रेम किया,यहाँ प्रेम वर्जना की वस्तु है,शायद इसीलिए शाहजहाँ ने,अपने प्रेम को दीर्घकालिक बनाने के लिए ताज का निर्माण कराया,अजीब बात है मैं यह सब क्यों कह रहा हू,जबकि सारी दुनिया जानती है।लेकिन दुर्भाग्य इस प्रेम के प्रतीक का,कोई प्रेमी नहीं खाता कसम ताज कीक्यों खाते है प्रेमी कसमे लैला और मजनू कीहीर और रांझा की ?यह महज विडम्बना नहीं है,यह है एक राष्ट्र की मानसिकता,हिन्दू राष्ट्र की मानसिकता,पुरुष प्रधानता की मानसिकता,अकबर महान ने प्रेम किया जोधा बाई से,लेकिन नहीं बनवाया कोई ताज महल,शुरू किया दीने इलाही,जहाँ पर लोग स्वतंत्र हो अपनी स्वतंत्रता व पसंद के साथ,क्यों रह गयी यह कहानी अधूरी?क्यों आज भी प्रेम वर्जना की वस्तु है,एक सेकुलर स्टेट में?

Thursday, May 15, 2008

कब थमेगी सियासत बेजुबान लाशों पर ?

- विवेक सत्य मित्रम्
मंगलवार की काली शाम ने गुलाबी नगरी की फिजां को लाल कर दिया। दहशत और खौफ की जो दास्तान लिखी गई.. उसकी जवाबदेही लेने को कोई तैयार नही है। वसुंधरा राजे से लेकर लालकृष्ण आडवाणी तक.. हर कोई ताक में है सियासी माइलेज लेने के... और तैयारी की जा रही है सरकार को चारों खाने चित्त करने की...। दूसरी ओर हमेशा की तरह यूपीए सरकार के पास कहने को ज्यादा कुछ भी नहीं है। उसे हर वक्त यही चिंता खाए जाती है कि कहीं किसी मुद्दे का फायदा बीजेपी ना उठा ले जाए...। लिहाजा मरने वालों और जख्मी लोगों के प्रति अपनी संवेदना जताने में वो भी पीछे नहीं रहना चाहती। जहां तक बात है आंतरिक सुरक्षा के मामले पर बुरी तरह फेल होने की तो गृह मंत्री शिवराज पाटिल के पास वही रटा रटाया जवाब मौजूद है। अगर आप तमाम आतंकवादी हमलों के बाद उनकी पहली प्रतिक्रिया पर नजर डालेंगे तो आपको पता चलेगा कि मिस्टर पाटिल के अल्फाज भी नहीं बदलते...। उसी घिसे पिटे अंदाज में पूरी बेशर्मी के साथ वो बोल पड़ते हैं...खुफिया एजेंसियां अपना काम कर रही हैं.. बहुत जल्द पता चल जाएगा.. इन वारदातों को किसने अंजाम दिया.. और आलम ये है कि महीनों बीतने के बाद भी तमाम वारदातों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई.. आम आदमी तो भूल ही गया...सरकार भी भूल गई.. यूपीए सरकार ने सत्ता में आते ही पोटा खत्म कर दिया.. कहा गया पोटा का तमाम मौकों पर बेजा इस्तेमाल हुआ है.. चलिए मान लेते हैं कि पोटा कानून खत्म करने में कोई हर्ज नहीं है.. लेकिन प्रभु गृह मंत्रालय जैसा महकमा संभालने के बाद बनने वाली जवाबदेही किसकी है.. आम आदमी के वोट से सुरक्षित किलों में बैठकर मलाई काटने वाले तमाम सियासतदान तो हमेशा महफूज रहते हैं... उन्हें कोई आतंकवादी संगठन निशाना क्यों नहीं बना पाता.. जाहिर है.. सामान्य हालात में भी ये महानुभाव वाई.. जेड..और जेड प्लस जैसी श्रेणियों की सुरक्षा व्यवस्था में रहते हैं.. लेकिन जब बात आती है आम आदमी की हिफाजत की तो मुल्क के भूगोल और आतंकवादियों के दुस्साहस का हवाला देकर... खानापूर्ति करने में इन्हें थोड़ी भी देर नहीं लगती... शर्म आती है हमे इस देश पर... जहां के सियासतदान लाशों पर सियासत करने से भी बाज नहीं आते... और सरकारें जिम्मेदारी लेने के बजाए... अपनी कुरस्ी बचाने में लगी रहती हैं... वाह रे ... भारत देश.. और वाह रे भाग्य विधाता नेता.....

Saturday, May 10, 2008

भई ! रात है ...

हैलो क्या हाल चाल है ?

क्योंकि -

रात अच्छी नहीं बीती

सपने थे पर डरावने

कुछ बता देने की चाह रखने वाले

काले ;

चमगादड़ों को हाँक देने वाली

हवा

सनसनाती रही

झुलसती रही उलझती सी

सायरन बजाती चल निकली

नक़ली ;

चुभन बाक़ी है अभी तलवे में

गिट्टी की

अजीब सी रगड़ की आवाज़ के साथ

जमा हुआ ख़ून है ;

हुँह !

ख़ून है !

ओ !!! सोये नहीं ?

Sunday, May 4, 2008

यूं ही...पर

बिन पासपोर्ट
गया था चांद पर
जागा रात भर
ठंड बहुत थी
पर मजा आया
पासपोर्ट के बगैर
हहा ! सोचो
- कृष्ण

Thursday, May 1, 2008

महफूज नही है महिलाएं दिल्ली में




हमारे पुराणों धार्मिक ग्रंथो मी यू तो महिलाओ की स्थिति देवी के समान दर्शया गया है , लेकिन हमेशा से ही उनको अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता रहा है , चाहे वो सीता के रूप मे हो या फ़िर आज की गुडिया ...

दिल्ली मे महिलाओ की स्थिति की चर्चा करे तो राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली जैसे आधुनिक शहर मे महिलाओ के खिलाप अपराध मे सबसे ज्यादा बढोत्तरी हुई है । कभी तंत्र - मंत्र के नाम पर की हत्या कर दी जाती है तो कही पड़ोसी द्वारा बलात्कार यह पीडा किसी भी रूप मे हो सकती है ।

दिल्ली मे अभी हाल ही मे एक सर्वे के अनुसार बलात्कार के ५३३ मामले और छेड़ छाड़ के ६२९ मामले दर्ज किए गए है । यह आकडे एनी बड़े शहरो की तुलना मे काफी अधिक है । ऐसे मामलो मे निरंतर ब्रिधि का सबसे बड़ा कारण है दोषी के ऊपर न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध न होना ।

यू तो हर तरह के अपराध से निपटने के लिय कानून है पर यह सब अपराध के आगे फिसड्डी नजर आते है , राष्ट्रीय महिला आयोग की माने तो बलात्कार छेड़ छाड़ एवं अगवा जैसे मामलो मे आरोप सिद्ध न होना एक चिंता का विषय है । देश भर मे २००६-०७ मे ३७ हजार मामले सामने आए है जिनमे दोष सिद्धि का प्रतिशत ३० से भी कम था , और एक बात बलात्कार के मामले मे तो यह आकडा २७ % से अधिक नही बढ़ पाया ।

समाज मे बलात्कार पिडिता एक दर्द लिए हर दिन मरती रहती है , ऐसे मे इन पिदितो के लिए कुछ प्रावधान होने चाहिए ताकि वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सके । ज्यादातर मामलो मे पिडिता बदनामी के डर से पुलिस मे मामला दर्ज ही नही कराती है ।